सरकार खुद उड़ा रही है नियमों की धज्जियां

भोपाल: मध्य प्रदेश के 38 जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों में से 15 में करीब चार साल से प्रशासक पदस्थ हैं, जबकि नियमानुसार इनमें चुनाव कराए जाने चाहिए थे। इस प्रकार प्रदेश सरकार खुद भी विधानसभा से पारित अधिनियम की धज्जियां उड़ाती नजर आ रही है।

जानकारी अनुसार सहकारी कानून में सहकारी बैंक के संचालक मंडल का कार्यकाल पूर्ण होने पर यदि किन्हीं कारणों से चुनाव नहीं कराए जाते हैं तो सरकार छह-छह माह कर एक साल तक प्रशासक पदस्थ कर सकती है। इस नियम के विरुद्ध प्रदेश के 13 जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों में फरवरी 2014 से प्रशासक पदस्थ हैं। कुल 15 बैंक ऐसे हैं जहां पिछले चार साल से प्रशासक पदस्थ हैं और चुनाव डाले जा रहे हैं।

हद यह है कि राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते जहां संचालकों ने इस्तीफा दे दिया है, वहीं कुछ बैंकों ने चुनाव कराने का प्रस्ताव तक नहीं दिया है। कुछ ऐसी ही स्थिति सहकारी समितियों की भी है, जहां चुनाव कराने की बजाय प्रशासक तैनात कर दिए गए हैं। इस प्रकार आरोप लगाए जा रहे हैं कि प्रदेश सरकार खुद ही नियमों की धज्जियां उड़ाने में व्यस्त है।

जानकारी अनुसार राजनीतिक हस्तक्षेप का नमूना छतरपुर सहकारी बैंक में हुए चुनाव से मिलता है, जहां कि चुनाव भी हुए और संचालक मंडल भी चुना गया, लेकिन अध्यक्ष के नाम पर सहमति नहीं बनी और संचालकों ने इस्तीफा दे दिया। इस घटनाक्रम के बाद कोरम का अभाव बताकर संचालक मंडल बनने से रोक दिया गया। गुना, देवास और रीवा बैंकों की भी स्थिति इसी तरह की है। कुल मिलाकर सहकारी बैंकों के मामले में सरकार पर मनमानी करने का आरोप लगते रहे हैं।

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