विपक्ष में दम नहीं तो किसान ही लगाएंगे बीजेपी पर ब्रेक !

बीजेपी की कूटनीतिक राजनीति के सामने विपक्ष लथपथ है। हालत ये है कि बीजेपी कही भी विपक्ष को पासिंग भी नहीं छोड़ रही है। विपक्ष जाल तो बुनती है लेकिन बीजेपी जाल को कुतर कर आगे निकलती चली जाती है। अभी तीसरे सप्ताह में देश के 19 राज्यों से राज्यसभा सीट के लिए जो चुनाव होने है उसमे भी बीजेपी के रणनीतिकारों ने विपक्ष को पस्त कर दिया है। जितनी सीटें बीजेपी अपने वोट से जीत सकती है उससे ज्यादा सीट पर उसके उम्मीदवार खड़े हैं। विपक्ष यह सब देख भौंचक है। वह डर भी गया है। इधर सोनिया की डिनर पार्टी पर सबकी नजरें जरूर टिकी है लेकिन बीजेपी इस पार्टी के बाद आगे कौन सा खेल खेलेगी इस पर भी मंथन जारी है। लेकिन बीजेपी को भी एक डर है। वह डर है देश के किसानो को लेकर। बीजेपी भयभीत है कि अगर देश के किसान लामबंद हो गए तो क्या होगा ? बीजेपी को यह भी डर है कि जिस तरह देश के किसान सत्ता के खिलाफ खड़े होते दिख रहे हैं ,कही मुख्य विपक्ष की भूमिका में किसान ही सामने ना आ जाय। और अगर इन किसानो को साधने में विपक्ष कामयाब हो गयी तो 2019 का खेल बिगड़ भी सकता है। किसानो को लेकर बीजेपी और संघ के भीतर राजनीतिक निराशा है।

यह अद्भुत संयोग है कि देश के किसान लगातार बीजेपी की सरकारों को झुकने पर मजबूर कर रहे हैं। 2014 में बीजेपी ने किसानों की आत्महत्या समेत कई मुद्दों को अपना मुख्य चुनावी एजेंडा बनाया था। बीजेपी ने यूपी विधानसभा चुनाव में भी किसानों के मुद्दों को आधार बनाकर जबरदस्त चुनावी जीत हासिल की थी। यूपीए सरकार की जाने की एक बड़ी वजह किसानों की बदतर होती हालात और बढ़ती आत्महत्याएं थीं। किसान तब यूपीए सरकार से काफी नाराज थे। सरकार की नीतियां उन्हें नहीं भा रही थी। बीजेपी ने इस मसले को तब के चुनाव में खूब भुनाया था। मोदी की बातें किसानो को मरहम लगाया था। लेकिन मोदी सरकार के आने के बाद भी किसानों की हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया है।

पहले मंदसौर फिर सीकर और अब महाराष्ट्र में किसानों ने अपने मुद्दों को लेकर जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया है। हर जगह के किसानों के मुद्दे लगभग समान हैं। किसान बकाया भुगतान, कर्जमाफी और स्वामीनाथन कमिटी की रिपोर्ट को लागू करने की मांग कर रहे हैं। किसानों की यह भी मांग है कि मोदी सरकार स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को लागू करे, जिसमें यह कहा गया था कि किसानों को फसल उत्पादन की लागत पर 50 फीसदी का लाभ मिलना चाहिए। पीएम मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनावों में इस समिति की सिफारिशों को लागू करने का वादा भी किया था। लेकिन अब मोदी सरकार इस पर बात नहीं करती दिखती। ऐसा भी नहीं है कि किसानो की आत्महत्याएं कम हो गयी है। जान गवाने की कहानी आज भी जारी है। तब यूपी सरकार मौन थी और अब मोदी सरकार मौन है।

