साहस और शौर्य से लिख दी कारगिल की विजय गाथा

मनोज वाष्र्णेय

पाकिस्तान की घटिया राजनीति और आतंक को सरंक्षण देने की नीति के परिणाम स्वरूप हुए कारगिल युद्ध को आज 21 साल पूरे हो चुके हैं और अब हम इस युद्ध से मिले सबक से उस मुकाम पर हैं जहां पर कोई भी देश हमारी सीमा में घुसने से पहले चार बार सोचता है। भारतीय वीर सैनिकों ने अपने शौर्य और साहस के दम पर कारगिल में जो इतिहास बनाया वह एक ऐसी विजय गाथा है जिसका उदाहरण पूरी दुनिया में नहीं मिलता। हिन्दुस्तानी वीरों की दुश्मन के किले तहस-नहस करने की कहानियों से कारगिल का इतिहास भरा पड़ा है। अब तक की दुश्मन देशों से हुई लड़ाईयों में अगर तुलना की जाए तो भी कारगिल जैसी जंग ऐतिहासिक है। हां, वीरों के किस्से हर युद्ध में नया इतिहास रचते हैं। वीर अब्दुल हमीद से लेकर सगत सिंह तक जैसे वीरों की गाथाएं हमारा मस्तक तो ऊंचा करती ही हैं, हमारी क्षमता भी दुश्मन को पता चलती है। इस बीच सेना में भारतीय नारियों को स्थाई कमीशन देने की बात रक्षा मंत्रालय ने मान ली है और महिला अधिकारियों को स्थाई कमीशन देने के औपचारिक आदेश भी दे दिए हैं। इस न्याय के लिए 17 साल से कानूनी लड़ाई चल रही थी अब भारतीय महिलाएं वायुसेना,नौसेना की तरह थल सेना में भी कमीशन पा सकेंगी। कारगिल युद्ध की 21वीं वर्षगांठ पर आए इस समाचार से महिला सैन्य कर्मियों का उत्साह दोगुना हो जाएगा।
कारगिल की ऐतिहासिकता
वर्ष 1999 में मई से लेकर जुलाई तक चले इस युद्ध का अंत 26 जुलाई को हुआ। लगभग 60 दिन चले इस युद्ध ने पूरी दुनिया को बता दिया था कि भारत विषम परिस्थतियों में भी दुश्मन को तहस-नहस करने में पीछे नहीं है। तानाशाह और तत्कालीन पाकिस्तानी जनरल परवेज मुशर्रफ ने सोची-समझी चाल के तहत कारगिल की चोटियों पर कब्जा करवा दिया था। भारतीय सेना को जैसी ही जानकारी मिली तो उसने आपरेशन आरंभ करके पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों तथा सेना को खदेड़ दिया। कारगिल की ऐतिहासिकता दूसरे युद्धों से अलग है। हमने पाकिस्तान,चीन जैसे देशों के साथ जब भी युद्ध किया तो हमें पूरी तरह से पता था कि किस तरह से दुश्मन को उत्तर देना है, पर यहां पर स्थिति दूसरी थी। यहां पर दुश्मन को मार गिराना बहुत मुश्किल काम था। भारतीय सेना नीचे थी और पाकिस्तान की सेना ने ऊंचाई से भारत पर हमला किया था। दुश्मनों की गोलियां, हथगोले, मिसाइल आदि के बीच खुद को सुरक्षित करते हुए ऊपर जाकर पाकिस्तान सेना की पोस्ट में घुसकर उसके सैनिकों को मार गिराना था। इस काम में हालांकि भारतीय सेना को काफी हानि हुई, लेकिन जिस तरह से पाकिस्तानी सेना को भारतीय वीरों ने धूल चटाई वह इस युद्ध की ऐतिहासिकता है। यदि लड़ाई आमने-सामने की होती तो शायद 60 दिन से पहले ही भारत विजय पताका कारगिल की चोटियों पर फहरा देता। हाल का उदाहरण चीन का देख सकते हैं। गलवान घाटी में चीनी सैनिक भारतीय सैनिकों से कई गुना थे,लेकिन भारतीय सैनिकों ने अपने साहस से उन्हें बता दिया कि वह गीदड़ भभकियों से नहीं डरते।
ऐतिहासिकता का दूसरा पहलु
