सुनिए जी ! दिल्ली की सेक्स हैबिट बदल गयी है

अखिलेश अखिल

होली से पहले दिल्ली के लम्पटों ने डीयू में पढ़ने वाली कई छात्राओं के ऊपर वीर्य से भरे गुब्बारे को फेका। बाद में छात्र -छात्राओं और शिक्षकों ने इसका प्रतिकार दिल्ली पुलिस मुख्यालय से सामने किया। जिस बात को लेकर छात्राएं विरोध दर्ज करा रही थी ,अगल बगल के लोग सुनकर हतप्रभ थे ,शर्मिन्दा भी। भला दिल्ली के ये हाल कैसे हो गया ? लेकिन मामला अब यही तक नहीं रुका है। दिल्ली से अब पहले से ज्यादा जवान है और लम्पट भी। आइये हम आपको इस लम्पट और निशाचर संस्कृति वाले दिल्ली से आपका परिचय कराते हैं —

क्या आप ‘स्ट्रिपर पार्टी’ से वाकिफ हैं? नहीं हैं तो जान लीजिए- यह नए जमाने का नया ‘सेक्सुअल खेल’ है, जहां पुरुष वेश्या सतरंगी रोशनी में डांस करते-करते अपने कपड़े उतार देता है। दर्शकों में शामिल महिलाएं तालियां बजाती हैं और सीटी मारकर स्ट्रिपर के शरीर और सौष्ठव पर आहें भरती हैं। जब स्ट्रिपर अपने को नंगा कर लेता है, तब भूखी शेरनी की तरह महिलाएं उस पर टूट पड़ती हैं और अपना सब कुछ लुटा देने को उद्घत हो जाती हैं। यह कल्चर आज दिल्ली की शान है। आज उस संस्कृति के वाहकों में लड़कियों की अपेक्षा वे महिलाएं ज्यादा हैं, जो अपने को स्वच्छंद और स्वतंत्र होने का दम भरती हैं। बात यहीं तक नहीं है। पिछले साल जापान में दुनिया का पहला ‘महिला मास्टरबेशन क्लब’ खुला, तो दिल्ली के दलालों और उन्मुक्त विचारों वाली महिलाओं की नसों में गर्माहट आ गई। जापान के उस केंद्र पर दिल्ली की महिलाओं ने प्रतिक्रिया दी और कहा, ‘काश! यह क्लब दिल्ली में खुलता और हम पहला क्लब चलाने के लिए सुर्खियां लेते।’ आप अंदाजा लगा सकते हैं कि दिल्ली की ‘सेक्स हैबिट’ किस कदर बदल रही है!

बात तो यहां तक बढ़ गई है, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते! राजधानी में एक ऐसी संस्कृति पनप गई है, जो शाम ढलते ही मदहोशी के वातावरण में जीने को उद्घत हो जाती है। आइए, ऐसी ही दिल्ली की एक बाला से आपका परिचय कराते हैं, जो निशाचर संस्कृति की एक अंग है। ‘मैं गांव की महिला नहीं हूं कि बीड़ी पीऊं। सिगरेट, वह भी डनहिल और शराब के बिना रह नहीं सकती और इसमें खराबी क्या है? जीवन में आनंद न हो, तो फिर जीने का फायदा क्या?’ ये शब्द हैं दक्षिणी दिल्ली की एक बाला के, जो खबर लिखे जाने की शाम किसी पार्टी में जाने को तैयार थी। ऐसी बालाओं की एक फौज है यहां। इनकी एक गर्म संस्कृति है और अर्धनग्न जीवन शैली! स्ट्रिपर और रेव पार्टियां इन्हीं बालाओं के लिए आयोजित होती है। ‘रेव’ का अर्थ है मदमस्त और उत्तेजित होना। उस पार्टी में शामिल युवा समुदाय अफीम, गांजा, हेरोइन आदि का सेवन करता है और एक-दूसरे में खो जाता है। उस पार्टी में सेक्स है, नशा है, खुमार है और मस्ती के नाम पर वह सब है, जिसकी समाज में वर्जना है। दिल्ली के कई इलाकों में ऐसी पार्टियां होती हैं।

