श्रीराम की ‘करूणा-निधान’ सूरत का ‘सत्ता-विधान’ मूरत में रूपांतरण

‘राम’ …दो अक्षरों के यह सहज, सरल, सजल शब्द जिंदगी के भाव विहान का कब और कैसे हिस्सा बना, मनोमस्तिष्क की स्मरण शक्ति इसका जवाब देने में असमर्थ है? वैसे भी पचास-साठ साल पुरानी स्मृतियों को कुरेद कर सही-सही लिपिबद्ध करना सरल काम नहीं है। ’राम-काज’ की धुरी पर इस स्मृति पुराण का काल खंड पांचवा दशक है। कहना मुश्किल है कि ’आजु मोहे फिर रघुवर की सुधि आई’ जैसा मर्मस्पर्शी भजन बमुश्किल दस्तखत करने वाले अपने नाना के मुख से कब सुना था? यह बताना भी मुश्किल है कि ’श्री रामचन्द्र कृपालु भज मन’ जैसी राम स्तुति कब कंठस्थ हो गई? अपने नाना को प्रिय तुलसी के परम्परागत भजन के अंश बरसों जहन में उत्पात मचाते रहे, लेकिन पूरे याद नहीं आए। नाना ढोलक-मंजीरे की संगत के साथ ठेठ देहाती अंदाज में साठ साल पहले अक्सर यह भजन गाया करते थे। बरसों बाद रामनवमी पर आकाशवाणी इंदौर पर यह भजन सुना, जिसे कुमार गंधर्व गा रहे थे। तुलसी की राम स्तुति को भी लता मंगेशकर सहित अनेक क्लासिकल हस्तियां पेश कर चुकी हैं।

यू-ट्यूब पर दोनों रचनाएं उपलब्ध हैं। इन भजनों का अपनी टंकार, अपनी झंकार है। इन्हें सुनना अच्छा लगता है, लेकिन इनमें वह जज्बा नहीं हैं, जो दस साल की उम्र में नाना के सुरों में सुनने को मिलता था। रघुवर की याद में तड़पती कौशल्या का विलाप जब नाना की आंखों से भी झरने लगता था, तो उनके मन मे बसे ’राम’ मेरे बाल-सुलभ मन में भी कहीं गहरे उतर जाते थे। कई दिनों तक वो ’राम-कहानी’ जहन में तरह-तरह की हरकतें करती रहती थी। करूण स्रोत फूटते रहते थे। कच्चे घर के ओटले पर कंदील की रोशनी में रामायण के बहाने अलग-अलग मानवीय रूपों में राम-लक्ष्मण और सीता से होने वाले साक्षात्कार की सनसनी आसमान पर टंके सितारों से कई-कई सवाल करती रहती थी। उस वक्त ’राम-कथा’ का मर्म और धर्म जीवन में करूणा का कर्म विधान रचते थे…’राम-काज’ की धुरी पर राम-राज्य की कल्पनाएं अंगड़ाई लेती थी…।

स्वतंत्रता के सूर्योदय के क्षणों में, देश के विभिन्न हिस्सों में बसे उत्तर भारतीय ब्राह्मण ठाकुर, अहीर-गड़रियों के परिवारों में आजादी के किस्सों के साथ तुलसी की ’राम-कथा’ भी माहौल में पवित्रता घोलती थी। समाज में तुलसी-रामायण का जबरदस्त जलवा था। घरों में रामायण के होने, नियमित पढ़े जाने के मायने थे। यह ’राम-कर्म’ सामाजिक-प्रतिष्ठा का प्रतीक था। रामायण के छंद, चौपाई, दोहे और सोरठे जीवन की व्यवस्थाओं का नियंत्रण और नियमन करते थे। तुलसी की चौपाई के मात्र कुछ शब्द ’होइहि सोई जो राम-रचि राखा’ से उत्प्रेरित लोगों ने नियति के आगे खुद को आश्‍वस्त किया और आगे बढ़ाया है। चौपाई जीवन में जय-पराजय के क्षणों में ’राम’ की एक जैसी उपस्थिति और आश्‍वस्ति का आह्वान करती है।

पचास साल पहले रामायण, राम-लीलाओं और हरि-कथाओं के जरिए दिलो-दीमाग में अवतरित ’राम’ की पुण्य-गाथाओं की समझ और सीख स्मृति-पटल पर गहरे अंकित है। लेकिन राम-कथा की वह समझ और सीख अब लड़खड़ाने लगी है। राम आदर्श पुरूष, राजा, भाई, पुत्र, शिष्य, योद्धा, तपस्वी और संयमी व्यक्ति के रूप में उभरते हैं। रामावतार का उद्देश्य ही लोगों के जीवन को आदर्श बनाना था। राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने महाकाव्य ’साकेत’ में ’राम’ की महत्ता पर लिखा है – ’राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए, सहज सम्भाव्य है’…। जैसा कि गुप्तजी ने लिखा है, अब राम की महत्ता में सब कुछ उतना सहज और सरल नहीं बची है। राम दुरूहता की गिरफ्त में है। राम अब राजनीति है, राम अब दंड-नीति है, राम अब कूट-नीति हैं… राम अब सत्ता का सोपान है…राम अब हिन्दुत्व का अभियान है…राम एक अवसर हैं…राम एक परिसर हैं…।

सत्तर सालों में रामकथा की अनुगूंज में बुनियादी बदलाव देखने को मिले हैं। रामकथा की स्वर-लहरियों में तनाव, तपिश और तीक्ष्णता है। ’राम-राम’ और ’जै सियाराम’ के श्रद्धामूलक संवाद के स्थान पर ’जैश्रीराम’ का उद्घोष समाज में उत्तेजक-मंत्र के रूप में ध्वनित होता है। ’राम-नाम’ की तासीर कभी भी समाज में विभाजन का सबब नहीं रही है। करूणा-सागर मे राम अब सत्ता का विधान लिखने वाले ’राम-मूर्ति’ हो गए हैं। राम-कथा सुख-दुख और आशा-निराशा की पराकाष्ठाओं में जीवन को संयमित करने का संदेश देती है। उसमें अन्तर्नीहित प्रेरक प्रसंग जिंदगी में हम-सफर बनकर साथ चलते हैं।

श्रीराम की ’करूणा-निधान’ सूरत का ’सत्ता-विधान’ राम की मूरत में रूपान्तरण सांस्कृतिक और धार्मिक अपवंचन का प्रतीक है। इस प्रश्‍न को हाशिए पर ढकेलना संभव नहीं है कि बुधवार, 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में श्रीराम मंदिर के शिलान्यास की लिपि श्रीराम-कथा के चरित्र-चित्रण को कौन सा मोड़ देने वाली है? राजनेताओं को भले ही पचास के दशक वाले ढोलक-मंजीरों के साथ राम-नाम की अनुगूंज की पवित्रता की दरकार नहीं हो, लेकिन समाज लयबध्दता और सूत्रबध्दता के लिए वह बहुत जरूरी है।

यहां सुप्रसिद्ध कवि पद्मभूषण कुंवर नारायण की कविता मौजूं है- ’हे राम, जीवन एक कटु यथार्थ है, और तुम एक महाकाव्य हो, तुम्हारे बस की नहीं उस अविवेक पर विजय, जिसके दस-बीस नहीं लाखों सर-लाखो हाथ है, और अब विभीषण भी पता नहीं किसके साथ है। इससे बड़ा क्या हो सकता हमारा दुर्भाग्य, एक विवादित स्थल में सिमट कर रह गया है तुम्हारा साम्राज्य। अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं, योद्धाओं की श्रीलंका है, मानस तुम्हारा चरित नहीं, चुनाव का डंका है। हे राम, कहां यह समय कहां तुम्हारा त्रेता युग, कहां तुम मर्यादा पुरूषोत्तम कहां यह नेता-युग। सविनय निवेदन है कि प्रभु लौट जाओ, किसी पुरान-किसी धर्मग्रन्थ में सकुशल सपत्नीक… अबक जंगल वो जंगल नहीं जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक’।

उमेश त्रिवेदी/सुबह सबेरे से साभार

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