‘शाह समूह’ और ‘जेटली क्लब’ में बटा बीजेपी का तीसरा ग्रुप

अखिलेश अखिल

लखनऊ ट्रिब्यून ब्यूरो: ऊपर से सबकुछ ठीक ठाक है लेकिन अंदर से बहुत कुछ ठीक नहीं है बीजेपी के भीतर। हो सकता है यह सब जानबूझकर किया जाता हो या फिर नेचुरल ही हो रहा हो। बीजेपी के भीतर इस समय लगभग तीन गुट काम करते नजर आ रहे हैं। इनमे एक गुट पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का है जिसे शाह समूह के नाम से भी जाना जा रहा है। शाह समूह में कई बड़े नेता शामिल हैं साथ ही अधिकतर राज्यों के मुख्यमंत्री अमित शाह के घेरे में हैं। बीजेपी में बहुत सारे मुख्यमंत्री शाह के रहमो करम पर ज़िंदा हैं और उनकी पहुँच सीधे अमित शाह तक बानी हुयी है। दूसरी तरफ बीजेपी के भीतर जेटली क्लब भी बना हुआ है। यह क्लब भी कम ताकतवर नहीं। इस क्लब में मंत्रिमंडल के बड़े मंत्री शामिल हैं और जेटली के प्रति ईमानदार और प्रतिबद्ध भी। एक तीसरा ग्रुप भी है जो या तो सीधे पीएम मोदी के साथ सम्बन्ध बना कर चलने में यकीं कर रहा है या फिर निष्पक्ष होकर सबकुछ देख रहे हैं।

माना जा रहा है कि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, रेल मंत्री पीयूष गोयल, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री डॉक्टर जीतेंद्र सिंह, शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी, पर्यटन मंत्री अल्फोंस कन्नथनम, बिजली मंत्री आरके सिंह और खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ जेटली के खेमे के बताए जाते हैं। दूसरी तरफ सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। उधर गृह मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज खुद को दोनों ही गुट से अलग रखते हैं। सड़क परिवहन और जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी भी किसी गुट के बजाय संघ के करीबी हैं।

मुख्यमंत्रियों के बीच शाह के प्रति ईमानदारी ज्यादा बतायी जा रही है। अधिकतर मुख्यमंत्री शाह तक अपनी पहुंच बनाने में लगे रहते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी अमित शाह के अपने हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी शाह को अपना रक्षक बना लिया है। क्योंकि जितनी बार खट्टर की कुर्सी खतरे में पड़ी अमित शाह ने ही उनका बचाव किया। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने पहले अमित शाह के साथ बातचीत बढ़ाई थी लेकिन अब वे जेटली के ज्यादा करीब बताई जाती हैं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस पहले अमित शाह की ही पसंद थे, लेकिन अब वे नरेंद्र मोदी के बेहद करीब हैं और पिछले दिनों शाह से ज्यादा उनकी नजदीकी जेटली से हो गई है।

झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुबर दास भी शाह खेमे में शामिल हैं। हर बार अमित शाह ही उनपर कृपा बरसाते हैं और प्राणदान देते हैं। बिहार एक ऐसा राज्य है जहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी दोनों ही अरुण जेटली के करीबी हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अभी किसी गुट से नहीं जुड़ पाए हैं। योगी सीधे पीएम से अपनी बात कहते हैं और काम करते हैं।

उधर गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर भी पहले नरेंद्र मोदी के ही करीब थे, लेकिन अब वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ-साथ अमित शाह के भी नजदीक हो गए हैं। उत्तराखंड और हिमाचल के मुख्यमंत्री भी अमित शाह के ही गुट के हैं क्योंकि इन दोनों को कुर्सी पर बिठाने में शाह की ही बड़ी भूमिका रही है। उधर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बड़ी पशोपेश में हैं। छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह भी शाह गुट से अभी अलग बताये जाते हैं और पीएम मोदी से अपनी बात कहते हैं।

अब सवाल यह उठता है कि जब नरेंद्र मोदी जानते हैं कि उनकी पार्टी दो गुटों में बंटती जा रही है तो फिर वे इसके लिए कुछ करते क्यों नहीं हैं? माना जा रहा है कि इस तरह की राजनीति पीएम मोदी गुजरात में खेल चुके हैं आनंदी और शाह के बीच संतुलन बैठाकर। कुछ वही खेल यहां भी जारी है। बीजेपी में कुछ ऐसे भी नेता हैं जो किसी गुट से अलग होकर अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने में लगे हैं। यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा ,कीर्ति आजाद जैसे लोग आगे क्या करेंगे इस पर सबकी नजरें टिकी हैं। हालांकि इन नेताओं ने एक राष्ट्र मंच का निर्माण तो किया है लेकिन उस मंच की अग्नि परीक्षा होनी अभी बाकी है।

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