कारगिल का दूसरा पहलु यह है कि लगभग 18000 फीट की ऊंचाई पर लड़ते हुए भी भारतीय सेना को पाकिस्तान के मुकाबले काफी कम क्षति हुई। भारत की ओर से 527 जवान शहीद हुए थे तथा 1363 जवान घायल हुए। इसके विपरीत पाकिस्तान के तीन हजार सैनिकों को भारतीय वीरों ने मार गिराया था। बड़ी संख्या में पाकिस्तान के सैनिक पीठ दिखाकर भाग भी गए थे। भारतीय वीरों के किस्से पूरे देश में आज भी हर कहीं चर्चा का केन्द्र रहते हैं। खुद मौत के मुंह में जाते हुए भी अपने साथी को बचाने, सांसों की डोर टूटने पर भी दुश्मन को मार गिराने का जा ेसाहस हमारी सेना के जवानों ने दिखाया था वह इतिहास में उनकी गाथाओं के रूप में अमर रहेगा।
शहीद होने वाले सैनिकों का सम्मान पहले भी होता था लेकिन कारगिल के बाद जिस तरह से देश के हर हिस्से में उनको सम्मान दिया गया वह अपने आप में ऐतिहासिक है। यह बात भी नहीं भूली जा सकती कि इस युद्ध में बोफोर्स तोप ने हमारा जमकर साथ दिया था। इसी तोप के कारण भारत में एक समय राजनैतिक लड़ाई चरम तक पहुंच गई थी।
आज से 21 साल पहले जो जवान शहीद हुए उनमें से तमाम के बच्चे आज इस मुकाम पर हैं कि वह अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। वह सेना में शामिल होकर अफसर तक बन चुके हैं और दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए अपने पिता की दी हुई सीख पर खरे उतरने के लिए हर पल तैयार रहते हैं। हम उन वीर नारियों को भी नहीं भूला सकते जो जीवन के आरंभ में ही शहीद पति के सपने पूरे करने के लिए सेना में या तो भर्ती हो गईं या फिर उन्होंने अपने पुत्र, देवर या भाइयों को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है जहां पर उनके शहीद पति उन्हें पहुंचाने का सपना देखते थे। ऐसे खत आज भी उन वीर नारियों की संपदा हैं जिनमें लिखा है-हम भारत मां की सेवा के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देने जा रहे हैं और अगर वापस नहीं लौट सकें तो मेरे बच्चों को देश सेवा के लिए तैयार करना। कई पत्र तो ऐसे हैं जिन्हें पढ़ते हुए आंखें स्वयं नम हो जाती हैं। हाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर था जिसमें उनकी आंखें देशप्रेम से ओत-प्रोत सैनिकों के सम्मान में नम होती नजर आ रही हैं। ऐसे इस वीडियों को देखने के बाद हर भारतीय सेना के सम्मान में सैल्युट अपने आप करने लगता है। इस तरह की कहानियां इतनी हैं कि सभी का जिक्र करना संभव नहीं है,लेकिन कारगिल युद्ध में भारतीय सेना के साहस और शौर्य ने जो गाथा लिखी है उसकी मिसाल दूसरी मिलना मुश्किल है।
आत्मबल की अनुभूति
युद्ध जैसे कठिन समय तथा सेना में रहते समय का जीवन हमारे लिए काफी मुश्किल दौर था। मुझे याद है जब मेरे पति लेफ्टिनेंट कर्नल डा.अरुण जैन जब भी ड्यूटी पर होते थे मन में आशंकाएं स्वयं जन्म लेती थीं। फील्ड पोस्टिंग में सभी को चिंता होना स्वभाविक है। दूसरे कार्यों को कैसे मैनेज करें यह विचार आते ही रहते थे,लेकिन पति ने हमेशा हमें पॉजिटिव रहने की प्रेरणा दी। बच्चों को पढ़ाने, समाज में दूसरों का ध्यान रखने के लिए मेरे मन में एक आत्मविश्वास हमेशा रहा। इसी सकारात्मकता से जब मोबाइल फोन तो छोड़ दें लैंडलाइन भी गिनती के होते थे तब हम आसपास के लोग एक-दूसरे का संबल बनते थे तथा धर्म के प्रति जो मेरी रुचि थी उसके कारण हमेशा मैं चिंता मुक्त रही। परिवारीजनों से बातचीत,न केवल युद्ध के समय बल्कि यदा-कदा करते रहने से भी आत्मबल और सार्थकता का अहसास रहता है।
मधु जैन,पत्नि लेफ्टिनेंट कर्नल डा.अरुण जैन
जीवन दर्शन ही हिम्मत
हम जब भी सेना की बात करते हैं तो हमें एक ही बात पता होती है कि अनुशासन और सद्भावना। इसके साथ ही हर सैनिक का जीवन दर्शन होता है

