सावन विशेष: भगवान भोले की नगरी है सीतापुर

जनपद सीतापुर पौराणिक कथाओं में विशेष महत्व रखता है, नैमिष तीर्थ की ये नगरी अनेक विशेषताओं को अपने मे समेटे भगवान भोले नाथ के अनन्त ऐतिहासिक मन्दिरों को अपने मे समेटे सम्पूर्ण श्रष्टि में अलग छाप छोड़ती है। जिंनमे कुछ मन्दिरों की स्थापना भगवान श्री राम ने स्वयं की है। जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर रामकोट कस्बे के उत्तर-पूर्व दिशा में श्री रामेश्वर धाम शिव मंदिर स्थित है, ये मंदिर त्रेता युग का बताया जाता है। त्रेता युग का ऐसा मन्दिर जिसकी स्थापना भगवान श्री राम द्वारा की गई। ऐसी मान्यता है इस मंदिर में आज भी सर्वप्रथम अदृश्य शक्ति द्वारा पूजा-अर्चना की जाती है। लहरपुर में स्थापित है जंगलीनाथ मन्दिर सीतापुर से 30 किलोमीटर दूर लहरपुर तहसील में स्थित है यह शिव मंदिर इस मंदिर में शिवलिंग धरती में पाँच मीटर अंदर तक धसा हुआ है। इस मंदिर का निर्माण लगभग 200 वर्ष पहले अंग्रेजी हुकूमत के दौरान हुआ जो कि दंड साहब ने करवाया दंड साहब को राह चलते शिवलिंग मिला उसको खुदवाने पर जब फावड़ा शिवलिंग पर लगा तो शिवलिंग से खून निकलने लगा उन्होंने काम वहीं रुकवा दिया भगवान शिव ने स्वप्न में दर्शन देकर शिवलिंग वहीं स्थापित करवाने को कहा तब उन्होंने शिवलिंग स्थापित करवाकर प्राणप्रतिष्ठित करवाया। वहीं नजदीक ही 10 किलोंमीटर की दूरी बिसवां रोड पर भगवान शिव का प्राचीन शिवमंदिर सूरजकुंड मन्दिर स्थापित है जहां तुलसीदास जी स्वयं आये थे व रुके थे।

सीतापुर स्थित श्यामनाथ मन्दिर जो कि सन 1800 में जंगल की कटाई के समय श्यामनाथ गोस्वामी को एक पेड़ के नीचे बड़ा सा पत्थर मिला था जिसे उन्होंने तोड़ने का प्रयास किया जैसे ही उसपर प्रहार किया उसमे रक्त की धारा फूट पड़ी श्यामनाथ ने उस पत्थर को वहीं स्थापित करवा दिया और पूजन अर्चन प्रारम्भ कर दिया जिसे सन 1870 में परमेश्वर गोस्वामी ने एक मठिया का आकार दिया फिर समय समय पर इस मंदिर की रूपरेखाएँ बदलती रही आज भी आस्था का केंद्र बने इस मंदिर में अनेक धार्मिक कार्य भोले बाबा की शरण मे परिपूर्ण होते रहते है।

नैमिष तीर्थ अपने मे सम्पूर्ण विश्व का धार्मिक केंद्र समेटे हुए है। वहीं पर 8 किलोमीटर दूर रुद्रावर्त महादेव स्थापित है। जहां पर एक कुंड है। कहा जाता है भगवान शिव ने जब तांडव किया तब प्रचण्ड तेज निकला इस तेज को ठंडा करने के लिए भगवान शिव इसी जलकुंड में जाते थे जिससे इस जल में चमत्कारिक बदलाव हुए, ये मान्यता भी है भगवान शिव द्वारा पाताल में एक शिवलिंग की स्थापना की गई जो कि इस जलकुंड के नीचे है। इस जलकुंड में बेलपत्र डूब जाते है व फल कुंड के अंदर जाकर वापस आकर तैरते है जो प्रसाद के रूप में भक्त जनों को प्राप्त होते है। दूध जहां जल में घुल जाता है वहीं इस जलकुंड में दूध एक पतली धारा बनकर धीरे धीरे नीचे जाता है ये मंदिर गोमती नदी के समीप है।

जनपद मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर सिधौली में एक ऐसा शिवमन्दिर स्थापित है जिसकी शिवलिंग सभी शिवलिंग से बड़ी जतायी जाती है लोग इस शिवलिंग को स्वयंभू प्रतिमा बताते है। यह मंदिर मनेश्वर महादेव के नाम से विख्यात है यहां ऐसे लोगो का ज्यादा आना होता है जो निःसन्तान है। इस मंदिर में शिवलिंग की पूजा अर्चना से संतान की प्राप्ति होती है। इस मंदिर की गणना सतयुग काल से की जाती है, मान्यता है भगवान श्री राम के पहले राजा युवनाथ हुए जिनकी कोई संतान नही थी जिन्होंने जप किया वहां उनकी भेंट ऋषि च्यवन से हुई जिन्होंने यज्ञ करने की बात कही जब यज्ञ प्रारम्भ हुआ भूल वश राजा ने वो जल ग्रहण कर लिया जो अभिमंत्रित था जिसे रानी को पीना था पुत्रेष्टि यज्ञ के पानी पीने से राजा को गर्भ धारण हो गया। राजा की दाहिनी कोख चीर कर पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम इंद्र ने मांधाता रख्खा, जिसके कारण राजा युवनाथ ने यहीं मन्दिर का निर्माण करवाया बाल्मीकिरामायण,भगवतपुराण,विष्णुपुराण आदि में इन मन्दिर व राजा के किले का इतिहास वर्णित है राजा द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया। लोगो का यह भी मानना है कि इस शिवलिंग में विभिन्न आकृतियां उभरती है।

जनपद मुख्यालय से करीब 32 किलोमीटर दूर बिसवां कस्बे में स्थापित है एक ऐसा शिवमंदिर जो कि प्रयागराज के साठ हजार मन पत्थर से बना है, जिसके शिवलिंग की स्थापना 150 पंडितों ने की है। इस शिवमंदिर में स्थापित सफेद शिवलिंग उत्तरभारत की सबसे बड़ी शिवलिंग बताई जाती है इस मंदिर को पत्थर शिवाला के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण राजा विषम्भर नाथ ने सन 1914 में करवाया कहा जाता है भगवान शिव राजा के सपने में आए थे तभी राजा ने मन्दिर का निर्माण करवाया था।

पौराणिकता, सँस्कृत, धर्म व भक्ती में समाहित सीतापुर की धरती पर हजारों शिवमंदिर स्थापित है जिनका नित्य पूजन अर्चन अनादि काल से यथावत होता रहा है। भगवान शिव की ये नगरी अनन्त काल से रोचकताओं धार्मिक आस्थाओं के केंद्र बिंदु में रही है। अनादिकाल से अनेक संतों महात्माओं की ये धरती उनके तप के लिए प्रकाशित होती रही है।

सीतापुर से आशीष मिश्रा की रिपोर्ट

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