वर्क फ्राॅम होम’ के बाद अब ‘डिजीटल खानाबदोशी’ का दौर…

कोरोना काल में हम जिस वर्क फ्राॅम होम की कवाायद सीख रहे थे, उसी दौरान दुनिया एक पायदान ऊपर चढ़कर ‘वर्क फ्राॅम एनीवेयर’ ( खानाबदोश की तरह कहीं से भी काम) को अपना रही थी। अब भारत में इस नई कार्यसंस्कृति को लागू करने की शुरूआत देश के सबसे बड़े ‘स्टेट बैंक आॅफ इंडिया’ ने कर दी है। बताया जाता है ‍कि इससे बैंक की आॅपरेशनल कास्ट भी कम होगी। इसके नतीजे क्या होंगे, यह देखने की बात है, लेकिन यह पहल यकीनन अंगरेजों के जमाने से चली आ रही दफ्तरी कार्यसंस्कृति को बदल सकती है। इससे काम के आवंटन, उसे अपनी सुविधानुसार कहीं से भी पूरा करने और घड़ी के कांटों के बजाए आत्मप्रेरणा से काम करने को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि यह नई कार्य संस्कृति वर्तमान श्रम कानूनों के लिए भी चुनौती होगी। क्योंकि काम के घंटों से ज्यादा काम पूरा करके देने पर ज्यादा जोर होगा।

दरअसल ‘वर्क फ्राॅम होम’ और ‘वर्क फ्राॅम एनीवेयर’ में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। वर्क फ्राॅम में जहां आपको एक निश्चित जगह से ही काम करना होता है, वहीं वर्क फ्राॅम एनीवेयर में आप अपने गेजेट्स के साथ देश और दुनिया के किसी कोने से भी काम कर सकते हैं। अंग्रेजी में इसे ‘फ्ले‍क्सीबल वर्किंग’ भी कहा जाता है। विशेषज्ञ माइक स्वि‍िगंस्की के अनुसार आज स्मार्ट फोन्स, सोशल मीडिया एक तेज और विश्वसनीय इंटरनेट एक्टिविटी बन गए हैं। माइक के मुताबिक प्रौद्योगिकी और टैक्नाॅलाॅजीकल कौशल रोजगार की ‘नई करेंसी’ है। इसकी मांग आईटी, सोशल मीडिया, एनालिटिक्स आदि क्षेत्रों में लगातार बढ़ती जा रही है। स्विगिंस्की का मानना है कि आज की नौजवान पीढ़ी यानी ‘जेनरेशन जेड’ ही दुनिया में कार्य संस्कृति का भविष्य तय करेगी। क्योंकि यह पीढ़ी टैक्नाॅलाॅजी के उपयोग में निष्णात है।

कोरोना लाॅक डाउन के दौरान देश की कई कंपनियों ने ‘वर्क फ्राॅम होम’ को लागू किया। कुछ कंपनियों ने तो इसे दीर्घ काल के लिए लागू कर दिया है। इसका कारण आॅफिस के रूप में कार्य स्थल के संचालन पर होने वाले खर्च की बचत है। हालांकि जानकारों का कहना है कि बहुतों को ‘वर्क फ्राॅम होम’ की स्थिति बहुत आदर्श नहीं लगती। ‘वर्क फ्राॅम होम’ की ब्रांडिंग खूब हुई है, लेकिन यह वर्कर को बुनियादी स्वतंत्रता से वंचित करती है। आॅफिशियल काम के चक्कर में आप घर में कैद से हो जाते हैं। दरअसल व्यक्ति की कार्योत्पादकता बढ़ाने और इसके‍ लिए उसे प्रोत्साहित करने के लिए यह देखना भी जरूरी है कि काम कहां से और किन परिस्थितियों में किया जा रहा है। ‘वर्क फ्राॅम एनीवेयर’ के तहत काम काॅफी हाउस में बैठकर, बीमार की तीमारदारी करते हुए किसी अस्पताल में, दोस्त के घर, बीच पर, किसी होटल या पार्क में भी अंजाम दे सकते हैं। तुलनात्मक रूप से इस कार्य शैली में बहुत लचीलापन है। इसमे तनाव भी कम है। इस लिहाज से ‘वर्क फ्राॅम एनीवेयर’ की परिभाषा ज्यादा व्यापक है। जब यह कहा जाता है कि आप ‘कहीं से भी’ काम कर सकते हैं तो इसके दायरे में आपका आॅफिस, स्कूल आदि भी आ जाते हैं। इसमें कार्य करने वाले व्यक्ति की आजादी और गति‍शीलता दोनो शामिल है। खर्चों की दृष्टि से भी यह बेहद‍ किफायती है। न दफ्तंर की जरूरत और न ही दफ्त्र मेंटेंन करने के खर्च। बताया जाता है कि दुनिया में कई कंपनियों ने इसे लागू करना शुरू किया है, लेकिन उनकी गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पड़ा। सीधे शब्दों में कहें तो वर्क फ्राॅम एनीवेयर आपको अपने काम का माहौल चुनने की आजादी देता है।

