सूखाग्रस्त बुंदेलखंड के जख्मों पर गीत-संगीत का नमक

खजुराहो: खजुराहो रेलवे स्टेशन पर शाम पांच बजे से छह बजे तक का नजारा आंखों में पानी ला देने वाला होता है, क्योंकि सैकड़ों परिवार दिल्ली जाने वाली संपर्क क्रांति एक्सप्रेस में भेड़ बकरियों की तरह जगह पाने के लिए सारा जोर लगाए हुए होते हैं, क्योंकि उन्हें यहां रोजी-रोटी का इंतजाम न होने पर परदेस जाना पड़ रहा है। इस स्टेशन से महज सात किलोमीटर दूर सात दिन तक ऐसा गीत, संगीत और फिल्मों के प्रदर्शन का दौर चला, जिसने अपने आपको संवेदनशील कही जाने वाली सरकार और प्रशासन की असंवेदनशीलता को सामने ला दिया।

सरकार और प्रशासन जनता के जख्मों पर मलहम लगाने के लिए होता है, न कि जख्मों पर नमक छिड़कने के लिए, मगर मध्य प्रदेश की सरकार और बुंदेलखंड के प्रशासन ने सूखाग्रस्त इस इलाके के जख्मों पर नमक छिड़कने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक तरफ हर रोज पांच हजार लोग पलायन करते रहे, तो दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव की चकाचौंध में खजुराहो डूबा रहा। खजुराहो का रहने वाला राकेश अनुरागी (25) घर छोड़कर रोजगार की तलाश में दिल्ली गया है।

उसे खजुराहो महोत्सव से ज्यादा अपनी रोजी रोटी की चिंता है। वह कहता है, “उसने यह जरूर देखा है कि कई जगह सजावट है और गाड़ियों की कतारें लगी है और कुछ संगीत की धुनें सुनाई देती हैं, मगर इससे हमारा क्या होगा, हमें तो रोजगार चाहिए, वह सरकार कर नहीं रही है। जो हो रहा है वह सब बड़े लोगों के लिए है, हम गरीबों की चिंता सिर्फ चुनाव के समय वोट के लिए होती है।”

सात दिन तक चले तीसरे खजुराहो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में दुनिया और देश के कई बड़े कलाकार जिनमें फ्रेंच अभिनेत्री मैरीने बरोजे, बॉॅलीवुड के जैकी श्राफ , शेखर कपूर, रमेश सिप्पी, मनमोहन शेट्टी, गोविंद निहलानी, रंजीत, प्रेम चोपड़ा, राकेश बेदी, सुष्मिता मुखर्जी सहित कई अन्य कलाकारों ने हिस्सा लिया। साथ ही विभिन्न देशों से आए कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दी। यह समारेाह राज्य के संस्कृति, पर्यटन, शहरी विकास, जनसंपर्क विभाग ने मिलकर आयोजित किया था।

स्थानीय बुद्धिजीवी रवींद्र व्यास कहते हैं, “सरकार का राजधर्म है कि, जब कोई क्षेत्र प्राकृतिक आपदा या विभीषिका से जूझ रहा हो, तो वहां उत्सव नहीं होते, राज्य में तो किसान हितैषी सरकार है, फिर यह आयोजन कैसे हुआ यह बड़ा सवाल है। खजुराहो से निजामुद्दीन जाने वाली गाड़ी में सिर्फ खजुराहो स्टेशन से ही हर रोज एक से डेढ़ हजार मजदूर पलायन कर रहे हैं, जो हालात को बताने के लिए काफी है। वहीं दूसरी ओर इस महोत्सव को देखने मुश्किल से हर रोज दो सौ से ज्यादा दर्शक नहीं पहुंचे, तो इससे ज्यादा कुर्सियां खाली रहीं। आखिर यह आयोजन किसके लाभ के लिए और किसकी मर्जी से हुआ, यह शोध का विषय है।”

जनसंपर्क विभाग के आयुक्त पी. नरहरि ने कहा, “इस फिल्मोत्सव का आयोजक उनका विभाग नहीं था, हां कुछ सहयोग जरूर किया है। बस इतनी ही हिस्सेदारी थी हमारे विभाग की।” फिल्म समारोह के आयोजन में अहम् भूमिका निभाने वाले पर्यटन विभाग के मंत्री सुरेंद्र पटवा से कई बार संपर्क किया गया, मगर वे उपलब्ध नहीं हुए। उनके निजी सहायक ने बैठकों में व्यस्त होने की बात कही। खजुराहो समारोह में राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव व सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते भी पहुंचे। भार्गव ने यहां की समस्याओं की नहीं, बल्कि इस आयोजन से खजुराहो को दुनिया में नई पहचान मिलने का जिक्र किया। साथ ही भरोसा दिलाया कि खजुराहो में नाट्य विद्यालय स्थापित करने के लिए प्रयास किए जाएंगे।

सागर संभाग के आयुक्त आशुतोष अवस्थी ने बताया, “मजदूरों को काम दिलाने के प्रयास हो रहे हैं, वहीं पानी को किस तरह रोका जाए ताकि आने वाले दिनों में इस समस्या को कम किया जा सके इसके लिए किसानों की कार्यशाला आयोजित की जा रही है। इस कार्यशाला में किसानों को विशेषज्ञ प्रशिक्षित करेंगे।” विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का कहना है, “शिवराज सिंह चौहान सरकार जो अपना चेहरा दिखाती है, वह उसका असली चेहरा नहीं है, वास्तव में उसका असली चेहरा असंवेदनशील है। तभी तो वह एक तरफ जहां एकात्म यात्रा निकाल रही है तो दूसरी ओर खजुराहो में फिल्मोत्सव आयोजित करती है। उसे यहां के किसान मजदूर की चिंता नहीं है तभी तो लगभग पांच लाख लोग काम की तलाश में राज्य से पलायन कर गए हैं।”

बुंदेलखंड में कुल 13 जिले आते हैं जिनमें मध्य प्रदेश के छह जिले छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, दमोह, सागर व दतिया और उत्तर प्रदेश के सात जिलों झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बांदा, महोबा, कर्वी (चित्रकूट) शामिल हैं। यहां के मजदूर अमूमन हर साल दिल्ली, गुरुग्राम, गाजियाबाद, पंजाब, हरियाणा और जम्मू एवं कश्मीर तक काम की तलाश में जाते हैं।

बुंदेलखंड के लोगों के मन में यह बात तेजी से घर करने लगी है कि इस इलाके में पानी का संकट है तो सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ स्थानीय नेताओं की आंखों का पानी भी सूख चुका है। यही कारण है कि जिन नेताओं और सरकारी अफसरों को गांव में किसानों की समस्या सुनकर पलायन जैसी विभीषिका को रोकने के प्रयास करने चाहिए थे, वे खजुराहो में फिल्मों और संगीत का लुफ्त ले रहे थे।

प्रकृति तो रूठी ही है, वहीं वे लोग भी मौज कर रहे हैं, जिन्हें पीड़ितों के जख्मों पर मलहम लगाना चाहिए। फिल्म महोत्सव पर जितना खर्च किया होगा, उतने में कम से कम पांच तालाब तो बन ही सकते थे, जो आने वाले समय में यहां की जरूरत को पूरा करने का माध्यम बनता, मगर जनता खुश और प्रसन्न रहे यह किसे रास आता है।

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