सुप्रीम कोर्ट के रडार पर मोदी-योगी

वैसे तो देश में हर रोज कई तरफ की घटनाएं सामने आती हैं, लेकिन पिछले दिनों जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने लोकपाल के मसले पर केंद्र की मोदी सरकार और यूपी में फर्जी मुठभेड़ को लेकर योगी सरकार को रडार पर लिया है उससे साफ है कि मोदी और योगी सरकार अपने कहे के मुताबिक नहीं चल रही है और न ही जनता से किए वादों के प्रति उनमें कोई रुचि है। दोनों सरकारों से सुप्रीम कोर्ट के सवालों की व्याख्या कर रहे हैं अखिलेश अखिल

पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त वादों की झड़ी लगाने वाले पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार अब सुप्रीम कोर्ट के रडार पर है। मामला लोकपाल की नियुक्ति को लेकर है। बता दें कि पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त मोदी जहां भी जाते थे, कांग्रेस को कोसते हुए लोकपाल की नियुक्ति की बात करते थे। कहते थे कि उनकी सरकार बनते ही लोकपाल की नियुक्ति होगी और देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन मोदी सरकार के साढ़े चार साल गुजर जाने के बाद भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं की गई। पहले जब-जब लोकपाल की नियुक्ति के बारे में आवाज उठी, भाजपा कहती रही कि लोकपाल की नियुक्ति में विपक्ष से एक सदस्य का होना जरूरी है, जबकि लोकसभा में कोई विपक्ष है ही नहीं। लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस होने के बावजूद उसे विपक्ष की मान्यता नहीं दी गई, क्योंकि संविधान के मुताबिक विपक्ष के लिए जितनी सीटों की जरूरत होती है, कांग्रेस के पास उतनी सीटें नहीं थीं।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसका भी हल भी निकाला, लेकिन लोकपाल की नियुक्ति नहीं हुई। लोकपाल को लेकर अन्ना हजारे फिर से धरने पर बैठे, उन्हें सरकार की तरफ से आश्वासन भी मिले, लेकिन लोकपाल सामने नहीं आया। अब लोकपाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट एक्शन में है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि लोकपाल की नियुक्ति कब होगी? कोर्ट ने केंद्र सरकार से दस दिनों के भीतर लोकपाल की नियुक्ति के लिए उठाए जाने वाले कदमों की समय-सीमा बताने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस मुद्दे पर कोई आदेश जारी करने से पहले वह केंद्र का पक्ष सुनना चाहता है। दूसरी तरफ, अटार्नी जनरल के. वेणुगोपाल ने बताया कि लोकपाल कमेटी की मीटिंग जल्द होने वाली है और इसकी प्रक्रिया जारी है। वहीं याचिकाकर्ता की ओर से पेश शांति भूषण ने कोर्ट से कहा कि जनवरी 2013 में लोकपाल बिल पास हुआ था। साढ़े चार साल बीत चुके हैं। अब वक्त आ गया है जब कोर्ट को अपने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार का इस्तेमाल कर लोकपाल की नियुक्ति करनी चाहिए। मामले में 17 जुलाई को अगली सुनवाई होगी।

गौरतलब है कि लोकपाल की नियुक्ति का मामले में अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हमें उम्मीद है कि सरकार जल्द ही लोकपाल की नियुक्ति करेगी। कोर्ट ने फिलहाल लोकपाल की नियुक्ति को लेकर आदेश जारी करने से इंकार किया था। कोर्ट ने कहा कि फिलहाल कोई आदेश जारी नहीं किए जाएंगे। केंद्र की ओर से एजी केके वेणुगोपाल ने कहा था कि नामचीन हस्ती की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया जारी है। वहीं कॉमन कॉज की ओर से प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार जानबूझकर नियुक्ति को लटका रही है।

अब सुप्रीम कोर्ट ने लोकपाल की नियुक्ति की समय-सीमा बताने के लिए सरकार को 10 दिन का समय दिया है। इस उच्चस्तरीय नियुक्ति को लेकर डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग को सुनवाई की अगली तारीख 17 जुलाई तक जवाब देना होगा। बता दें कि एनजीओ कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर लोकपाल की नियुक्ति में देरी का मुद्दा उठाया था। कॉमन कॉज की ओर से पूर्व कानून मंत्री और सीनियर एडवोकेट शांति भूषण पैरवी के लिए पेश हुए थे। केंद्र सरकार ने शुरुआत में लोकपाल की नियुक्ति में दिलचस्पी नहीं ली थी। उसका कहना था कि यह कानून कमजोर है और वह यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान पारित किए गए लोकपाल एक्ट में संशोधन कर कानून को मजबूत करेगी।

जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली बेंच ने सरकार की इस दलील को अस्वीकार करते हुए कानून को उसके मौजूदा स्वरूप में ही लागू करने को कहा। बेंच में जस्टिस आर. भानुमति भी शामिल हैं। बेंच ने इस प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों से एक शपथपत्र दाखिल कर लोकपाल और इससे जुड़े पैनल के सदस्यों की नियुक्ति के लिए कदमों और समय-सीमा की जानकारी देने के लिए कहा। जस्टिस गोगोई इससे पहले भी लोकपाल की नियुक्ति में देरी को लेकर नाराजगी जता चुके हैं। देश के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अक्टूबर में रिटायर होने के बाद जस्टिस गोगोई के ही अगला चीफ जस्टिस बनने की उम्मीद है। अब माना जा रहा है कि अगर समय रहते लोकपाल की नियुक्ति नहीं होती है, तो सुप्रीम कोर्ट कोई बड़ा एक्शन भी ले सकती है।

बता दें कि सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे की अगुवाई में हुए एक बड़े आंदोलन के बाद यूपीए की पिछली सरकार ने लोकपाल पर कानून बनाने का कदम उठाया था। सरकार की ओर से पेश हुए अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कोर्ट को बताया कि लोकपाल की नियुक्ति के लिए एक मीटिंग जल्द की जाएगी। देश को लोकपाल मिलने में अभी लगेगा समय : लोकपाल की नियुक्ति में अभी समय लग सकता है। लोकपाल के लिए उपयुक्त उम्मीदवारों को खोजने वाला एक पैनल अब नियुक्ति के लिए ‘पात्र उम्मीदवारों की सूची प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली सेलेक्शन कमेटी के सामने पेश करेगा। सेलेक्शन कमेटी इस सूची में से लोकपाल का चयन करेगी। सेलेक्शन कमेटी सूची से अलग नामों पर भी विचार कर सकती है। उम्मीदवारों को खोजने वाले पैनल में पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन, विजिलेंस, नीति बनाने, कानून और प्रबंधन की विशेष जानकारी या विशेषज्ञता रखने वाले सात व्यक्ति शामिल होंगे। इस मामले की 15 मई को हुई पिछली सुनवाई में सरकार ने कोर्ट को बताया था कि उसने पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी को उम्मीदवारों की खोज करने वाले पैनल में नियुक्त किया है। इसके साथ ही पैनल पूरा हो गया है।

रोहतगी की नियुक्ति सेलेक्शन पैनल ने की थी। इस पैनल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा देश के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और स्पीकर शामिल हैं। सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस के नेता को भी पैनल में सदस्य के तौर पर शामिल होना था, लेकिन पार्टी के प्रतिनिधि को विशेष आमंत्रित के तौर पर हिस्सा लेने के लिए कहा गया जिस वजह से उन्होंने मीटिंग में हिस्सा नहीं लिया था। अब कहानी यह बन रही है कि जिस लोकपाल बनाने को लेकर पीएम मोदी समेत तमाम भाजपा नेता जनता को विश्वास में लेते रहे, उसका अभी तक कोई आता-पता नहीं है। सामने फिर से लोकसभा चुनाव हैं। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट का डंडा और दूसरी तरफ पीएम मोदी की भ्रष्टाचार पर हमला करने की बात को विपक्ष भी भुनाने के फेर में है। अब तो कई भाजपा के लोग भी कह रहे हैं कि 2014 के चुनाव में जितने भी वादे किए गए थे, अधिकतर पूरे ही नहीं हुए। सबसे ज्यादा वादे भ्रष्टाचार को लेकर किए गए थे, लेकिन नोटबंदी, जीएसटी के बाद भी भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नहीं लग सका है।

यूपी सरकार पर भी शीर्ष अदालत का डंडा : सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में फर्जी मुठभेड़ होने का आरोप लगाने वाली याचिका पर प्रदेश सरकार से भी जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने एनजीओ, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी द्वारा दायर पीआईएल पर उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। एनजीओ की तरफ से उपस्थित वकील संजय पारीख ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में हाल ही में 500 एनकाउंटर किए गए हैं, जिसमें कुल 58 लोग मारे गए हैं। पीठ ने इस याचिका में हालांकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पक्षकार बनाना स्वीकार नहीं किया है। बता दें कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पहले इस मुद्दे पर राज्य सरकार को नोटिस जारी किया था। मार्च 2017 में राज्य में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार आने के बाद से ही प्रदेश में मुठभेड़ों की संख्या लगातार बढ़ गई है। योगी सरकार को दो हफ्तों के भीतर इस मसले पर विस्तृत जवाब देना होगा। माना जा रहा है कि फर्जी मुठभेड़ के मसले पर योगी सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, क्योंकि हर फर्जी मुठभेड़ को लेकर सरकार और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट अलग-अलग बातें कह रही है। अब जब लोकसभा चुनाव को लेकर योगी सरकार भी जातीय समूह को साधने में लगी है, फर्जी मुठभेड़ पर वह नंगी हो सकती है।

