वहीदा रहमान के प्यार में दीवाने थे गुरु दत्त, ‘चौदहवीं का चांद’ हो से शूरू हुआ इश्क मौत पर हुआ खत्म !

मुंबई: हिन्दी सिनेमा इतिहास में गुरु दत्त को महज एक इंसान के तौर पर नहीं देखा जाता। आज भी उनकी कई फिल्मों को सिनेमा की पढ़ाई कर रहे छात्र-छात्राओं को शोध के लिए दिया जाता है। गुरु दत्त ने अपने करियर में तो खूब नाम कमाया। लेकिन उनकी जिंदगी में भी काफी उठा-पटक रही। उन्हें प्यार में धोखा मिला। फिर उन्होंने शराब, सिगरेट और नींद की गोली को अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा बना लिया। सिर्फ 39 साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने खुदकुशी कर ली थी।उधर, वहीदा रहमान उन दिनों तेलुगु सिनेमा में नाम कमा रहीं थीं। एक फिल्म में उन्हें गुरु दत्त ने देखा और मुंबई लाने का फैसला कर लिया। अपने प्रोडक्शन की फिल्म ‘सीआईडी’ में गुरु दत्त ने वहीदा को पहला मौका दिया। इसके बाद साल 1957 में फिल्म प्यासा में गुरु दत्त और वहीदा की जोड़ी नजर आई। इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा एक नई क्रांति ला दी।1953 में गुरु दत्त ने गीता दत्त ने शादी कर ली लेकिन कुछ साल बाद उनकी जिंदगी में वहीदा रहमान आईं। इसी दौरान उनकी शादीशुदा जिंदगी में दरार आनी शुरु हुई। दोनों के बीच नजदीकियों की खबरें थीं और इसी दौरान गुरु दत्त को वहीदा के नाम से एक पत्र मिला, जिसमें उनसे मुलाकात के लिए कहा गया था। गुरु दत्त को इस पर शक हुआ और वह अपने दोस्त के साथ मौके पर पहुंचे, यहां उनकी पत्नी अपनी किसी दोस्त के साथ मौजूद थीं। घर आकर दोनों के बीच जबरदस्त झगड़ा हुआ।

साल 1957 में गुरु दत्त और गीता दत्त की शादीशुदा जिंदगी में दरार आ गई और दोनों अलग-अलग रहने लगे। इसके बाद अपना घर बचाने के लिए 1963 में गुरु दत्त ने वहीदा का साथ छोड़ दिया। पत्नी-बच्चों से दूर रहना और वहीदा का साथ छूट जाना गुरु दत्त से ये सब बर्दाश्त नहीं होता था। गुरु दत्त अपनी ढाई साल की बेटी से मिलना चाह रहे थे और गीता उसे उनके पास भेजने के लिए तैयार नहीं थीं। उन्होंने नशे की हालत में ही अपनी पत्नी को अल्टीमेटम दिया, बेटी को भेजो वर्ना तुम मेरा मरा हुआ शरीर देखोगी।

फिल्मों के लेखक अबरार अल्वी ने अपनी किताब ‘टेन ईयर्स विद गुरु दत्त’ में बताते हैं कि घटना की जानकारी पर जब वो आर्क रॉयल पहुंचे तो उन्होंने देखा, “गुरु दत्त अपने कुर्ते पायजामे में शालीनाता से लेटे हुए थे। बिस्तर के बगल में एक छोटी सी शीशी में गुलाबी रंग का तरल पदार्थ था।” यह देखते ही अबरार के मुंह से निकला, “आह! मृत्यु नहीं आत्महत्या!! इन्होंने अपने आपको मार डाला।” गुरु दत्त ने हिन्दी सिनेमा को कागज के फूल, प्यासा, मिस्टर एंड मिसेज 55, बाज, जाल, बाजी, चौंदवीं का चांद, साहिब बीबी और गुलाम जैसी फिल्में दी थीं। वह एक लेखक, निर्देशक, अभिनेता और फिल्म निर्माता भी थे। उनका जन्म 9 जुलाई, 1925 को बैंगलौर में हुआ था।

Source: Amar Ujala

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