शुरू हुई अयोध्या मामले की सुनवाई, जानिए कैसे शुरू हुआ यह विवाद

नई दिल्ली: अयोध्या में बाबरी मस्जिद-श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मालिकाना हक से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज से रोज सुनवाई शुरू हो गई है। सन 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला दिया था कि विवादित स्थल को सुन्नी वक्फ बोर्ड, रामलला और निर्मोही अखाड़ा के बीच तीन बराबर-बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ अलग-अलग पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सन 2011 में हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।

अब जाकर केस की नियमित सुनवाई शुरू हो रही है। सन 1853 में इस जगह के आसपास पहली बार दंगे हुए थे। सन 1859 में अंग्रेजी प्रशासन ने विवादित जगह के आसपास बाड़ लगा दी। मुसलमानों को ढांचे के अंदर और हिंदुओं को बाहर चबूतरे पर पूजा करने की इजाजत दी गई। फरवरी 1885 में महंत रघुबर दास ने फैजाबाद के उप-जज के सामने याचिका दायर की कि यहां मंदिर बनाने की इजाजत दी जाए।

जज पंडित हरिकृष्ण ने यह कहकर इसे खारिज कर दिया कि यह चबूतरा पहले से मौजूद मस्जिद के इतना करीब है कि इस पर मंदिर बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। असली विवाद शुरू हुआ 23 दिसंबर 1949 को, जब भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं। हिंदुओं का कहना था कि भगवान राम प्रकट हुए हैं, जबकि मुसलमानों ने आरोप लगाया कि किसी ने रात में चुपचाप मूर्तियां वहां रख दीं।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री जीबी पंत से इस मामले में फौरन कार्रवाई करने को कहा। उत्तर प्रदेश सरकार ने मूर्तियां हटाने का आदेश दिया, लेकिन जिला मैजिस्ट्रेट केके नायर ने दंगों और हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई। नायर के बारे में माना जाता है कि वह कट्टर हिंदू थे और मूर्तियां रखवाने में उनकी पत्नी शकुंतला नायर की भी भूमिका थी।

बहरहाल, सरकार ने इसे विवादित ढांचा मानकर ताला लगवा दिया। 16 जनवरी 1950 को गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद के सिविल जज के सामने अर्जी दाखिल कर यहां पूजा की इजाजत मांगी। उस वक्त के सिविल जज एनएन चंदा ने इजाजत दे दी। मुसलमानों ने इस फैसले के खिलाफ अर्जी दायर की। विवादित ढांचे की जगह मंदिर बनाने के लिए 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने एक कमेटी का गठन किया। यूसी पांडे की याचिका पर फैजाबाद के जिला जज केएम पांडे ने एक फरवरी 1986 को हिंदुओं को पूजा करने की इजाजत देते हुए ढांचे पर से ताला हटाने का आदेश दिया।

इसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन किया गया। 06 दिसंबर 1992 को भाजपा, विहिप और शिवसेना समेत दूसरे हिंदू संगठनों के लाखों कार्यकर्ताओं ने विवादित ढांचे को गिरा दिया। देश भर में हिंदू-मुसलमानों के बीच दंगे भड़के गए, जिनमें करीब 2,000 लोग मारे गए।

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