क्या कहती है याचिका : याचिका में कहा गया है, ‘राज्य आतंकवाद या बड़े अपराधियों से लडऩे के लिए संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ ऐसे साधनों को अपना नहीं सकता है। मुठभेड़ों के नाम पर ऐसी अतिरिक्त न्यायिक हत्याओं को राज्य प्रायोजित आतंक माना जाता है। याचिका में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा किए गए बयानों को संदॢभत किया गया है। जैसे- अपराधी जेल में होंगे या मुठभेड़ में मारे जाएंगे और हर किसी को सुरक्षा की गारंटी दी जानी चाहिए, लेकिन जो लोग समाज की शांति में दखल डालना चाहते हैं और बंदूक में विश्वास रखते हैं, तो उन्हें बंदूक की भाषा में ही जवाब दिया जाना चाहिए।

यूपी सरकार के पास नहीं है जवाब : योगी सरकार के कार्यकाल में कई ऐसी फर्जी मुठभेड़ हुई हैं जिसका जवाब सरकार के पास भी नहीं है। ऐसा ही एक मामला है फुरकान का। बता दें कि 8 अक्टूबर, 2017 को जब फुरकान अचानक और सबको हैरत में डालते हुए अपने घर पहुंचा, तब उसके 12 और 10 साल के बेटे उसे पहचान नहीं पाए। उसके बेटों ने पिछले सात सालों से उसे नहीं देखा था, क्योंकि वह गांव के एक झगड़े के सिलसिले में विचाराधीन कैदी के तौर पर मुजफ्फरनगर जेल में बंद था। फुरकान को जब शामली जिले के तीतरवाड़ा गांव में गिरफ्तार किया गया, उस वक्त उसकी उम्र 33 साल थी और वह आरा मशीन की एक स्थानीय इकाई में काम करता था। उसकी पत्नी नसरीन कहती है, ‘हमारे पास उसे रिहा कराने के लिए न पैसे थे न कोई जमानत देने वाला था, इसलिए उसे जेल से छूटा देखकर हम सब चकित रह गए। पुलिस का दावा था कि वह सहारनपुर, शामली और मुजफ्फरनगर में कई डकैतियों में शामिल था। नसरीन कहती हैं, ‘मैं दो सवाल पूछना चाहती हूं। पहला, वह सात साल से जेल में था, फिर वह इन डकैतियों में कैसे शामिल हो सकता है? दूसरा, आखिर पुलिसवाले खुद उसकी रिहाई के लिए बातचीत करने के लिए क्यों आए थे, जब वे उसका एनकाउंटर ही करना चाहते थे? क्या वे कोई बलि का बकरा खोज रहे थे?

क्या कहते हैं यूपी सरकार के आंकड़े : यूपी सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2018 तक पुलिस ने 1,038 एनकाउंटर किए थे। इनमें 32 लोग मारे गए थे और 228 घायल हुए थे। इनमें पुलिस के चार जवानों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी। इन एनकाउंटरों में मारे जाने वालों में सबसे ज्यादा लोग पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चार जिलों- शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और बागपत के हैं। इन आरोपों के मद्देनजर कि इन एनकाउंटरों में से कुछ वास्तव में हिरासत में की गई न्यायेतर हत्याएं हो सकती हैं।

छानबीन ने खोली पोल : पिछले महीनों में कुछ पत्रकारों ने मारे गए 14 लोगों के परिवार वालों से मुलाकात की और इन एनकाउंटरों से परिचित कई पुलिस अधिकारियों और आधिकारिक स्रोतों से बातचीत की थी। इस छानबीन से जो तस्वीर सामने निकलकर आती है, वह इन हत्याओं को लेकर जताए जा रहे सबसे बुरे संदेहों की पुष्टि करती है। अब यूपी की योगी सरकार फर्जी मुठभेड़ को लेकर शीर्ष अदालत को क्या रिपोर्ट बताती है और कोर्ट उसपर क्या संज्ञान लेता है इसे देखना बाकी होगा। लेकिन इतना तो तय है कि जो फर्जी मुठभेड़ हुई हैं, वह सब वोट की राजनीति का ही हिस्सा है। अब जब लोकसभा चुनाव की डुगडुगी बज रही है और भाजपा मजबूती से चुनावी जातीय समीकरण को अपने मुताबिक बनाने में लगी है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का मोदी और योगी सरकार पर डंडा बहुत कुछ कहता नजर आ रहा है।

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