संसद की गरिमा, अमित शाह के भाषण और सभापति पर आरोप

अखिलेश अखिल

राज्य सभा के सभापति वेंकैया नायडू पर 6 फरवरी को विपक्षी दलों ने पक्षपात करने का आरोप लगाया है। उनके रवैये को अलोकतांत्रिक बताया है। विपक्षी दलों का कहना है कि नायडू विपक्ष को जनता से जुड़े मुद्दों पर बोलने नहीं देते। नायडू पर अब तक यह तीसरा आरोप है। दो आरोप नायडू पर पिछले साल विपक्षी दलों ने लगाए थे। आपको बता दें कि अगस्त 2017 में देश के कई हिस्सों में दलितों के उत्पीड़न के मुद्दे को उठाते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने सभापति पर पक्षपात और न बोलने का आरोप लगाया था। बाद में उन्होंने इस्तीफा भी दे दिया। इसके बाद दिसंबर- 2017 में सभापति नायडू ने जदयू के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव और अली अनवर की राज्यसभा सदस्यता रद्द कर दी थी। तब उनपर विपक्ष ने सत्तापक्ष के प्रभाव में फैसले लेने का आरोप लगाया था।

और अब विपक्षी नेताओं ने सभापति पर पक्षपात करने का आरोप लगाकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दरअसल ये सारा खेल तब शुरू हुआ जब बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह पहली दफा राज्य सभा पहुंचे और अपना लंबा भाषण देने का गौरब प्राप्त किया। करीब सवा घंटे तक शाह के भाषण हुए। विपक्षी दलों के मन में यह बात बैठ गयी है कि संसदीय परम्परा के मुताविक कोई नया सदस्य इतना लंबा भाषण कैसे दे सकता है ? विपक्षी दल मान रहे हैं कि चुकि अमित शाह बीजेपी के अध्यक्ष हैं और उनकी कृपा से ही वेंकैया सभापति बनने में सफल हुए हैं इसीलिए वेंकैया संसद के सारे परम्पराओं को तोड़कर शाह के एहसान का बदला उन्हें लम्बे भाषण के लिए समय देकर चुकाया है। अधिकतर विपक्षी दलों और जनमानस के मन में यही बात बैठ गयी है। वेंकैया नायडू ने शाह ने इतना लंबा समय क्यों दिया इसकी जानकारी तो वही दे सकते हैं लेकिन विपक्ष द्वारा उनपर जो आरोप लगाए गए हैं कुछ ज्यादा ही गंभीर है। इस आरोप का दाग कैसे मिटेगा यह देखने वाली बात होगी।

विपक्षी नेताओं ने मंगलवार को दिनभर के लिए राज्यसभा की कार्यवाही का बहिष्कार कर दिया। कांग्रेस के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी, सीपीआई, सीपीएम, एनसीपी और डीएमके जैसे दलों ने भी नायडू का बहिष्कार करने का ऐलान किया। विपक्षी दलों के नेताओं का कहना है कि अगर सभापति वेंकैया नायडू का यही रवैया रहा तो तो वे उचित कदम उठाने को विवश होंगे। राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा, “सभापति सदन में हमें लोकहित के मुद्दे नहीं उठाने दे रहे हैं, यह सही नहीं है।” उन्होंने आरोप लगाया कि सभापति सदन की कार्यवाही में संसदीय नियमों को नहीं मान रहे हैं। विपक्ष के इस कदम पर सपा के नरेश अग्रवाल ने कहा, “जिस तरह से राज्यसभा की कार्यवाही चलाई जा रही है, उसमें विपक्षी पार्टियों की आवाज को दबाया जा रहा है। हम लोगों की आवाज उठाने यहां आए हैं। अगर हमें ही आवाज नहीं उठाने दिया जाएगा, तो फिर संसद का क्या मतलब रह जाएगा।” वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने भी कहा कि राज्यसभा के सभापति का रवैया अलोकतांत्रिक है। विपक्ष जे जारी विरोध के बीच 7 फरवरी को प्रधानमन्त्री मोदी संसद में खूब बोले। विपक्ष के साथ साथ कांग्रेस पर तीखा प्रहार किया और कई सवाल भी पूछे। पीएम ने कहा कि केवल विरोध के लिए विरोध ठीक नहीं और आज देश में जो भी समस्या है उसके लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है। विपक्ष का हंगामा इस बीच भी होता रहा और पीएम अपनी रौ में बोलते रहे।