सेक्सुअल आनंद की कहानी यहीं तक सीमित नहीं है। इस शहर में पति-पत्नियों के लिए भी पार्टियां होती हैं। इस पार्टी में जैसे-जैसे नशे का सुरूर चढ़ता है, पार्टी अपने-अपने अंतिम ‘लक्ष्य’ की ओर बढ़ जाती है। पत्नियों की अदला-बदली होती है और फिर रात गुलजार! यहां पवित्रता और पत्नीव्रता जैसी दकियानूसी बातें नहीं होती हैं। भ्रष्ट तरीके से कमाए गए धन की गर्मी ‘इज्जत’ से ज्यादा होती है। यह दिल्ली की नई संस्कृति है, क्योंकि यहां तपिश है।

यह दिल्ली कभी इंद्रप्रस्थ थी, जहां कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत का धर्मयुद्घ लड़ा गया था। यही दिल्ली कभी सूफी-संतों की दुनिया थी, जहां एक से बढ़कर एक सूफी-संत डेरा जमाए रहते थे। यहीं थे बहादुरशाह जफर और स्थापित थी उनकी मुगलिया सल्तनत। इसी दिल्ली में गालिब और मीर की महफिलें सजती थीं और गूंजती थीं गांधी की प्रार्थनाएं ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम़.़ .।’ इसी दिल्ली में लालकिले की प्राचीर से ‘आधुनिक भारत के जनक’ पंडित जवाहर लाल नेहरू आधुनिक भारत के सपने देखते थे। यहीं के काफी हाउस, मंडी हाउस और जेएनयू से लेकर संसद तक सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर गंभीर बहसें हुआ करती थीं। यह वही दिल्ली है, जहां महिलाओं को मां-बहन के रूप में देखा जाता था और इसी दिल्ली में ‘अंग’ से ‘अंग’ सट जाने पर तलवारें खिंच जाती थीं, लेकिन अब यहां ये सब नहीं होता!

21वीं सदी में दिल्ली भी बदल गई है। दिल्ली में गर्मी है, तपिश है और खुलापन के साथ लूट, दुष्कर्म, हत्या, दलाली, सेक्स बाजार और झटपट धनी बन जाने की ऐसी होड़ लगी है, मानो हम कुएं में गिरने को आतुर हैं। दिल्ली का वर्तमान वह नहीं है, जो उसका अतीत था! अब यहां नए जमाने के ‘रईस’ रहते हैं। उनके पास पैसा है, सत्ता है और पुलिस की फौज है। कहते हैं कि गर्मी से गर्मी कटती है। इस शहर में गर्मी निकालने के कई ‘खेल’ हैं।

शरीर में थकान हो, तो आप मसाज सेंटर जा सकते हैं। वहां मानसिक और शारीरिक दर्द उतारने के लिए तमाम ‘देशी’ और ‘विदेशी’ चीजें उपलब्ध हैं। रेन डांस, डिस्कोथेक, पब्स (पियो और नाचो), डीजे, म्यूजिक, फोन पर सेक्स और इन सबसे इतर इंटरनेट पर सबसे ज्यादा सेक्स गेम का आनंद लिया जाता है। कनाट प्लेस के एक पुस्तक विक्रेता कहते हैं कि यहां की लड़कियां बेहद बेशर्म हैं। सेक्स की पत्रिकाएं लड़कियां बहुत पढ़ती हैं। पता नहीं, इस पत्रिका में पढ़ाई की कौन-सी बात है।’ दिल्ली पुलिस यहां के सेक्स बाजार पर कभी-कभी तल्ख भी होती हैं। पुलिस कहती है कि दिल्ली की लड़कियां सेक्स के मामले में पुरुषों से आगे हैं। लड़कियां ही पहले लड़कों को फांसती हैं, फिर मामला हत्या तक पहुंच जाता है। यहां लड़कियों की जितनी हत्याएं होती हैं, उसमें कहीं न कहीं सेक्स शामिल होता है। दिल्ली की उच्छृृंखल यौनाचार ने विवाह जैसी संस्था को अर्थहीन कर दिया है। बच्चों का पिता कौन है? मां कौन है? यह सवाल खड़ा हो गया है।

