शिवराज बनाम नीतीश और संवेदना व नियमों का लाॅकडाउन ?

क्या मानवीय संवेदनाअों को भी राजनीतिक संवेदनाअो के चश्मे से देखा जाना चाहिए? क्या परदेस मे रह रहे छात्रों की गुहार और मजदूरों की पुकार में कोई तात्विक भेद है? और यह भी कि इंसानी तकलीफों और नियमों की मर्यादा में कौन सा तत्व ज्यादा महत्वपूर्ण है? ये तमाम सवाल इसलिए क्योंकि मानवीय संवेदनाअों चलते मप्र के मुख्यमंत्री और बच्चों के मामा शिवराजसिंह चौहान ने यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के नक्शे कदम पर चलते हुए देश को कोचिंग हब कोटा में फंसे मध्यप्रदेश के छात्रों को वापस लाने का ऐलान कर दिया है। इस फैसले ने बिहार के मुख्यामंत्री नीतीश कुमार पर भी इस बात का नैतिक दबाव बढ़ा दिया है कि वे भी कोटा में फंसे बिहार के बच्चों को वापस लाएं। जबकि नीतीश लाॅक डाउन के पक्ष में बयान दे चुके हैं कि हर अगर सभी अपने लोगों को दूसरे राज्यों से वापस लाने लगे तो लाॅक डाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा। जहां बिहार में नीतीश इस मुद्दे पर विपक्ष के निशाने पर हैं तो इस मामले में मोदी सरकार के दोहरे मापदंड भी दिख रहे हैं। दोहरे इसलिए क्योंकि उसने यूपी और एमपी को कोटा से अपने छात्रों को लाने की इजाजत तो दे दी, लेकिन महाराष्ट्र में ठाकरे सरकार के उस फैसले पर रोक लगा दी,जिसमें उन्होंने राज्य में आए प्रवासी मजदूरों की घर वापसी का मेगा प्लान बनाया था।

इसमें दो मत नहीं कि लंबे लाॅक डाउन के कारण जो छात्र दूसरे राज्यो में फंस पड़े हैं और इनमें से ज्यादातर को राशन और पैसे की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इससे भी ज्यादा वो उस अकेलेपन से परेशान है, जो लाॅक डाउन के कारण भुगतना पड़ रहा है। ऐसे में वो किसी भी तरह अपने घरों को लौटना चाहते हैं। उनके अभिभावक भी अपने बच्चों को लेकर चिंतित हैं। कई छात्रों ने अपने-अपने राज्यों के मुख्यमंत्रियों से गुहार की है कि कृपया हमे किसी तरह यहां से निकालें। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने सबसे पहले इस गुहार पर प्रतिसाद देते हुए तत्काल कई बसें भेजकर कोटा से बच्चों को वापस बुलवा लिया। राजस्थान सरकार ने भी इस कार्य में उनकी मदद की। उसी तर्ज पर अब शिवराज ने भी कोटा में फंसे मप्र के लगभग 1100 बच्चों की वापसी की तैयारी शुरू कर दी है। इससे जहां मामा के रूप में उनकी संवेदनाएं और मुखर हुई हैं तो ऐसे बच्चों और उनके मां-बाप ने भी राहत महसूस की है। बेशक एक मुख्यममंत्री भी मां-बाप की तरह अपने राज्य के बच्चों का नैतिक अभिभावक होता है। इस हिसाब से शिवराज जो रहे हैं, वह उचित ही है, लेकिन मानवीय संवेदना के पुदीन हरा की यह गोली भी बिहार में राजनीतिक टिंक्चर आयोडीन साबित रही है।

‘सुशासन बाबू’ कहे जाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कोरोना काल में सख्त लाॅक डाउन के पक्षधर रहे हैं। उन्होंने बिहार में शुरूआती ढील के बाद इसे सख्तीे से लागू किया भी है। लेकिन पहले बिहार के प्रवासी मजदूरों की वापसी और अब बिहारी छात्रों की गृह राज्य में वापसी का मुद्दा उनके गले की हड्डी बन गया है। यह सवाल तब भी उठा था, जब लाॅक डाउन में भी योगी अादित्यनाथ ने यूपी के मजदूरों की दिल्ली से थोक में घरवापसी करवाई थी। जब उन्होंने कोटा में फंसे यूपी के छात्रों को भी घर पहुंचाया तो नीतीश ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया था कि अगर सभी अपने-अपने लोगों को घर लिवाते रहे तो लाॅक डाउन और सोशल ‍िडस्टेसिंग की मर्यादा का क्या मतलब रह जाएगा? यानी सभी को आने-जाने की छूट देनी है तो इतनी संचार पाबंदियों का मतलब क्या है? दूसरे शब्दों में कहें तो यह सीधे-सीधे कोरोना का न्यौतने का दुस्साहस है।