लेकिन भाषण और आरोप के बीच का अधययन करें तो पाते हैं कि भारतीय संसद में या फिर लाल किले की प्राचीर से अब तक आधा दर्जन भाषण ही मानक और इकॉनिक रहे हैं जिसे आज भी भारत की जनता बार बार देखती और पढ़ती नजर आती है। समझ से परे है की भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपने लम्बे भाषण से देश को क्या सन्देश देना चाह रहे थे और सभापति नायडू इतना लंबा भाषण देने का समय देकर अमित शाह से क्या करवाना चाह रहे थे। आजाद भारत के संसदीय इतिहास में एक से बढ़कर एक नेताओं ने जनता और देश के मसलों पर घंटो तक गंभीर भाषण दिए हैं। लेकिन आज भी लगभग 7 भाषण ही ऐतिहासिक माने जा रहे हैं। इन भाषणों में पिछले साल प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का लाल किला दिया गया 90 मिनट का भाषण भी उल्लेखनीय है। 14 अगस्त 1947 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिया गया भाषण सबसे इकॉनिक माना जाता है। इसके बाद डॉक्टर भीम राव आंबेडकर ने 25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में भाषण दिया जो पूरी तरह से ग्रामर ऑफ़ एनार्की के रूप में जाना जाता है। पीलू मोदी का भाषण ,जून 1996 में अटल बिहारी वाजपयी का भाषण ,1971 में इंदिरा गाँधी का भाषण ,1962 का डॉक्टर लोहिया का जोरदार ‘तीन आना वनाम 15 आना ‘ वाला भाषण और 2008 का ओमर अब्दुल्ला का जोरदार भाषण भारतीय नेताओं के इकॉनिक भाषण रहे हैं।

दुनिया के नेताओं के लम्बे भाषण पर नजर डाले तो उसमे भी पीएम मोदी के 90 मिनट वाले भाषण को दर्ज किया जा सकता है। मोदी का यह भाषण भारतीय नेताओं में सबसे लम्बा भाषण माना जाता है। भारतीय नेता वी के कृष्णमेनन संयुक्त राष्ट्र संघ में 1957 में लगातार तीन घंटे तक बोलते रहे थे। उनका भाषण भारत में कश्मीर पर आधारित था। क्यूबा के क्रांतिकारी नेता को कौन नहीं जानता। 1960 में संयुक्त राष्ट्र संघ में चार घंटे तक बोलने का रेकॉर्ड फिदेल कास्त्रो ने बनाया था। यही फिदेल कास्त्रो अपने ही देश में 7 घंटे तक भाषण देकर संयुक्त राष्ट्र संघ वाले अपने भाषण का रिकॉर्ड तोड़ा था। स्कॉटिश सांसद स्टेवर्ट ने 2004 में लगभग 24 घंटे तक लगातार भाषण दिया था जबकि सर इवान लॉरेंस ने वाटर फ्लूरो डाइजेशन पर 1985 में लगातार चार घंटे तक भाषण देते रहे।

हमारी संसद के शुरूआती दिनों में गंभीर राजनीतिक मतभेद के बाद भी राष्ट्र निर्माण के सांझा अभियान में एक मैत्रीभाव था। यह देश की किस्मत थी कि इसे आजादी के बाद नेहरू, पटेल और लोहिया जैसे दिग्गज मिले जिन्होंने बिना असभ्य हुए और वाहवाही की परवाह किए बिना, पूरी शिद्दत से विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करते हुए लोकतांत्रिक तेवर को धार दी। जैसा कि एक बार नेहरू ने कहा था, ‘‘संसदीय लोकतंत्र ढेर सारे नैतिक गुणों की मांग करता है- काम के प्रति खास तरह का समर्पण और ‘‘सहयोग के तमाम उपाय, आत्म-अनुशासन और संयम।’’ इन्हीं तत्वों की प्रतिमूर्ति प्रधानमंत्री वाजपेयी ने श्रेय लेने की होड़ में शामिल होने के बजाय गठबंधन धर्म निभाने में और राजनीतिक विचारधारा से परे जाकर वास्तविक संसदीय उपलब्धियां दर्ज कीं।

हमारी संसद में वह एक ऐतिहासिक पल था। राजाजी द्वारा पेश एक संशोधन को खारिज करते हुए नेहरू ने कहा था, ‘‘देखिए, राजाजी बहुमत मेरे साथ है।’’ इस पर राजाजी का जवाब था, ‘‘हां, जवाहर लाल, बहुमत आपके साथ है लेकिन तर्क मेरे साथ है।’’ चर्चा का निम्न स्तर हमारे राष्ट्रीय विमर्श को प्रतिबिंबित करता है। हमारी बहस अब शक्ति का प्रदर्शन बन चुकी है। एक समय था कि राजनीतिक भाषण सम्मानित कला माना जाता था। जनता पर अपनी बातों से असर डालने वाले जननेताओं ने दिशा, समर्थन और मजबूती देकर लोकतंत्र को आकार दिया, चाहे वह नेहरू हों, बर्के हों या चर्चिल हों। जन-मंच, जोकि संसद वास्तव में है, आधुनिक सांसद को चर्चाओं में हिस्सा लेकर अपने भाषण से आलोचना करने, चुनौती देने, समर्थन देने और वास्तविक बदलाव लाने का मौका देता है। इसलिए जरुरी है कि देश और समाज को आगे चलाने के लिए संसद में सबको बोलने का मौक़ा मिलना चाहिए। लोकतंत्र का असली चरित्र यही है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि केवल विरोध के लिए विरोध ठीक नहीं।

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