सचिन पायलट का परेशान ‘सत्य’ कितना सच्चा, कितना झूठा…?

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ सियासी जंग में मुअत्तिल उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट का यह ट्वीट गौरतलब है कि ‘सत्य को परेशान किया जा सकता है, पराजित नहीं…। सियासी-अंदाज में इसे जुमला कहें या साहित्यिक-सूक्ति मानें, सत्ता और सिंहासन के निकट साजिशों को न्यायसंगत और तर्कसंगत ठहराने के लिए राजनेता इस जुमले का बखूबी उपयोग करते रहें हैं। इन दिनों इसका प्रयोग कुछ ज्यादा होने लगा है। सचिन पायलट के समर्थन में पहला ट्वीट करने वाले भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी भोपाल में आयोजित कांग्रेस सेवादल के राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर के समापन समारोह (जनवरी, 2020) में नागरिकता संशोधन कानून के सत्याग्रह में मोदी-सरकार के खिलाफ इसी जुमले का इस्तेमाल किया था। वैसे सिंधिया अपने भाषणों में अक्सर इस जुमले का इस्तेमाल करते रहे हैं। पड़ताल करें तो गूगल में दर्ज कांग्रेस और भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं के भाषणों में इसकी अनुगूंज सुनाई पड़ती है।

हर पार्टी और राजनेता विचारधारा, सिद्धांत, परम्परा, निष्ठा के घालमेल से अपना एक ‘राजनीतिक-सत्य’ गढ़ता है। यह ‘सत्य’ धुंधला होता है। इस ‘सत्य’ की केमेस्ट्री ‘सत्ता-सापेक्ष’ होती है। सिंहासन के करीब इस ‘सत्य’ की रासायनिक प्रक्रियाओं में ‘गुलाब’ की गंध होती है, जबकि दूरियों में ‘अश्रु-गैस’ घुल जाती है। इस ‘सत्य’ के कूट तत्वों को पकड़ पाना या समझ पाना आम आदमी के बूते के बाहर है। अब राजस्थान में सचिन पायलट उनके जिस ‘सत्य’ के परेशान होने की बात कर रहें हैं, उसके कूट-तत्वों को समझना भी आसान नही हैं। तराजू पर तौल कर यह समझ पाना कठिन है कि न्याय या अन्याय के किन मानको ने उन्हें इतना उद्वेलित व्देलित और बेचैन कर रखा है ? ट्वीट से स्वाभाविक ही सवाल उदभूत होता है कि उनका ‘सत्य’ परेशान क्यों है…? कांग्रेस में सचिन पायलट को मिली तवज्जो के बारे में कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजे वाला का यह कथन गौरतलब है कि – ‘जो ताकत, जो सम्मान, जो स्थान सचिन पायलट को मिला है, वह शायद किसी को नहीं मिला होगा… 26 साल की उम्र में सांसद, 32 की उम्र में मंत्री और 34 की उम्र में प्रदेश अध्यक्ष और अब 40 साल की उम्र में उप-मुख्यमंत्री। 17-18 साल के अंतराल में इतनी तरक्की का मतलब है कि सोनिया गांधी का स्नेह उनके साथ रहा है। इसीलिए उनको इतनी ताकत दी गई’। राहुल गांधी से उनकी दोस्ताना नजदीकियां जग जाहिर हैं। राजस्थान में उनके बारे में निर्विवाद सहमति बनी हुई थी कि अशोक गहलोत के बाद लंबे समय तक कांग्रेस की कमान सचिन के हाथ रहने वाली है। गहलोत सरकार में सचिन की हैसियत को कमतर आंकना मुनासिब नहीं है। वो उपमुख्यमंत्री होने के साथ-साथ प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे। प्रदेश और पार्टी में पकड़ को मजबूत बनाने के लिए ये राजनीतिक ओहदे पर्याप्त ईंधन प्रदाय करते हैं।

पायलट की राजनीतिक प्रोफाइल में उभरे ‘सत्य’ में परेशानी वाले तत्व काफी कमजोर हैं, फिर भी यदि वो कहते हैं कि उनका ‘सत्य’ परेशान है तो आश्चर्य होता है…। पायलट को राजनीति विरासत में मिली है। उनकी प्रोफाइल में लंबे राजनीतिक संघर्ष का लेखाजोखा लगभग शून्य है। राजनीति के बीहड़ों में उन्हें धूप-बरसात का सामना कभी भी नहीं करना पड़ा है। दरी बिछाने, पोस्टर चिपकाने, नेताओं की खुशामद करने और रैलियों में भीड़ इकट्ठा कर अपनी ताकत का प्रदर्शन कभी भी नहीं करना पड़ा है। पिता की विरासत के साथ जातीय-समीकरण ने उनकी राजनीतिक-यात्रा को काफी रफ्तार दी है।

सचिन के ‘सत्य’ के हारने-जीतने की रासायनिक प्रक्रियाओं को पूरा होने में अभी वक्त लगेगा। अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच तकरार दिसम्बर, 18 में विधानसभा चुनाव जीतने के साथ ही शुरू हो गई थी। पायलट भी राजस्थान के मुख्यमंत्री बनने के लिए लालायित थे। लेकिन ज्यादातर विधायक अशोक गहलोत के पक्षधर थे। कांग्रेस विधायकों का नंबर गेम उनके पक्ष में नही था। लिहाजा सचिन पायलट को कैबिनेट में नम्बर दो की हैसियत को स्वीकारना पड़ा, जो उनके लिए कड़ूए घूंट पीने जैसा था।

बहरहाल, सचिन पायलट के सत्य की परेशानी का सबब सिर्फ अशोक गहलोत नहीं है। इसके लिए वो खुद, उनका अधैर्य और अधीरता भी जिम्मेदार हैं। वैसे कांग्रेस का ‘क्राइसिस-मैनेजमेंट’ सवालों के घेरे में है कि पुराने कांग्रेसी नेता युवा-पीढ़ी के हकों पर कुठाराघात कर रहे हैं। मप्र में ज्योतिरादित्य सिंधिय़ा के उदाहरण से उसकी पुष्टि की जा रही है। राजनीति में सच की कई परते होती हैं। बड़ा सच यह है कि मोदी-अमित शाह ने तय कर लिया है कि राजस्थान में कांग्रेस सरकार को गिराना है। मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार के पतन की कहानियां उन्हें उत्प्रेरित कर रही हैं। अशोक गहलोत के आरोपो में वजन है कि पायलट भाजपा की साजिशों का हिस्सा बन चुके हैं। सचिन पायलट के पास समर्थन भले ही मुठ्ठी भर हो, लेकिन अमित शाह का बैक-अप उनकी पीठ पर है। गहलोत समर्थको के संस्थानो में आयकर और ईडी के छापे इसकी पुष्टि करते हैं। राजस्थान में भाजपा राजनीतिक आखेट पर निकल चुकी है।

उमेश त्रिवेदी/सुबह सबेरे से साभार

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