सावधान होते, चूकों पर ध्यान देते, तो टाला जा सकता था आतंकी हमला

जम्मू: सुंजवान में सैन्य शिविर पर हुए जैश ए मोहम्मद के हमले के बाद से सुरक्षा में चूक को लेकर बहस शुरु हो गई है। कुछ लोगों का कहना है कि रोहिंग्या शरणार्थियों का आर्मी कैंप के बेहद करीब रहना सेना के लिए ठीक नहीं है। यही नहीं, यहां कुछ और सुरक्षा खामियां रही हैं, जो इस बड़े हादसे के लिए जिम्मेदार हैं। अगर समय रहते इन्हें दूर कर लिया गया होता, तो यह हादसा नहीं हुआ होता। सैन्य शिविर पर आतंकी हमले के बाद अब यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि आतंकी शिविर में घुसे कैसे।

संजवान कैंप से कुछ ही दूरी पर बनी एक खाली इमारत ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। सूत्रों के मुताबिक हमले से पहले शुक्रवार देर रात तक आतंकी इसी इमारत में छुपे हुए थे। शक इसलिए भी गहरा जाता है, क्योंकि इमारत की दीवारों पर भारत के खिलाफ कई बातें लिखी गई हैं, जिसे बाद में मिटाने की कोशिश भी की गई। सुंजवान सेना कैम्प के बीचों-बीच तीन से चार बरसाती नाले निकलते हैं। नाले रिहायशी इलाक़ों से होकर सीधा सैन्य शिविर में जाते हैं। ये नाले शिविर में घुसने के सहज रास्ते हो सकते हैं। इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया।

साथ ही कैम्प की चारदीवारी में भी कई जगह टीन की चादरों का इस्तेमाल किया गया है, जिसे पार कर कोई भी आसानी से कैंप में दाखिल हो सकता है। कैंप की दीवार के करीब काफी मकान हैं। अब सवाल यह उठता है कि आखिर आर्मी कैंप के नजदीक इतने सारे मकान कैसे बन गए? पड़ताल में ये पता चला है कि कैम्प से सटे हुए मकान सुंजवान कैम्प की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं। इन सुरक्षा खामियों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सुंजवान कैंप की सुरक्षा व्यवस्था बेहद लचर है।

बाउन्ड्री वॉल के बाहर से भीतर देखने पर पता चलता है कि थोड़ी ही दूर पर क्वार्टर बने हैं, लेकिन कहीं कहीं चारदीवारी ही गायब है। अब सवाल यह है कि क्या टीन की शेड से इतने बड़े आर्मी कैंप की सुरक्षा हो सकती है? सेना के जवान और अधिकारी तो सीमा पर लड़ने के लिए जाते हैं, लेकिन उनके परिवारों की सुरक्षा किसके भरोसे है? टूटी हुई दीवारों का पक्का इलाज क्यों नहीं किया गया?

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