तकनीकी तौर पर नीतीश कुमार सही हैं, क्योंकि आवागमन की बंदिशें खोलनी हैं तो फिर इन्हें कायम रखन जरूरी क्यों है? नीतीश का इशारा मोदी की तरफ था कि वे इस तरह के अभियानों पर रोक लगाएं। लेकिन उल्टे नीतीश बिहार में विपक्ष के निशाने पर आ गए हैं कि उन्हें बिहार के बच्चों की चिंता ही नहीं है। इस पर बड़ी चोट यह हुई कि बिहार में एक भाजपा विधायक अनिल सिंह कोरोना के चलते कोटा से अपने बच्चे को वापस ले आए और इसके लिए नवादा जिला प्रशासन ने इसकी लिखित अनुमति भी दे दी। इसने नीतीश को और राजनीतिक मुसीबत में डाल दिया। कल तक उनके करीबी रहे प्रशांत किशोर ने ट्विटर पर एक चिठ्ठी की कॉपी जारी करके सवाल उठाया कि जब सरकार ने बिहार के बच्चों को कोटा से लाने से इंकार कर दिया है तो सत्ता पक्ष के एक विधायक के बेटे को कोटा से लाने की विशेष अनुमति क्यों दी गई ? इस मामले में आपकी मर्यादा क्या कहती है? इसके पूर्व विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव ने आरोप लगाया था कि बिहार सरकार दूसरे प्रदेशों में फंसे राज्य के छात्रों और मजदूरो के प्रति असंवेदनशील है। उसने अपने लोगों को बेसहारा छोड़‍ ‍िदया है। तेजस्वी ने नीतीश पर यह कहकर हमला किया कि कहां तो वो छात्रों की घरवापसी को लेकर यूपी के सीएम योगी को नियमों का पाठ पढ़ा रहे थे और कहां उनकी नाक के नीचे राज्य के एक भाजपा विधायक ही अपने बेटे को वापस ले आए हैं। उस भाजपा के, जो नी‍तीश के साथ सत्ता में साझीदार है।

इस मुद्दे पर बिहार भाजपा मौन है, लेकिन परोक्ष रूप से भाजपा ने नीतीश को सियासी भंवर में फंसा दिया है। वो भाजपा विधायक पर कार्रवाई कर नहीं सकते और भाजपा राज्यों के मुख्यमंत्रियों की नीयत पर उंगली उठाने का उन्हें अब कोई नैतिक अधिकार नहीं रह गया है। क्योंकि जब एक एमएलए का बेटा वापस लाया जा सकता है तो आम लोगों के बेटे-बेटियों ने क्या गुनाह किया है? बिहार के उन लाखों प्रवासी मजदूरों ने क्या अपराध किया है, जो दूसरे राज्यों में भूख और पैसे के लिए परेशान हैं और घर लौटने को बेताब हैं?

तो क्या इसे बिहार में भाजपा की भावी रणनीति का संकेत मानें? क्योंकि बिहार में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। अभी तक मोटे तौर पर यही माना जा रहा है कि भाजपा नीतीश के नेतृत्व में जदयू के साथ गठबंधन में चुनाव में उतरेगी। लेकिन दूसरी तरफ वह कोरोना जैसे महासंकट में भी अपनी सियासी लाइन अलग ले रही है, सतही तौर पर यह लाइन मानवीय संवेदना के रैपर में लिपटी है, जिसका प्रकट विरोध नीतीश को महंगा पड़ सकता है। दूसरा दंश मोदी सरकार का भी है। वह जहां वह लाॅक डाउन में भी अपने मुख्यमंत्रियों को तो दूसरे राज्यों में फंसे छात्रों को गृह राज्य वापस लाने दे रही है, वहीं प्रवासी मजदूरों के मामले में गैर भाजपाई मुख्यमंत्रियों की मुश्कें कसे हुए है। जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने दूसरे राज्यों के प्रवासी मजदूरों को लौटाने का ऐलान किया तो केन्द्र सरकार ने उसे इस बिना पर रूकवा ‍िदया कि इससे लाॅक डाउन का मकसद ही ध्वस्त हो जाएगा। चाहें तो केवल राज्यों के भीतर ही मजदूर एक से दूसरे अंचल में जा सकते हैं। इन सियासी लाइनों और चालों का असर कोरोना का माहौल ठंडा पड़ने के बाद खुलकर दिखेगा। ऐसे में नए राजनीतिक समीकरण भी बन सकते हैं। इसी के साथ यह गंभीर सवाल भी जवाब चाहता है कि क्या छात्रों और मजदूरों के मामले में लाॅक डाउन की आचार संहिता अलग-अलग है?

अजय बोकिल/सुबह सबेरे से साभार

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