सपा-बसपा गठबंधन करेगा यूपी कांग्रेस के संगठन का भविष्य तय

धनंजय सिंह

लखनऊ ब्यूरो। यूपी में सपा और बसपा का गठबंधन कांग्रेस के संगठन का मीटर बनने वाला है। यूपी में जुलाई के बाद कांग्रेस संगठन में बदलाव होने के संकेत मिल रहे हैं। कांग्रेस यूपी में ब्राहमण और दलित राजनीति पर ही केन्द्रित रहना चाहती है। इसके लिए संगठन में बदलाव के लिए कांग्रेस ने विस्तृत खाका तैयार किया है।

यूपी में कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा के उपचुनाव 28 मई को सम्पन्न होंगे। दोनों सीटों पर उपचुनाव के बाद यूपी में कांग्रेस अपने संगठन को धार देने में जुट जाएगी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कर्नाटक चुनाव के बाद कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाने वाले हैं, उसके बाद वह 15 दिन की विदेश यात्रा पर जा रहे हैं। यूपी कांग्रेस के संगठन में जो भी बदलाव होंगे, उसकी संभावना जुलाई में दिख रही है। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि सपा और बसपा के महागठबंधन में कांग्रेस नहीं शामिल होती है, तो कांग्रेस दलित चेहरे पर दांव लगायेगी। जिसका सीधा नुकसान बसपा और सपा को होगी। यूपी में दलित लगभग 21 प्रतिशत हैं, जबकि मुस्लिम 15 प्रतिशत।

कांग्रेस दलित के मुददों को लेकर मुखर हो गयी है। कांग्रेस ने इसकी शुरुआत गुजरात के ऊना से की है। गुजरात चुनाव में कांग्रेस ने दलित और पिछड़ा कार्ड खेला। कांग्रेस को इस गठजोड़ का फायदा हुआ। गुजरात चुनाव के बाद महाराष्ट्र में दलितों केआन्दोलन ने भाजपा सरकार की नींद हराम कर दी। एससी और एसटी के मुददे पर 2 जुलाई को दलितों द्वारा भारत बंद का आयोजन किया गया, जिसमें हिंसा फली। दलितों के आन्दोलन से भाजपा को कितना नुकसान हुआ, उस पर डैमेज कंट्रोल करने के लिए उनसे जुड़ी कई मांगों पर विचार चल रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस मोदी सरकार में मुस्लिमों पर राजनीति नही करना चाह रही है।

कांग्रेस मुस्लिमों को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ खड़ी होती तो हिन्दुओं में धुव्रीकरण हो जाता। कांग्रेस इसको रोकने के लिए देश में दूसरी सबसे बड़ी आबादी दलित पर दांव लगायी हुई है। देश के अन्य राज्यों में दलित राजनीति कांग्रेस और भाजपा के बीच केन्द्रित रहती है। यूपी में दलित बसपा के साथ हैं। यूपी में लोकसभा चुनाव से पूर्व बसपा और सपा के गठबंधन में कांग्रेस शामिल होने की संभावना जता रही है, लेकिन सपा के पूर्व सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव द्वारा गठबंधन में कांग्रेस को दो सीटें देने की बात कहे जाने के बाद कांग्रेस में काफी आक्रोश बढ़ गया है। लेकिन अखिलेश यादव ने साफ कहा कि कांग्रेस से हमारी दोस्ती पक्की है। कांग्रेस की सपा और बसपा के गठबंधन पर नजर है।

कांग्रेस महागठबंधन में नही शामिल होती है तो दलित कार्ड खेलेगी। कांग्रेस बसपा सुप्रीमों मायावती के दो अनमोल रत्नों पर ही दांव लगा सकती है। बसपा सरकार में मायावती के खासम-खास प्रमुख सचिव रहे पीएल पुनिया और उनकी सरकार में मंत्री रहे राजबहादुर में किसी पर कांग्रेस दांव लगा सकती है। यह दोनों नेता बसपा की सारी रणनीति को समझते हैं। इनमें पीएल पुनिया छत्तीसगढ़ के प्रभारी हंै। इन दोनों नेताओं में से कांग्रेस किसी भी नेता को जिम्मेदारी दे सकती है। यूपी में कांग्रेस के पास ऐसा कोई दलित चेहरा नही है जिस पर वह दांव लगा सके।

सपा और बसपा के महागठबंधन में कांग्रेस शामिल होती है तो अध्यक्ष किसी ब्राह्मण चेहरे को बनायेगी। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए पूर्व विधायक ललितेशपति त्रिपाठी, पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद और पूर्व सांसद राजेश मिश्रा के नाम लिए जा रहे हैं। इसके अलावा पूर्व सांसद प्रमोद तिवारी भी रेस में हैं लेकिन जितिन प्रसाद की दावेदारी सबसे मजबूत मानी जा रही है।

कांग्रेस में बदलाव का अहम कारण लगातार मिल रही हार भी है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद की कमान अभी अभिनेता से नेता बने राज बब्बर के पास है। गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में कांग्रेस की हार के बाद राज बब्बर ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का एलान किया था लेकिन पार्टी आलाकमान ने उन्हें अगले फैसले तक पद पर बने रहने के लिए कहा था।

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