शांत चम्बल में बदल रही है विधवा महिलाओं की बेरंग जिंदगी

अखिलेश अखिल

अब चंबल की घाटी पहले जैसी नहीं रही। डाकुओं का साम्राज्य यहां खत्म हो गया है। सरकार की योजनाएं यहां पहुँचने लगी है। लेकिन डाकुओं की लड़ाई में बड़ी संख्या में विधवा हुई महिलाएं आज भी सामंती सोच की शिकार है। लेकिन कहते हैं कि हर काल में कोई समाज सुधारक पैदा होता है। पुराने जमाने में विधवा विवाह को लेकर महान समाज सुधारक राजाराम मोहन राय ने संघर्ष किया था अब चम्बल की विधवा महिलाओं को ख़ुशी देने के लिए दूसरे राजा राम मोहन राय के रूप में मनोज डंडौतिया काम करते नजर आ रहे हैं। मनोज अबतक इस इलाके की सैकड़ों विधवा महिलाओं का विवाह करा चुके हैं। चम्बल की विधवाओं की बदलती तस्वीर पर हम चर्चा करेंगे उससे पहले थोड़ी जानकारी चम्बल के बारे में भी ले ली जाय।

जब भी कभी डकैत शब्द का जिक्र होता है, तो हमारे जेहन में चम्बल घाटी का नाम कौंध उठता है। चम्बल घाटी के अंधेरे बीहड़ एक समय डकैतों के लिए अभयारण्य हुआ करते थे, जहां से वे डकैती, अपहरण और हत्याओं का ‘कारोबार’ चलाया करते थे। चम्बल नदी का क्षेत्र डकैतों के मामले में ऊर्वर रहा है। इस नदी घाटी के क्षेत्रों में सामन्तवादी व्यवस्था से दमित और आजिज होकर कई लोगों ने बंदूक थाम कर खुद को बागी घोषित कर दिया। ये लोकप्रिय भी होते थे। कई मामलों में इन डकैतों को अपने जाति-समूहों और क्षेत्र के लोगों का समर्थन प्राप्त था। सामंती सोंच और जातीय गिरोहबंदी की वजह से चम्बल के डाकुओं ने कितनी जाने ली कोई नहीं जानता। लेकिन इस गिरोहबंदी में सैकड़ों महिलाये विधवा हो गयी। जवानी में विधवा हुई महिलाओं की तादात सबसे ज्यादा इसी चम्बल के गाँव में है। अब चम्बल शांत है लेकिन विधवाओं की रुदाली आज भी जनमानस को बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देता है।

आन-बान-शान के लिए विख्यात और दस्युओं, रूढ़ियों और कुरीतियों के लिए कुख्यात रहे चंबल में के गाँव में विधवा विवाह की बात पर भी तलवारे खिंच जाती थी ,बंदूकें गरज उठती थी लेकिन समय के साथ अब सबकुछ बदल सा गया है। अब चम्बल में विधवा के पुनर्विवाह को गलत नहीं माना जाता। एक स्थानीय युवक ने इस रूढ़िवादिता के खिलाफ पांच साल पहले एक मुहिम शुरू की, जो अब बदलाव का वाहक बन चुकी है। कह सकते हैं चम्बल के इस शांत बीहड़ में कोई दुसरा राजा राममोहन राय प्रकट हो गया है जिसका मकसद विधवाओं के सूखे चेहरे पर खुशियां बिखेड़ना है।

चंबल के लिए राजा राममोहन राय से कम नहीं है मनोज डंडौतिया। उनके ही प्रयासों का नतीजा है कि यहां सैकड़ों बेरंग जीवन खुशियों के नए रंगों से भर गए हैं। मनोज ने अकेले ही यह पहल शुरू की थी, आज अनेक युवा उनके साथ हैं। इनके प्रयासों से अंचल में 300 से ज्यादा विधवा विवाह कराए जा चुके हैं। सबसे बड़ी कामयाबी यह कि लोगों की मानसिकता में भी बदलाव नजर आने लगा है। मुरैना जिले के छोटे से गांव सर्वजीत का पुरा में रहने वाले मनोज पेशे से किसान हैं।

मुरैना से शुरू इनकी मुहिम पूरे चंबल में विस्तार पा चुकी है। अंचल की विधवा युवतियों के लिए सुयोग्य वर तलाशने का काम मनोज की पूरी टीम करती है। मनोज के मुताबिक शुरू में उन्हें लोगों, खासकर सवर्ण समाज के लोगों को इस बात के लिए तैयार करने में काफी संघर्ष करना पड़ा। लोग अपनी विधवा बहू की दोबारा शादी करने के लिए राजी नहीं होते थे। यही कारण था कि बात-बात पर गोली चला देने वाले चंबल के लोगों के बीच ऐसी बात करने की हिम्मत भी किसी ने नहीं जुटाई थी। परेशानी सिर्फ ससुराल वालों को समझाने तक सीमित नहीं थी। महिला के मायके वालों को भी इसके लिए राजी करना होता था।

साल-साल भर तक प्रयास करना पड़ता। कुछ जगहों पर तो तगड़ा विरोध भी झेलना पड़ा। लेकिन आखिर में बदलाव आने लगा। मनोज की टीम न केवल 300 से अधिक विधवा विवाह करवा चुकी है बल्कि अब तक 900 से ज्यादा तलाकशुदा और अनाथ बच्चियों का विवाह भी इन युवकों ने करवाया है। इसके लिए उन्हें अनेक प्रशंसा पत्र दिए गए हैं।

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