10-12 साल की कन्याएं मां बन रही हैं और लीविंग संबंध के नाम पर यौनाचार का खुलेआम खेल चल रहा है। जरा पार्कों में चले जाइए। प्रेमालाप के नए केंद्र बन चुके हैं राजधानी के कई पार्क। क्या बाला, क्या महिलाएं! दिल्ली के पार्कों में इनकी धमाचौकड़ी, देह पर देह और आलिंगन के नए-नए करतब देखकर आप भौंचक हो सकते हैं! हम यकीन कर सकते हैं कि अगली शताब्दी का नैतिक स्तर इतना गिरा नहीं होगा, जितना आज का है। चूंकि, समय परिवर्तनीय है और नैतिक स्तर पर बदलाव होता रहता है। शायद आगे इससे ज्यादा कुछ नहीं हो सकता। हां, इस बात पर हमें शर्म भी आ सकती है कि उस जमाने के लोग हमारे बारे में क्या-क्या सोचेंगे? किसी भी शताब्दी का कोई वर्ग इतना बेहया नहीं होगा, जितना हमारा उच्च और मध्यम वर्ग है। यही वह वर्ग है, जो बाजार के निशाने पर है और बाजार के लिए एक कमोडिटी है।

अजीब से अर्द्धनग्न कपड़े पहनकर इठलाती औरत में जितना औरताना सौंदर्य या अस्मिता है, उतनी ही मर्दानगी उस पुरुष में भी है, जो सूट, ब्लेजर पहने ब्रीफकेस लेकर चमचमाते जूते पहने, कार में जाता दिखता है। दिल्ली में बैग उठाए व्यस्त सफल दिखता पुरुष अपने बुद्घिबल और बाहुबल के दम पर कुछ नहीं रचता! दरअसल, वह दलाल है, लाइजनर है, उसकी समृद्घि और सफलता उतनी ही व्यक्तित्वहीन, सौंदर्यहीन है जितनी हमारे देश की तकनीकी और वैज्ञानिक तरक्की के किस्से। एक दलाल सभ्यता के ‘लार’ टपकाऊ विज्ञापनों की दुनिया के आधार पर इतिहास नहीं रचा जाएगा, लेकिन यह शायद हमारी सभ्यता के सबसे प्रामाणिक साक्ष्य हैं। खुशकिस्मती है कि इन्हें साक्ष्य की तरह देखा जाएगा, तब शर्म से डूब मरने के लिए हम नहीं होंगे।

लेकिन अभी ठहरिए। दिल्ली की लंपट संस्कृति से हम फिर आपका परिचय कराएंगे और ले चलेंगे आपको काम वासना के उन तमाम अड्डों पर, जहां लोग जाकर कामोत्तेजना के शिखर पर पहुंच जाते हैं, लेकिन याद रखिए ऐसा केवल दिल्ली में ही नहीं हो रहा है। पूरे देश में और पूरे समाज में सेक्स कुलांचे मारता फिर रहा है। लगता है पूरा समाज ही कामांध हो गया हो। आज ये बातें इसलिए कही जा रही हैं कि दामिनी की घटना के बाद भी समाज की काम वासना अपने पूरे शबाब पर है। चरमोत्कर्ष पर है। कानून चाहे जो कहे, काम वासना की अलग-अलग कहानियां समाज में बढ़ती कामांधता को स्थापित करने के लिए काफी हैं। यहां कोई अछूता नहीं है। इस रोग के शिकार हर कोई लग रहा है। नेता हो या फिर अभिनेता, समाजसेवी हो या फिर पत्रकार, साहित्यकार हो या फिर कलाकार और बच्चे हों या फिर बूढे, गांववाले हों या फिर शहर वाले, हर जगह कामांधता की हदें पार करते दिख रही हैं।

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