वाह ताज, आह बापू

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दो दिनी सपरिवार भारत यात्रा से सकारात्मक नतीजा क्या निकलेगा, यह बाद में पता चलेगा, लेकिन लोग इस बात के मायने जरूर खोज रहे हैं कि ट्रंप बापू के साबरमती आश्रम से ज्यादा आगरा के ताजमहल में ज्यादा क्यों रमे? यूं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चाहत पर ट्रंप अहमदाबाद स्थित महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम गए जरूर, लेकिन उनकी और उनके परिवार की बॉडी लैग्वेंज से यह समझना मुश्किल नहीं था कि वह वहां केवल मेजबान का मन रखने गए हैं। उनकी बापू और उनके विचारों में भी कोई रुचि है, ऐसा नहीं लगा। इस बेमन-सी लगती यात्रा की पराकाष्ठा विजिटर्स बुक में ट्रंप की उस हैरानी भरी टिप्पणी से दिखी, जब उन्होंने लिखा- ‘टू माय ग्रेट फ्रेंड, प्राइम मिनिस्टर मोदी। थैंक्स फॉर दिस वंडरफुल विजिट।’ यानी जिन बापू को महसूस करने के लिए ट्रंप की साबरमती यात्रा कराई गई, उनके लिए बापू से ज्यादा महत्वपूर्ण मोदी का साथ होना था। हो सकता है कि ट्रंप साबरमती दिखाने के लिए मोदी के प्रति आभार व्यक्त करना चाहते हों। इसके विपरीत ट्रंप परिवार दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक ताजमहल देखकर गदगद था। ताज की विजिटर्स बुक में ट्रंप की टिप्पणी थी- ‘ताज भारतीय संस्कृति की समृद्ध धरोहर है। ताजमहल भारतीय संस्कृति की विविधतापूर्ण सुंदरता है। ताज ने हमें प्रेरित और चकित किया।’ लेकिन इस यात्रा के लिए उन्होंने मोदी का जिक्र नहीं किया। ट्रंप परिवार की बॉडी लैंग्वेज से लग रहा था कि यही वह जगह है, जिसे देखने की उन्हें बरसों से तमन्ना थी। शायद इसलिए भी कि अमेरिका ने लाख तरक्की कर ली हो, लेकिन दूसरा ताजमहल बनाना उसके बस की बात आज भी नहीं है।

वैसे साबरमती आश्रम और ताजमहल की आपस में कोई तुलना नहीं है। लेकिन दोनों में कुछ समान सूत्र जरूर है। पहला है पवित्रता और दूसरा है जीवंतता का अहसास। साबरमती आश्रम में मूल्यों और मानवीयता की पवित्रता है, तो ताज में अटूट प्रेम की पवित्रता। एक में सादगी है, तो दूसरे में भव्यता। एक में मन की शांति है, तो दूसरे में सौंदर्य का दिव्य भाव। बापू ने साबरमती आश्रम की स्थापना गुलामी की जंजीरों में जकड़े देश को आजाद कराने के लिए नैतिक शक्ति पीठ के रूप में की थी, तो ताजमहल मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी दिवंगत पत्नी मुमताज महल से प्रेम को संगमरमर की अमर कविता में बदल दिया।

