साथ नहीं दे सकता … इसलिए साथ छोड़ रहा हूँ

कौशल किशोर चतुर्वेदी

एक दिन पहले भाजपा के पूर्व मंत्री जयंत मलैया के पुत्र सिद्धार्थ की साफ़गोई की चर्चा थी तो अब महाकौशल के बेहतरीन संभावनाओं से भरे भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके और भाजपा संगठन में हमेशा महत्वपूर्ण दायित्वों का ज़िम्मेदारी से निर्वहन करते रहे धीरज पटैरिया की चर्चा है। धीरज पटैरिया ने विधानसभा चुनाव से पहले भारी मन से जीवन का सबसे कठिन फैसला करते हुए भाजपा को अलविदा कह दिया था। ज़िद बस इतनी थी कि 31 साल तक दिन रात भाजपा को समर्पित रहने और पार्टी की सभी कसौटियों पर खरे उतरने के बाद भी पार्टी विधानसभा चुनाव की उनकी दावेदारी को अमलीजामा क्यों नहीं पहना रही है? तर्क था कि युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे सभी युवाओं को पार्टी ने टिकट भी दिया और सभी विधायक सांसद मंत्री और बड़े बड़े पदों पर पहुँचे। विधानसभा के 2008, 2013 और फिर 2018 के चुनाव में पार्टी ने उनसे सिर्फ़ यही कहा धीरज रखो। पर वक़्त ने धीरज रखने से साफ़ इंकार कर दिया। और धीरज ने जबलपुर उत्तर विधानसभा से निर्दलीय फ़ार्म भी भरा और कम समय में बेहतरीन वोट भी जुटाए पर जीत से दो कदम दूर रहे । तो भाजपा उम्मीदवार शरद जैन भी पार न पा सके और जीत मिली कांग्रेस से विनय सक्सेना को। तारीफ़ की बात यह है कि कांग्रेस के
विनय सक्सेना को 50045 वोट मिले और भाजपा के शरद जैन को 49467 मत मिले तो तीसरे नंबर पर रहे निर्दलीय
धीरज पटेरिया को 29479 मत मिले थे। कहीं न कहीं धीरज पटैरिया ने प्रदेश नेतृत्व को अपने वजूद का लोहा मनवा दिया था कि पार्टी अगर भरोसा करती तो वह कसौटी पर खरा ही उतरते।

खैर भाजपा को देश दुनिया का सबसे बड़ा दल बनाने में धीरज ने भी मुट्ठी भर सहयोग किया था।अब पार्टी का पीछे मुड़कर देखने में भरोसा शायद ख़त्म हो गया था। फिर धीरज पटैरिया ने भी स्वाभिमान के साथ समझौता कभी नहीं किया। सो राहें अलग-अलग हो गईं। कांग्रेस की सरकार प्रदेश में बनी और कांग्रेस की नज़र धीरज पर पड़ी।सो भाजपा के सौतेले व्यवहार से आहत धीरज ने भी लोकसभा चुनाव से पहले अनमने मन से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस का दामन थाम लिया। पर उस दिन के बाद धीरज कांग्रेस को हलक के नीचे कभी नहीं उतार पाए। धीरज के परिवार की तीसरी पीढ़ी संघ की सेवा में समर्पित है। खुद धीरज भी संघ के समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं। ऐसे में उनका स्वयंसेवक कभी मर नहीं पाया और कांग्रेस की सूची में धीरज का नाम तो रहा लेकिन कांग्रेस की कार्यशैली धीरज को अपना नहीं बना सकी।

निर्णायक मोड़ तब आया जब धीरज का मन जिस तरह भाजपा-संघ की विचारधारा से कभी अलग नहीं हो पाया था पर प्रतिकूल परिस्थितियों ने उन्हें उस नाव की सवारी करा दी थी जो उनके अतीत को बार-बार कुरेद रही थी। कांग्रेस सरकार को प्रदेश में 15 महीने ही हुए थे कि कांग्रेस विचारधारा में पले-बढ़े दिग्गज नेता और प्रदेश में 15 साल बाद कांग्रेस सरकार बनाने में जी-जान से जुटे रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया का मन अपनी सरकार से ख़फ़ा हो गया। वह 22 विधायक जिनमें 6 कमलनाथ सरकार में महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री थे , को साथ लेकर भाजपा विचारधारा का हिस्सा हो गए।यह चर्चा सिर्फ़ इसलिए ज़रूरी थी क्योंकि धीरज का कांग्रेस पार्टी से इस्तीफ़ा देने का सरोकार इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम से भी है।
22 कांग्रेस विधायकों का इस्तीफ़ा, सिंधिया सहित इनका भाजपा का दामन थामना, प्रदेश में कांग्रेस सरकार का गिरना और भाजपा सरकार का बनना तक धीरज धैर्य धारण कर अपने ही विचारों में खोए रहे। पर जब राज्यसभा चुनाव के बाद बात विधानसभा उपचुनाव की शुरू हुई तो कांग्रेस ने धीरज से सक्रिय होकर ग्वालियर-चंबल की सीटों पर पार्टी के पक्ष में काम करने की अपेक्षा की। मन से कभी भी कांग्रेस के न हो सके धीरज ने इस सही वक़्त पर ईमानदारी से कांग्रेस छोड़ने का अपना फैसला सुना दिया।यही ईमानदारी धीरज को दूसरे नेताओं से अलग करती है।
उन्होंने अपने इस्तीफ़ा में लिखा है कि कांग्रेस ने मुझे यथोचित महत्व और सम्मान दिया, इसके लिए सभी को धन्यवाद।आपके आग्रह को मानकर मैं कांग्रेस में आ गया पर काम करने का मन नहीं बना पाया।विचारों के अंतर्द्वंद को परे रख कर मैं कूच कर रहा हूँ। साग्रह मेरा त्यागपत्र स्वीकार करें। आभार…

अब 33 साल की राजनीति के कोरे बैनर के साथ धीरज अगले पड़ाव के लिए कूच कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि विचारधारा के संघर्ष और कूच करने के उदाहरणों से राजनीति भरी पड़ी है।मध्यप्रदेश की राजनीति में भविष्य में भी विचारधारा, संघर्ष, अंतर्द्वंद और कूच करने जैसे शब्द ज़िंदा रहने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। साथ नहीं दे सकता इसलिए साथ छोड़ रहा हूँ, का सिलसिला कभी ख़त्म नहीं होगा। भले ही पीछे बैनर कोरा हो या किसी पार्टी का। पर फ़ैसलों की चीड़फाड़ ईमानदारी और बेईमानी के नज़रिए से होती रहेगी।

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