सरकारी चश्मे: सवाल ‘मी-लॉर्ड’ की नजर नहीं, नजरिया बदलने का है

अब मुंबई हाईकोर्ट के हर न्यायाधीश को चश्मा खरीदने के लिए हर साल 50 हजार रूपए सालाना भत्ता मिला करेगा, ताकि वो अंधे कानून की उंगली पकड़ कर उसे उसके सही मुकाम तक पहुंचा सकें। महाराष्ट्र के कानून और न्याय विभाग के इस फैसले के अगले हिस्से में चश्मा उपलब्ध कराने की यह सुविधा जज की पत्नी और उन पर आश्रित परिवारों के अन्य सदस्चों को भी मिल सकेगी। इस आदेश में न्यायाधीशों की कमजोर आंखों और बीमार नजरों को दुरूस्त करने की चिकित्सकीय चिंताओं की पृष्ठभूमि का खुलासा नही हैं। यह भी पता नहीं है कि उनकी आंखें ऐसे कौन से खतरे की जद में हैं कि उन्हें हर साल चश्मे बदलने के लिए पचास हजार रूपयों की जरूरत होगी। सामान्य तौर पर आम लोग नम्बर बदलने की स्थितियों में ही अपना चश्मा बदलते हैं। लेकिन महाराष्ट्र सरकार चाहती है कि भले ही आंखों का नम्बर बदले या न बदले, लेकिन मुंबई हाईकोर्ट के जज हर साल चश्मा बदलें।

बहरहाल, चश्मा-भत्ते से जुड़े ये सवाल सरकारी-आदेश के तकनीकी पहलुओं को स्पष्ट करने की मांग करते हैं, लेकिन यदि हम यहां जजों के चश्मे बदलने की इस प्रक्रिया का मुहावरे के रूप में परीक्षण करें तो उसके गहरे निहितार्थ सामने आ सकते हैं। मुद्दा यह है कि नजर बदले या नजरिया…क्योंकि पंच परमेश्‍वर की सामाजिक संस्कृति में जीने वाला भारतीय समाज इन दिनों न्याय पालिका को लेकर बिल्कुल आश्‍वस्त नहीं है। हर साल बदले जाने वाले जजों के चश्मे क्या भ्रष्टाचार, अनाचार, जगजाहिर अंधेरगर्दी के उस धुंध के आगे देख पाएंगे, जहां आम आदमी अन्याय का सबसे ज्यादा शिकार हो रहा है? क्या न्यायाधीशों की जमात नित नए ब्राण्ड के चश्मे पहन कर ये देख पाएगी कि कानून तोड़ने वाले लोग उसके न्यायालय के आंगन को अभयारण्य क्यों समझते हैं… ? अथवा वो उन कारणों को पढ़ सकेंगे, जिनकी वजह से कानून तोड़ने वाले लोगों की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रतिष्ठा सातवें आसमान पर उड़ान भरती रहती है…? महात्मा गांधी कहा करते थे कि ’वर्तमान न्याय-प्रणाली अंग्रेजों ने नेटिव-इंडियंस को न्याय देने के लिए स्थापित नहीं की थी, बल्कि अपना साम्राज्य मजबूत करने के लिए गठित की थी। इस न्याय प्रणाली में ’स्वदेशी’ कुछ नहीं है। इसकी भाषा, पोशाक तथा चिंतन सब कुछ विदेशी है। यहां जिसकी थैली बड़ी होगी, उसी को यह न्याय-प्रणाली सुहाती है’। सवाल यही है कि न्यायाधीश अपने नए चश्मों से क्या गांधी की इन भावनाओं में अन्तर्निहित न्यायिक मर्म की इबारतों को पढ़ सकेगें…? शायद नहीं…इसका ताजा उदाहरण राजस्थान में सरकार गिराने की ताजा उठा-पटक है, जिसमे राजस्थान हाई कोर्ट में जारी गहलोत-पायलट द्वंद में महंगे वकीलों की उपस्थिति है। मीडिया में यह सवाल रोजाना उठ रहे है कि एक हियरिंग के पचास लाख रूपए लेने वाले इन वकीलों का मेहनताना कहां से आ रहा है… कौन लोग इसके पीछे हैं…? महंगे कानून का यही पहलू न्यायालय में न्याय की दुर्दशाओं का सबब है, जिसे बड़ी तन्मयता से हमारी न्याय-प्रणाली सुन रही है…। न्यायालयों में जजों और वकीलों का कॉकस भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा और अहम कारण है, क्या जजों का नया चश्मा इस कॉकस को देख पाएगा…?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में 58 हजार 700 मामले लंबित हैं। भारत के तमाम हाई कोर्टों में लंबित प्रकरणों की संख्या 44 लाख है। देश की निचली अदालतों में लगभग तीन करोड़ मुकदमों के फरियादी अपनी अगली तारीखों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। निचली अदालतों में करोड़ों मुकदमों की यह फेहरिस्त उन गरीबों के हालत बयां करती है, जो न्याय की आस में अपनी जिंदगी गिरवी रख चुके हैं। तारीखों का यही सिलसिला न्यायालयों मे भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण है। भारत के न्यायालय शायद इसीलिए भ्रष्टाचार के लिए सबसे ज्यादा बदनाम हैं। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2016 में अदालत मे जाने वाले 45 प्रतिशत लोगों का कहना था कि उन्हे न्यायालय मे रिश्‍वत देना पड़ी थी। भारत एशिया प्रशांत क्षेत्र में भ्रष्टाचार के दूसरे उच्चतम स्तर पर है। न्यायिक क्षेत्रों में भ्रष्टाचार का यह आंकड़ा कई हजार करोड़ रूपयों का आंकडा स्पर्श करता है। और यह सब कुछ न्यायाधिकारियों की सहमति के बिना संभव नहीं है। अब सवाल यही है कि सरकारी खर्चे से जो चश्मे खरीदे जाएंगे, क्या वो यह भ्रष्टाचार, अनाचार और अत्याचार देखने में मददगार सिद्ध हो सकेंगे…?

दिलचस्प यह है कि महाराष्ट्र सरकार जजों के साथ ही उनके परिजनों के चश्मे की चिंता भी कर रही है। क्या इसके मायने ये हैं कि परिजनों की आंखों की कमजोरी भी कई मर्तबा ’मी लॉर्ड’ की द्दष्टि में बाधा उत्पन्न नहीं करने लगती है? न्यायविदों के साथ-साथ यदि परिवार के ’द्दष्टि-दोष’ पर भी यदि अंकुश लग सके तो अंधे कानून को आम आदमी की देहरी तक तर्क संगत तरीके से पहुंचाने की राहों की कुछ बाधाएं और दूर हो सकती हैं।

उमेश त्रिवेदी/सुबह सबेरे से साभार

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