कोई अहमदाबाद जाए और साबरमती आश्रम न जाए, यह नामुमकिन है। महात्मा गांधी ने इस आश्रम की स्थापना साबरमती नदी किनारे वर्ष 1917 में की थी। आश्रम में प्रतिदिन भगवद्गीता का पाठ होता है। गांधीजी ने 1930 में अंग्रेजों का नमक कानून तोडऩे के लिए अपनी दांडी यात्रा यहीं से शुरू की थी। अब इस आश्रम को राष्ट्रीय स्मारक का रूप दिया गया है। आश्रम में बापू से जुड़ी हर चीज और उनकी दैनिक उपयोग की वस्तुओं को भी करीने से रखा गया है। यहां एक विशाल पुस्तकालय और दर्शनीय संग्रहालय भी है। पूरा आश्रम 36 एकड़ में फैला है। सबसे खास बात यह है कि आश्रम की हर वस्तु हमें स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं और जज्बे को याद कराती है। बापू एक साधारण सी कुटिया में रहते थे, जहां उनसे मिलने दुनिया के दिग्गज आया करते थे। उनकी पत्नी बा का बाथरूम तो बांस की खपच्चियों से बना है। चरखा कातते हुए गांधीजी ने कई अहम चर्चाएं यहां की थीं। इसलिए यहां जो भी विदेशी मेहमान आता है, क्षण भर के लिए ही सही, अहिंसा और उसके पुजारी की नैतिक ताकत के आगे नतमस्तक हो जाता है। उनकी भावनाएं आश्रम के विजिटर्स बुक में दर्ज हैं। ट्रंप से पहले पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति साबरमती आए और अभिभूत हो गए। मसलन साल 2001 में भारत यात्रा पर आए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने विजिटर्स बुक में महात्मा गांधी के विचारों को विश्व की आध्यात्मिक धरोहर बताया था। यहां तक कि कट्टर राष्ट्रवादी माने जाने वाले इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी लिखा था- ‘मानवता के महान पैगंबरों में से एक महात्मा गांधी के स्थल की एक प्रेरणादायक यात्रा।’ 2018 में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने लिखा- ‘सच्चाई, विनम्रता और शांति का एक खूबसूरत स्थल। इसकी आज भी उतनी ही जरूरत है जितनी तब के समय में थी।’ यूं ट्रंप और उनकी पत्नी मेलानिया ने आश्रम में चरखे को लेकर कौतूहल जरूर जताया। ट्रंप की पत्नी काफी सरप्राइज थीं कि रूई से धागा ऐसे बनता है। दूसरी तरफ ताज महल पहुंचते ही ट्रंप परिवार अभिभूत था। ताज को उन्होंने बहुत ध्यान से देखा, समझा। वैसे ताज के प्रति डोनाल्ड ट्रंप की दीवानगी आज से नहीं है। अमेरिका की अटलांटा सिटी में उनकी एक इमारत का फ्रंट व्यू ताज से प्रेरित है। ताज देखकर ट्रंप की बेटी इवांका और उनके पति कुशनेर भी खुश दिखे। सबने ताज की पृष्ठभूमि में तस्वीरें भी खिंचवाईं। शायद सभी साबरमती की तुलना में ताजमहल से ज्यादा कनेक्ट कर पा रहे थे।

बहरहाल, सवाल सिर्फ इतना है कि ट्रंप को बापू से ज्यादा ताज ने आकॢषत क्यों किया? ट्रंप एक अमीर कारोबारी और राजनेता हैं। राजनीतिक रूप से उन्हें लोकलुभावन वादी, संरक्षणवादी और राष्ट्रवादी माना जाता है। उनके कुछ गुण प्रधानमंत्री मोदी से मिलते हैं। शायद इसीलिए दोनों में अच्छी केमिस्ट्री बनती दिख रही है। बापू को लेकर मोदी की भावना जगजाहिर है। अलबत्ता साबरमती में जो कुछ हुआ, वह मोदी के लिए भी अप्रत्यािशत रहा होगा। क्योंकि ट्रंप द्वारा विजिटर्स बुक में टिप्पणी लिखते वक्त प्रधानमंत्री मोदी पास में खड़े होकर गौर से देख रहे थे कि ट्रंप आखिर लिखते क्या हैं? क्योंकि अमूमन हर विजिटर विजिटर्स बुक में बापू के बारे में ही लिखता है। लेकिन ट्रंप ने न जाने क्या सोचकर बापू की कर्मस्थली में मोदी की तारीफ का कसीदा पढ़ा। यह कुछ वैसा ही है कि शादी में कोई दूल्हे की जगह उसके चाचा को ही नई गृहस्थी शुरू करने की बधाई दे डाले। तो क्या ट्रंप की निगाह में मोदी बापू से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं? क्या इसलिए क्योंकि आज मोदी से करीबी ही उन्हें अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में भारतवंशियों के वोट दिला सकती है? इसका निश्चित जवाब देना कठिन है। क्योंकि यह व्यक्ति की मानसिकता, सोच, संस्कार और प्राथमिकताओं पर भी निर्भर करता है। ट्रंप दोबारा चुनाव जीत सकते हैं, लेकिन उनकी कोई नैतिक प्रतिबद्धता नहीं है। एक बात और। व्यक्ति के हस्ताक्षर से भी उसका मनोविज्ञान पढ़ा जा सकता है। ट्रंप के हस्ताक्षर दिखने में नदी किनारे बिछे मछली पकडऩे के जाल की श्रृंखला जैसे लगते हैं। कुल मिलाकर ट्रंप की इस यात्रा में एक सवाल यह भी छुपा है कि क्या ट्रंप को साबरमती ले जाना सही था भी या नहीं?

अजय बी.

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...
Loading...
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper