संसदीय नेता: बजट सेशन तो खा ही गए अब मॉनसून की बारी

अखिलेश अखिल

आज से मॉनसून सत्र है। बजट सत्र के बाद से ही इस सत्र का इन्तजार था। नेताओं को खासकर। देश की जनता को अब संसदीय सत्र से कोई मतलब नहीं होता। जनता को पता भी नहीं होता कि सत्र कब से है और है भी तो क्यों ? गांव -जवार में रहने वाली अधिकतर आबादी सत्र के मायने भी नहीं समझती। आखिर समझे भी क्यों ? इससे उनका क्या मतलब ! क्या लाभ ! 70 साल पहले जैसा था अभी भी वैसा ही गांव है। कहने के लिए सरकारी खर्च से विजली ,पानी ,सड़के पहुँचती दिख रही है लेकिन मुकम्मल नहीं। इसी दौर में लोकतंत्र के नाम पर हंगामा खूब हुआ। इसका लाभ यह हुआ कि भले ही गांव में लोकतंत्र सही मायने में नहीं पहुंचा लेकिन सभी पार्टियों के डंडे ,झंडे और कार्यकर्ता पहुँच गए। वोट की राजनीति शुरू हुयी। लोग झुण्ड के झुण्ड बूथ पर पहुँचने लगे। वोट डालने लगे।

बाद में विकास की बातें भी होने लगी। 70 साल से विकास पर बहस जारी है लेकिन विकास को सभी खोज रहे हैं। जितनी भी सरकारें आयी ,पिछली सरकार को गरियाती रही। अपना गाल बजाती रही लेकिन विकास दिखा। एक बात जरूर देखने को आयी। सभी नेताओं ,पार्टियों और सरकारों ने जितनी बातें कही ,कोई पूरा नहीं हुआ। गांव कही का नहीं रहा। गांव के लिए योजनाए बनती रही और गांव खाली होते रहे। सारे गांव पलायन के शिकार हुए और आज किसी भी गांव में आबादी बची नहीं। बेकारी की वजह से गांव शहर पहुँच गए। गांव की सारी समस्या शहरी समस्या बन गयी। 70 सालों में ना जाने कितने संसद सत्र आये गए ,देश नहीं बदला। लूट की राजनीति पर विकास के नारे लगते रहे।

इधर मौनसुर सत्र को लेकर पक्ष विपक्ष की राजनीति तेज है। दोनों अपनी अपनी बाहें चढ़ाये हुए हैं। दोनों की अपनी अपनी राजनीति है। सामने जो चुनाव है। कल तक जो विरोधी थे आज सत्ता में बैठे हैं और कल के सत्ता वाले विपक्ष बने हुए हैं। कल के मुद्दे पर सत्ता पक्ष फिर से बहस चाहता है लेकिन विपक्ष के पास अपने कुछ और ही मुद्दे है। लेकिन मुद्दों के तह में जाए तो देखेंगे कि जिन मुद्दों को लेकर पक्ष और विपक्ष भिड़ते नजर आ रहे हैं वे सब जनता के मुद्दे है ही नहीं। अब मौनसून सत्र को लेकर ख़बरें छनकर आ रही हैं कि विपक्ष सत्र में हंगामा करने के पूरे मूड में है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर किस लिए? संसद का सत्र देश के अहम मसलों, कानूनों और समस्याओं पर मंथन और उनका कोई हल निकालने के लिहाज़ से काफी अहम होता है। ऐसे में सदन में जनता से जुड़े मसले उठाए जाने जरूरी हैं।

आज देश के सामने बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि बागवानी से जुड़े अनेकों मसले हैं जिन पर गहन चिंतन की जरूरत है। जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में पड़ोसी देशों की आव्रजन की कोशिशें और सीमा पार से हो रही हरकतें एक अहम मसला है। ख़ास तौर पर जिस तरह से जम्मू-कश्मीर में रोज़ शाहदतें हो रही हैं यह पूरे देश की चिंता का सबब है। देश के बीस शहर पानी की किल्लत के कारण डे जीरो के कगार पर हैं तो इतने ही शहर बाढ़ से बेहाल हैं। भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई की हाल ही की बारिश ने जो गत्त बनाई है वो भी सबके सामने है। तो क्या इन मसलों पर बहस होगी?

क्या विपक्ष इन मसलों पर चिंतन नहीं करने पर संसद में सरकार को घेरेगा? क्या भीड़तंत्र की बढ़ती गुंडई को लेकर कोई सख्त कानून की मांग सदन के भीतर होगी? क्या बच्चियों संग दुराचार को लेकर कोई चर्चा और उसका कोई समाधान खोजने की संजीदा कोशिश होगी? यदि हां तो फिर उस दौरान हंगामे की जरूरत क्यों है? इन पर तो गंभीर चर्चा होनी चाहिए और यदि ये मुद्दे नहीं उठेंगे तो फिर किस बात को लेकर हंगामा होगा? जैसा कि स्पष्ट दिखाई दे रहा है संसद सत्र के दौरान हिन्दू पाकिस्तान, हिन्दुओं की पार्टी, मुसलमानों की पार्टी जैसे मसलों पर ही एक दूसरे को खींचा जायेगा। क्या यही हैं सबसे अहम मुद्दे ?

सच तो यही है कि कमोबेश हर सत्र से पहले हमारे सियासी दल जानबूझकर ऐसे मसले उठाते हैं जिनका आम जनता की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं होता। बस तू काला और मैं गोरा की राजनीती होती है। इस बहाने संसद ठप की जाती है और मीडिया को माध्यम बनाकर खुद को ऐसे पेश किया जाता है मानो इनके बिना हिंदुस्तान फिर से गुलाम हो जायेगा। दो महीने पहले फैले निपाह वायरस को लेकर क्या हुआ इसकी फ़िक्र शायद किसी को नहीं है। देश भर में डेंगू से कितने लोग मर चुके हैं इसकी भी चिंता किसी को नहीं है। बस हिन्दू पाकिस्तान और मुस्लिम तुष्टिकरण जैसे छद्द्म मसले उछालकर ही इस बार भी सत्र की इतिश्री की जाने वाली है।

दिलचस्प ढंग से जिस पाकिस्तान के नाम पर हमारे नेता बरसों से अपनी सियासी रोटियां सेंक रहे हैं उसी पाकिस्तान में नेशनल असेम्ब्ली में महिलाओं के लिए 60 सीटें आरक्षित हैं। लेकिन हमारे यहां महिला आरक्षण का मसला कबसे लटका है। संसद के स्तर का एक मिनट अढ़ाई लाख रुपये का पड़ता है। यह सारा खर्च आम जनता की जेब से जाता है।

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