शकुंतला यूनिवर्सिटी का झगड़ा कहीं 20 करोड़ी भर्तियों को लेकर तो नहीं

लखनऊ : जिस विश्‍वविद्यालय को राष्ट्रीय स्‍तर की ख्‍याति मिलनी चाहिए थी, जिसे सरकार की ओर से भरसक सहायता और प्रश्रय मिलना चाहिए था, वह अब विवादों में अभिशप्त होता दिख रहा है। एक ओर तो विभागीय मंत्री इस विश्‍वविद्यालय को अपनी गिरफ्त में रखने की कवायद छेड़े हैं, वहीं कुलपति इसके प्रशासन अपनी उंगलियों में नचाये रखना चाहते हैं। झगड़ा इतना भारी पहुंच चुका है कि पूरे विश्‍वविद्यालय के दो खेमे बन चुके हैं, और दोनों ही एक-दूसरे को कैसे भी हो नीचा दिखाने पर आमादा हैं।

सरकार ने एक ओर जहां इस मामले पर जांच पर जांच कमेटियों का गठन करने का अभियान छेड़ दिया है, वहीं कुलपति ने उसके खिलाफ हाईकोर्ट तक गुहार लगा दी है। लेकिन इस मामले में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इस पूरे झगड़े को यहां होने वाली भर्तियों की फसल काटने की साजिशें सूंघ रहे हैं। आरोप तो यहां तक हैं कि इन भर्तियों के चलते इसमें बीस करोड़ रूपयों तक का वारान्‍यारा हो सकता है।

इस विश्‍वविद्यालय का नाम है डॉ शकुंतला मिश्रा विकलांग पुनर्वास विश्‍वविद्यालय। अपने अनोखे दायित्व संकल्प के तहत स्थापित विश्वविद्यालय की स्थापना बसपा सरकार में हुई थी जब मायावती के बेहद करीबी प्रभावशाली और प्रख्यात विधिवेत्ता सतीश चंद्र मिश्र ने अपनी मां के नाम पर इस विश्वविद्यालय के रूप में न केवल परिकल्‍पना की, बल्कि उसे साकार रूप देने के लिए पूरी सरकारी तामझाम खड़ा कर दिया। हालत यह थी कि उसे मूर्त रूप तक पहुंचाने के लिए सतीश चंद मिश्र एक टांग पर खड़े रहते थे, इसके बाद ही उनका यह भागीरथी-प्रयास पूरा हो पाया।

लेकिन इसके पहले कि यह विश्वविद्यालय बेहतर तरीके से काम शुरू कर पाता, सरकार बदल गई। आते ही अखिलेश यादव के नेतृत्‍व वाली समाजवादी सरकार ने इस विश्वविद्यालय की सत्ता अपने हाथों में ले ली। नए कुलपति के तौर पर लखनऊ विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर डॉक्‍टर निशीथ राय को बना दिया गया। प्रो राय उस वक्त प्रोफेसर एवं पर्यावरण अध्ययन केंद्र के निदेशक हुआ करते थे। अभी खरामा-खरामा कामधाम शुरू हो गया कि अचानक फिर सत्ता बदली और योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में काबिज हो गई। सरकार को मजबूत बनाने की फिक्र में भाजपा ने उन लोगों को अपने साथ गलबहियां करना शुरू कर दिया, जो बेहद छोटे से और क्षेत्रीय राजनीतिक दल के तौर पर उभरे थे। मसलन भारतीय समाज पार्टी जैसे जातीय आधार वाले दल।

इस दल ने चार सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन केवल एक ही सीट पर जीत मिल पायी थी। वे थे भासपा के अध्‍यक्ष ओमप्रकाश राजभर, जो गाजीपुर से चुनाव जीते। गठबंधन में ओमप्रकाश राजभर को विकलांग विकास विभाग मिला। अब यह दीगर बात है कि ओमप्रकाश राजभर की ख्‍वाहिश थी कि कि उन्हें कम से कम मुख्यमंत्री का ओहदा मिले, लेकिन उनकी हैसियत के हिसाब से भाजपा ने उन्हें विकलांग विकास विभाग तक उन्‍हें समेट दिया। कुछ भी हो, लेकिन राजभर के इस विभाग में सबसे बड़ा संस्‍थान तो डॉ शकुंतला मिश्रा विकलांग पुनर्वास विश्वविद्यालय भी आता है, जिसके कुलपति हैं प्रोफेसर निशीथ राय।

निशीथ रॉय

बस, असल कहानियां यहां से शुरू होतीं हैं। सूत्र बताते हैं इस विश्वविद्यालय में तकरीबन सवा सौ नियुक्तियां होती होनी थी। सरकार बनते ही सूंघने में माहिर लोगों ने सूंघ लिया था कि इस विश्‍वविद्यालय में होने वाली इन बड़ी तादात वाली भर्ती खासी फलदार साबित हो सकती है। सूत्र बताते हैं कि प्रति भर्ती 15 से 18 लाख को आंक लिया गया था। सूंघ-वीरों का आंकलन था कि इस तरह करीब बीस करोड़ रूपयों की उगाही हो सकेगी। इसीलिए कोशिशें की गईं कि भर्ती के मसले को ही केंद्र पर रखा कर निपटाया जाए। इसका निदान खोजना शुरू हो गया। तय किया जाने लगा कि इन भर्तियों को जल्‍दी से जल्‍दी निपटा लिया जाए, ताकि जो भी सौदा हो, उसे फौरन ही फाइनल कर दिया जाए। इसके लिए कोशिशें शुरू हो गयीं कि इन भर्तियों को विश्‍वविद्यालय प्रशासन के चंगुल से बाहर खींच लिया जाए, और उसके बाद यह सारा काम सीधे विकलांग विभाग द्वारा कराया जाए।

लेकिन इस मामले में कुलपति प्रो निशीथ राय अपने अधिकार छोड़ने को तैयार नहीं थे। सूत्र बताते हैं कि उनका साफ मानना था कि शैक्षिक संस्‍थान को राजनीतिक चंगुल से दूर ही रखना चाहिए। विश्वविद्यालय सूत्र बताते हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन भर्तियों के लिए पूरा मामला अधीनस्थ भर्ती आयोग अथवा किसी अन्य चयन बोर्ड के तौर पर चिन्हित करने की कार्रवाई शुरू दी थी। बस यही बात ठन गई प्रोफेसर निशीथ राय और ओमप्रकाश राजभर के बीच। झंझट शुरू हो गया। क्‍योंकि अब इन भर्तियों को तब ही निपटाया जा सकता था, जब निशीथ राय को कुर्सी से हटाया जा सके। पहला धमाका हुआ प्रोफेसर निशीथ राय को कुलपति पद से हटा देने के रूप में।

(मेरी बिटिया से साभार)

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