हिम्मत। चाहे युद्ध के दौरान का जीवन हो या फिर साधारण दिन,सभी दिन हम एक अनुशासन में रहकर भारत मां की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित रखते हैं। जब कोई सेना में आता है तो उसे पता होता है कि वह देश सेवा के लिए आया है। सेना में उसे हर प्रकार से तैयार किया जाता है। यहां विषम परिस्थतियों में कैसे जीना है और जब कोई परेशानी आ जाए तो क्या करेंगे इसकी ट्रेनिंग आरंभ में ही दे दी जाती है। हम महिलाएं भी अपनी तरफ से एक-दूसरे को हमेशा मोटिवेट करती हैं तथा जब युद्ध जैसी कोई परिस्थति होती है तो एक-दूसरे के लिए सहारा बनती हैं।
उषा सिंह,पत्नी मेजर जनरल, देवेन्द्र पाल सिंह

जीत के लिए जान की परवाह नहीं
भारतीय सेना का चाहे अधिकारी हो या जवान वह सेना में भर्ती होते समय शपथ लेता है कि वह भारतीय संविधान की रक्षा करेगा। भारतीय सेना और देश
के प्रति वफ ादार रहेगा। चाहे इसके लिए उसे अपने प्राणों की आहुति ही क्यों ना देनी पड़े,वह जब सेना में आता है तो अपनी खुद की मर्जी से। वह यहां की चुनौतियों के बारे में पूरी तरह से जानता है। हर सैनिक चाहे अफ सर हो या जवान हो अपनी सर्विस के दौरान दुश्मन या आतंकवादियों की गोलियों का सामना करता है और यह जानकर भी सेना में रहते हुए वह कभी डर को अपने पास फटकने भी नहीं देता। मैं कह सकता हूं कि आज बहुत से शहीदों की विधवाओं ने या तो खुद सेना में भर्ती ली है या अपने बच्चों को उनके पिता की तरह सेना में भेजा है। कारगिल शहीद कैप्टन बत्रा ने अपनी माताजी को आखिरी पत्र में लिखा था कि या तो टाइगर हिल पर तिरंगा लहरा कर आऊंगा या तिरंगे में लिपट कर आऊंगा।
एक सैनिक युद्ध के मैदान में होता है तो वह पूरी तरह से युद्ध कर पाता है,क्योंकि उसे यह पता है कि अगर वह शहीद हुआ तो उसके परिवार की देखरेख करने के लिए पूरा देश उसके साथ है। आज देश का हर देशवासी और सरकार सैनिकों के बलिदान का सम्मान करती है। मैंने कारगिल युद्ध में ऑपरेशन एरिया में सर्विस व ऑपरेशन पराक्रम के दौरान 40 मीडियम रेजिमेंट सेल्फ प्रोपेल्ड को कमांड किया। मुझे सर्विस के दौरान तीन बार आर्मी कमांडर कमेंडेशन कार्ड से भी नवाजा गया। यह सम्मान भी कम नहीं है एक सैनिक के लिए।
सेना में भर्ती होते समय दो पहलू पर खास ध्यान दिया जाता है। पहला है अनुशासन और दूसरा चरित्र निर्माण। जैसे सोने को आग में तपा कर खरा किया जाता है उसी प्रकार उच्चकोटि की ट्रेनिंग से हर एक सिपाही व अफ सर को सोने की तरह निखारा जाता है तब जाकर वह युद्ध कर सकता है और उसमें विजय प्राप्त कर सकता है और इस प्रकार अनुशासन और चरित्र उसके जीवन का एक हिस्सा बन जाते हैं। यही चीजें कारगिल युद्ध के दौरान हमारे हर सैनिक-अफसर में थीं और हमने इनके बल पर पाकिस्तानी सैनिकों को मार भगाया। एक अधिकारी युद्ध के मैदान में अपने प्राणों की परवाह ना करते हुए निर्णय लेता है और यह जानते हुए भी की उस काम में उसकी जान का खतरा है। सभी सिपाही भी उस निर्णय का सम्मान करके उस आदेश का पालन करते हैं और पूरी ताकत से अपने देश के परचम को फ हराने के उद्देश्य से युद्ध करते हैं और विजय प्राप्त करते हैं।
सेानिवृत कर्नल,योगेन्द्र कुमार माथुर

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