अब जबकि भारत जैसे देश में जहां ‘वर्क फ्राॅम होम’ ही नई कार्यसंस्कृति है, और अब ‘वर्क फ्राॅम एनीवेयर’ भी आ गया है तो कन्फ्यूजन होना स्वाभाविक है। इसमें कई खूबियां और दिक्कतें हैं। ‘वर्क फ्राॅम होम’ की सबसे बड़ी परेशानी है कि आप इससें ‘कार्य दिवसों’ से ‘छुट्टियों’ को अलग नहीं कर सकते। आपको घर के दायरे में और रोज एक-सा काम करते रहना है। मतलब घर और दफ्तर का एकरूप हो जाना है। जबकि ‘वर्क फ्राॅम एनीवेयर’ का मूल मकसद कि अच्छी प्रतिभाअो को आकर्षित कर उन्हें अपने प्रदर्शन के ज्यादा से ज्यादा अवसर उपलब्ध कराना है। साथ ही वर्क फ्राॅम एनीवेयर करने वालों पर पूरा भरोसा रखना।

दुनिया की एक नामी टापॅटेल में कर्मचारियों ने ‘डिजीटल खानाबदोश लाइफ स्टाइल’ विकसित कर ली है। इस कंपनी के कर्मचा‍री दुनिया के 93 देशों से काम करते बताए जाते हैं। इसी तरह कंटेंट डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ‘अपवर्दी’ ने कर्मचारियों को काफी आजादी दे रखी है। इसी प्रकार बफर, गिटहब, वेबकंपनी बेसकैम्प तथा ट्री हाउस आदि का मानना है कि स्वप्रेरणा से लोग यदि काम करते हैं तो नतीजे बेहतर मिलते हैं। अब सवाल ये कि ‘वर्क फ्राॅम एनीवेयर’ के तहत किस तरह के काम किए जा सकते हैं तो इनमें वर्चुअल असिस्टेंस यानी ई-मेलाचार (पत्राचार का ई-स्वरूप), स्काइप फोन काॅल्स, वेब साइट अपडेशन, डाटा एंट्री जैसे जाॅब शामिल हैं। साथ ही अनुवाद कार्य, तीसरा सर्च इंजिन विज्ञापन ( इसमें सोशल मीडिया पर उत्पाद के लिए विज्ञापन कैम्पेन तैयार करना शामिल) भी हैं। इनके अतिरिक्त सोशल मीडिया मार्केटिंग, वेब डिजाइनिंग, सर्च इंजिन आॅप्टिमाइजेशन, ग्राफिक डिजाइन, प्रोग्रामिंग, कंसल्टिंग, आॅन लाइन टीचिंग, ट्रेडिंग, ई काॅमर्स, ब्लाॅगिंग जैसे डेढ़ दर्जन काम भी वर्क फ्राॅम एनीवेयर के तहत किए जा सकते हैं।

यह मानने में हर्ज नहीं कि कोरोना प्रकोप ने 21 वीं सदी के बाकी सालों की नई कार्य संस्कृति का एजेंडा तय कर दिया है। अभी हमे भले यह अजीब, असंभव और अस्वा‍भाविक-सा लगता हो, लेकिन आने वाले जमाने की हकीकत यही है। नई कार्य संस्कृति को अपनाने और उस कल्चर में काम करने के लिए हमे और समाज को अपना माइंड सेट बदलना होगा। वो ये कि दफ्तकर में सुबह से रात 9-10 तक खटते रहने और एक निश्चित स्थाान अथवा माहौल में काम करने का कनसेप्ट परिवर्तित होगा। आपको दिया हुआ काम तय सीमा में करना है, फिर आप यह कहीं भी, कैसे भी और कितनी जल्दी कर सकते हैं, इसकी परीक्षा होगी। सबसे ज्यादा परेशानी हमारे सरकारी दफ्तेरों को हो सकती है, क्योंकि वो तो अभी ‘वर्क फ्राॅम होम’ के युग में ही प्रवेश नहीं कर पाए हैं। सरकारी कार्य संस्कृति फाइलों में जीती और चलती है। उनका आॅन लाइनीकरण अभी भी दूर की कौड़ी है। लिहाजा नस्ती, टीप, अवलोकनार्थ, आदेश, आवक जावक फाइलों के नीचे से ऊपर तक चढ़ने-उतरने में ही समय बर्बाद होता रहता है। कई अफसरों के ई-मेल का पासवर्ड तक बाबू को याद रखना पड़ता है। ऐसे में सरकारी संस्कृति में ‘वर्क फ्राॅम होम’ का अर्थ केवल ‘रेस्ट एट होम’ ही होता है। आॅन लाइन वर्क में त्वरितता और सीधी जवाबदेही भी जुड़ती है। सरकारी संस्कृति में सबसे ज्यादा परहेज इसी से किया जाता है। लेकिन दुनिया सरकारी कार्य संस्कृति तक सीमित नहीं है। आधुनिक तकनीक और वक्त के तकाजों ने कार्य संस्कृति को ‘कार्यस्थल संस्कृति’ से बाहर खींचना शुरू कर दिया है। ‘वर्क फ्राॅम एनीवेयर’ दफ्तनरी काम की परिभाषा को ही बदलने वाला है। भारत जैसे देश इसे अपनाकर प्रगति की दौड़ में आगे जाएंगे या पीछे, यह देखने की बात है। क्योंकि वर्क फ्राॅम एनीवेयर’ औपनिवेशिक काल की कार्यस्थल संस्कृति पर भी आघात करता है। क्या हम इसके लिए तैयार हैं?

अजय बोकिल/सुबह सबेरे से साभार

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