पिछले साल मध्य प्रदेश के मंदसौर और फिर राजस्थान के सीकर में किसान आंदोलन उभरा. इन दोनों किसान आंदोलनों ने बीजेपी की राज्य सरकारों को झुकने पर मजबूर किया। मंदसौर में किसानों के ऊपर गोली चलाने की घटना ने पूरे देश को उद्वेलित कर दिया था। शिवराज सिंह चौहान की आज अगर मध्य प्रदेश में हालात खराब मानी जा रही है तो इसकी सबसे बड़ी वजह किसानों का आंदोलन ही है। जिसका फायदा कांग्रेस को मिलता दिख रहा है। शिवराज सिंह चौहान और बीजेपी के लिए मध्य प्रदेश को फिर जीतने में अगर कोई सबसे बड़ा रोड़ा है तो वो वहां के किसान हैं। इसी तरह राजस्थान में सीकर में हुए किसान आंदोलन के बाद वसुंधरा राजे सरकार यह कहा था कि सभी किसानों का कर्ज माफ कर दिया जाएगा। राजे सरकार ने जल संसाधन मंत्री रामप्रताप की अध्यक्षता में एक कमिटी भी बनाई थी लेकिन इस कमिटी की जो सिफारिशें हैं वो टालमटोल की ओर इशारा कर रही हैं। राजस्थान में भी वसुंधरा राजे की स्थिति शिवराज सिंह चौहान की तरह कमजोर मानी जा रही है। यहां हालिया उपचुनाव में बीजेपी की हार को इसी रूप में देखने की जरूरत है। इन दोनों राज्यों में इस साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। महाराष्ट्र में हुए किसान मार्च से पहले देशभर के 62 किसान संगठन एक साथ मिलकर दिल्ली में विशाल प्रदर्शन भी कर चुके हैं। तमिलनाडु के किसानों का जंतर-मंतर पर प्रदर्शन भी एक राष्ट्रीयस्तर पर चर्चित रहा था।

जिस तरह से देश भर किसान संगठित होकर अपनी मांगो पर कायम हैं ऐसे में लग रहा है कि ये किसान आंदोलन बीजेपी सरकार के सामने एक मजबूत विपक्ष का काम कर रहे हैं। जब संसद और विधानसभाओं में विपक्ष चुनाव दर चुनाव कमजोर होते जा रहा है, उसी वक्त देश के किसानों का आंदोलन तेजी पकड़ रहा है। किसानों के ये आंदोलन कई लिहाज से खास हैं। सबसे पहली बात यह कि महाराष्ट्र और राजस्थान के किसान आंदोलन का नेतृत्व सीपीएम और अन्य लेफ्ट पार्टियों के किसान संगठनों ने किया। यह इसलिए भी खास है क्योंकि त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में लेफ्ट की पराजय के बाद भारत से लेफ्ट को समाप्त माना जा रहा है। दूसरी तरफ शिवसेना और आरएसएस समेत कई ऐसे पार्टियों और संगठनों ने इन किसान आंदोलनों का समर्थन किया है जो वैचारिक रूप से बीजेपी के करीब माने जाते हैं। इन किसान आंदोलनों की दूसरी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन आंदोलनों को आम लोगों का भी भरपूर समर्थन मिला है।

महाराष्ट्र के मुंबई में किसानों के मार्च को सोशल मीडिया पर समर्थन तो मिला ही साथ ही आम मुंबईवासियों ने किसानों की मदद की। फिल्म से जुड़े लोगों ने भी इसका समर्थन किया है। लेकिन जिस तरह से बीजेपी नेता पूनम महाजन ने किसानो को शहरी नक्सली कहा है उससे किसान काफी नाराज है। बीजेपी को लग रहा है कि देश के किसान अगर अपनी ज़िद पर कायम हो जाए तो उसकी बढ़ती राजनीति रुक सकती है। इस बार देशभर के किसानों ने आत्महत्या नहीं बल्कि संघर्ष का रास्ता एकजुट होकर अपनाया है, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी सरकार के लिए भी खतरनाक होगा। विपक्ष की राजनीतिक पार्टियां किसान आंदोलन को अपने साथ जोड़ने का भरसक प्रयास तो कर रही है लेकिन वर्षों से राजनीति के शिकार हुए किसान अपनी लड़ाई खुद लड़ने पर तुले हुए हैं।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper