वसुंधरा का ठस और कुलबुलाते भाजपाइयों की रुदाली

अखिलेश अखिल

लखनऊ ट्रिब्यून दिल्ली ब्यूरो: राजस्थान उपचुनाव में भाजपा की हार से प्रदेश भाजपाई कुलबुला गए हैं। भाजपाई सिर्फ निराश नहीं है वे वसुंधरा की दवंगई से आहत भी हैं। प्रदेश बीजेपी नेताओं का मानना है कि हार जीत से कोई बड़ा अंतर नहीं पड़ता लेकिन जिस तरह से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पार्ट्री नेताओं के साथ व्यवहार कर कर रही है और पार्टी पर कब्जा कर बैठी है वह बीजेपी के लिए काफी खतरनाक है। आहात बजपके नेता अब केंद्रीय नेतृत्व से वसुंधरा को हटाने की मांग कर रहे है ताकि अगले चुनाव में बीजेपी की हालत ठीक की जा सके।

उपचुनाव में हार के बाद प्रदेश भाजपा नेताओं ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को एक पत्र भी लिखा है। जिसमे राजस्‍थान का नेतृत्व बदलने की मांग की है।कोटा जिले से ओबीसी सेल के भाजपा अध्‍यक्ष अशोक चौधरी ने पत्र लिख कर अमित शाह से कहा कि, “उपचुनावों में मिली हार से भाजपा के कार्यकर्ताओं में राज्‍य नेतृत्‍व के लिए असंतोष पैदा हो गया है। पार्टी कार्यकर्ता, वसुंधरा राजे के नेतृत्‍व में काम नहीं करना चाहते हैं। लोगों के मन में पार्टी के प्रति गहरा आक्रोश पैदा हो रहा है। लिहाजा मुख्‍यमंत्री वसुंधरा राजे इस्‍तीफा दें।” प्रदेश बीजेपी की इस रुदाली का असर अमित शाह पर कितना पडेगा यह देखना होगा लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि वसुंधरा के रहते अबकी बार बीजेपी की जीत पक्की नहीं मानी जा सकती। इसके कई कारण है।

आपको बता दें कि राजस्थान में भाजपा के सामने दोहरी चुनौती है। पहली सत्ता विरोधी लहर और दूसरी अपनी उपेक्षा से आहत नेता-कार्यकर्ता. भाजपा का एक खेमा यह मानता है कि इन दोनों चुनौतियों के लिए वसुंधरा राजे की कार्यशैली ज़िम्मेदार है। भाजपा के एक वरिष्ठ विधायक कहते हैं, ‘वसुंधरा राजे ने प्रचंड बहुमत मिलने के बावजूद राजस्थान की सर्वाधिक अलोकप्रिय सरकार दी है। समाज के किसी भी तबके के लिए सरकार ने कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं किया है। उल्टे समाज के कई वर्ग सरकार की सुस्ती की वजह से नाराज़ हो गए हैं। वरिष्ठ नेताओं को नज़रअंदाज़ करने और कार्यकर्ताओं से संवादहीनता की वजह से संगठन का ढांचा पूरी तरह से चरमरा गया है। यदि ऐसे ही चलता रहा तो विधानसभा चुनाव में पार्टी की दुर्गति होनी तय है। ’

असल में भाजपा जो वादे कर सत्ता में आई थी, उनमें से ज़्यादातर अधूरे हैं। सरकार के खाते में गिनाने के लिए तो कई उपलब्धियां हैं, लेकिन ज़मीन और समाज के बड़े तबकों पर इसका असर नहीं है। विशेष रूप से युवा सरकार से खुश नहीं हैं। वसुंधरा राजे ने चुनाव से पहले युवाओं को 15 लाख नौकरियां देने का वादा किया था, लेकिन अब तक 50 हज़ार को भी नौकरी नहीं मिली है। सरकार ने जो भर्तियां निकालीं भी, उनमें से ज़्यादातर क़ानूनी पचड़े में फंस गई। इसके अलावा सरकार की आंदोलनों से निपटने में देरी भी सिरदर्द साबित हुई है। सरकार की अनदेखी की वजह से ही डॉक्टरों की हड़ताल, आनंदपाल एनकाउंटर और किसान आंदोलन सरीखे प्रकरण तिल का ताड़ बन गए.दरअसल, वसुंधरा राजे का राजनीति करने का अपना अंदाज़ है। वे अपने काम में किसी भी प्रकार की दख़लअंदाज़ी बर्दाश्त नहीं करतीं। उनके करीबी पंचायती राज मंत्री राजेंद्र राठौड़ कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि राजस्थान में वसुंधरा राजे ही भाजपा हैं और भाजपा ही वसुंधरा राजे है। राजे के अब तक के सियासी सफ़र से यह साबित होता है कि प्रदेश भाजपा में उनकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता।

वसुंधरा ने संघ की पसंद और वरिष्ठता को दरकिनार कर घनश्याम तिवाड़ी, प्रताप सिंह सिंघवी, नरपत सिंह राजवी, गुरजंट सिंह, सूर्यकांता व्यास व बाबू सिंह राठौड़ सरीखे वरिष्ठ विधायकों को मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी। यही नहीं, भाजपा के कई नेता वसुंधरा की कार्यशैली की वजह से पार्टी छोड़कर राजनीति की अलग राह पकड़ चुके हैं। इनमें दो विधायक डॉ. किरोड़ी लाल मीणा और हनुमान बेनीवाल बड़े नाम हैं। इन दोनों नेताओं की अपनी जाति में गहरी पैठ है।
डॉ. किरोड़ी की पार्टी में वापसी के लिए संघ लंबे समय से प्रयास कर रहा है, लेकिन वे राजे के नेतृत्व में ‘घर वापसी’ करने को तैयार नहीं हैं। भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने वसुंधरा के ख़िलाफ़ खुलेआम बग़ावत कर रखी है।

लेकिन समस्या केवल वसुंधरा को हटा देने तक का नहीं है। उनकी जगह उनकी जगह मुख्यमंत्री के लिए ओमप्रकाश माथुर, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, अर्जुन मेघवाल, सुनील बंसल, गुलाब चंद कटारिया और अरुण चतुर्वेदी सरीखे नामों की चर्चा आम है। ये नाम काफी पहले से सामने आते रहे हैं इनमे से किसी का भी इतना बड़ा रुतबा नहीं है कि पूरी पार्टी सहर्ष उनका नेतृत्व स्वीकार कर ले। इसके साथ यह भी तय है कि वसुंधरा को हटाने की कोशिश पार्टी को टूट में बदल सकती है। आगे क्या होगा देखना होगा लेकिन यह भी साफ़ दिख रहा है कि संघ और बीजेपी के नेता कार्यकर्ता वसुंधरा को पसंद नहीं कर रहे।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
Loading...
E-Paper