विभागों के बँटवारे को छोड़िए…आओ गीत-संगीत की बात करें …

पूरा मध्य प्रदेश बेहाल है। पाँच मंत्री इसलिए परेशान हैं कि आज-कल में विभागों के बँटवारे के बाद उनके विभाग उनके पास रह भी पाएंगे या नहीं तो 28 मंत्री इसलिए परेशान हैं कि मंत्री बनने के लिए सौ दिन तक इंतज़ार करना तो फिर भी ठीक था अब क्या विभाग पाने के लिए भी आंखें पथरा ही जाएंगी। जैसे तैसे मंत्री पद की शपथ हो पाई थी कि लग रहा था शपथ लेते ही जिस तरह गाड़ी मिल गई है, ठीक उसी तरह विभाग भी मिल जाएंगे। पर शिवराज-महाराज का गठजोड़ अब विभाग वाले पाँच मंत्रियों पर भी भारी पड़ रहा है तो बिन विभाग वाले 28 मंत्रियों के मन में भी ठहर-ठहरकर हूक सी उठ रही है।

देश की आज़ादी के बाद वर्ष 1948 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘प्यार की जीत’ का एक गीत सबकी ज़ुबान पर चढ़ा था। कमर जलालाबादी के नगमें को आवाज़ दी थी सुरों का जादू बिखेरने वाले ख्यात गायक मोहम्मद रफ़ी ने।संगीतकार जोड़ी थी हुस्नलाल-भगतराम की।

मध्यप्रदेश सरकार, महाराज-शिवराज, विभागों वाले मंत्री, बिना विभागों वाले मंत्री का तनाव छोड़िए और पिछले दस दिनों में ख़बरों के इसी बोझ को हल्का करते हुए आइए इस गीत का लुत्फ़ उठाते हैं …

एक दिल के टुकड़े हज़ार हुए
कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा
बहते हुए आँसू रुक न सके
कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा

जीवन के सफ़र में हम जिनको
समझे थे हमारे साथी हैं
दो क़दम चले फिर बिछड़ गये
कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा

आशाओं के तिनके चुन चुनकर
सपनों का महल बनाया था
तूफ़ान से तिनके बिखर गये
कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा…..

इस गीत के सभी स्टैन्जा मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार और इसको गिराकर बनी शिवराज सरकार, दोनों ही दलों के विधायक पूर्व मंत्री वर्तमान मंत्री और अगर कहें तो चार निर्दलीय दो बसपा और एक सपा विधायक सभी पर लागू हो रहे हैं।
पहले स्टैन्जा पर ग़ौर करें तो चाहे जो सरकार से हट गए हों या फिर जो सरकार में हैं, सभी के दिलों का हाल तो वही है टुकड़े कब कितने हुए हैं यह अलग बात है।आँसू भी बहे हैं कब-किसने बहाए ये अलग बात है। कौन कहाँ गिरा इसकी बात करना बेमानी है।
गीत का दूसरा स्टैन्जा कांग्रेस भाजपा और महाराज तीनों पर लागू होती है। कांग्रेस नेताओं की आँखों में आँसू होना स्वाभाविक है क्योंकि सरकार को तो उन्होंने ही खोया है। आँसू न भी होंगे तब भी आँखें नम तो होंगी ही।आख़िर महाराज से पाँच साल तक की उम्मीद तो की ही थी। और यह भी सोचा होगा कि महाराज चले भी गए तब भी विधायक तो संग दे ही देंगे।पर उम्मीदों के टुकड़े भी हज़ार हो गए और कोई यहाँ गिर गया कोई वहाँ गिर गया।आख़िर महाराज ने दो क़दम साथ निभाया और अलविदा कह दिया।स्थिति भाजपा की भी कैसी है यह फ़िलहाल भाजपा नेता ही बयां कर सकते हैं।और भाजपा भी अभी यह दावा नहीं कर सकती कि महाराज कितने क़दम तक साथ देंगे।क्योंकि महाराज अपने प्रदेश के नागरिकों के लिए कुछ भी कर सकते हैं उन्हें न्याय दिलाने के लिए सम्मान दिलाने के लिए सरकारों की क़ुर्बानी महाराज के लिए बहुत बड़ा विषय नहीं है। अब महाराज के कंधों पर कमलनाथ सरकार बनने के पहले जनता को दिए गए वचनों का बोझ है तो भाजपा सरकार में शामिल होने के बाद यह घोषणापत्र भी जनता के हितों की बात करने पर मजबूर करेगा। सही मानें तो महाराज दिल से जनता के साथी तो हैं ही…जनता के हित पूरे होते रहेंगे तब तक महाराज के क़दम सरकारों के साथ चलते रहेंगे। बाद में सरकारें बुरा मानें तो मानें। आख़िर मिलना बिछड़ना नियति की बात है।

गीत का अंतिम स्टैन्जा भी निवर्तमान और वर्तमान दोनों सरकारों पर लागू होता है। आशाओं के तिनके चुन चुनकर कांग्रेस ने भी सपनों का महल बनाया था तो भाजपा ने भी बनाया है। तूफ़ान आया और कांग्रेस के सपनों का महल ढह गया है।तूफ़ान आएगा तो भाजपा के सपनों के महल को ढहने से भी कोई नहीं रोक पाएगा। फिर कौन सा तिनका कहाँ गिरता है इसकी परवाह कोई नहीं करता।

गीत अच्छा है। इसे कोई नकार नहीं सकता।मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में इस गीत को सुनने की ललक निश्चित तौर से उन सभी में होगी जो ख़ुद को नई जनरेशन नहीं मानते। एक और अच्छी बात है कि यह गीत देश के आज़ाद होने के बाद रिलीज़ हुई फ़िल्म का है। तब संविधान आकार लेने की प्रक्रिया में था। और अब इसी संविधान की चिंता की जा रही है।

यूरोप के प्रसिद्ध चिंतक अल्बेयर कामू शोपेन हावर एवं नीत्शे के सौंदर्य-शास्त्र से प्रभावित थे और अपने उन कॉमरेड दोस्तों से भी बहुत अधिक प्रभावित थे,जिनको संगीत का अच्छा ज्ञान था।वह स्वयं स्वीकारते थे कि बिथोवन,शोंपा और बैंगनर जैसे महान संगीतज्ञ उन्हें उनकी जड़ता और अवसाद से मुक्त कर सकते हैं।
जून 1932 में कामू का संगीत पर एक निबंध ‘सुड’ पत्रिका में छपा जिसमें उन्होंने लिखा था कि केवल संगीत की क्षमता है कि जो व्यक्ति को उसकी तात्कालिकता से परे एक और शुद्ध जगत में ले जाए, जहाँ आदमी अपने टुच्चे स्वार्थों एवं ओछी माँगों को भूल सके, जहाँ वह अपनी आत्मा की गहराई में उतर सके।अस्तित्व का सबसे महान उद्देश्य वही है।मसेद ने ठीक ही कहा था कि संगीत के कारण ही ईश्वर के प्रति मेरी आस्था गहरी हुई।यह अंश अल्बेयर कामू की किताब ‘वह पहला आदमी’ से हैं।
उम्मीद है कि विभागों के बँटवारे की बात छोड़कर गीत-संगीत और राजनीति का यह ज़िक्र सबकी फ़िक्र दूर करेगा।यह पढ़ते-पढ़ते आप गीत गुनगुनाने लगे होंगे, हो सके तो कामू की यह किताब का यह अनुवाद भी पढ़िए..निश्चित ही अच्छा महसूस होगा।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

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