सोनिया के नेतृत्व में बनेगा महागठबंधन, पवार-ममता को राहुल से परहेज

अखिलेश अखिल

कांग्रेस अधिवेशन के बाद तुरंत बाद विपक्षी एकता की राजनीति शुरू हो जायेगी। सूत्रों से मिली खबर के मुताबिक़ कांग्रेस के पुराने दिग्गज और एनसीपी नेता शरद पवार सोनिया के साथ मिलकर विपक्षी दलों को एक छतरी के नीचे लाने में जुटे हैं। पवार गैर भाजपाई दलों के बीच धुरी बनते दिख रहे हैं। विपक्षी एकता को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी लगातार शरद पवार से मिल रहे हैं एक सप्ताह के भीतर पवार से राहुल की दो बार बैठक हो चुकी है।

बता दें कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और और यूपी-बिहार के उपचुनाव में जिस तरह से बीजेपी को पटकनी मिल रही है उससे विपक्षी एकता की संभावना बढ़ गयी है। हालांकि अभी तक बसपा सुप्रीमो मायावती लगातार कह रही है कि वह गठबंधन को लेकर अभी तैयार नहीं है लेकिन सूत्रों से जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक पवार और ममता मिलकर मायावती पर दबाब डाल रहे हैं की उन्हें विपक्षी एकता के साथ आना चाहिए। बता दें कि इसी महीने के अंत में शरद पवार ने भी विपक्षी दलों के नेताओं को भोज पर आमंत्रित किया है जिसमे सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती के भी आने की सम्भावना है।

पवार ने 28 मार्च को दिल्ली में तमाम विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं की बैठक भी बुलाई है। इस बैठक में टीएमसी की प्रमुख ममता बनर्जी भी हिस्सा ले सकती हैं। इस बैठक में आगे की रणनीति पर चर्चा होगी। खबर मिल रही है कि विपक्षी एकता को लेकर गैर बीजेपी दलों में हालांकि कोई संशय नहीं है लेकिन पवार और ममता ने सोनिया से साफ़ कह दिया है कि वे सोनिया गांधी का नेतृत्व स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन राहुल गांधी के साथ उनके नीचे काम नहीं कर सकते। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताविक सोनिया ने भी इस मसले पर हामी भर दी है। इधर जब कांग्रेस का अधिवेशन 18 मार्च को ख़त्म हो जाएगा और उसकी चुनावी रणनीति सामने आ जायेगी तब पवार आगे की रणनीति पर काम शुरू करेंगे। 28 को पवार के यहां विपक्षी दलों की बैठक के बाद माना जा रहा है कि अप्रैल तक विपक्षी एकता को लेकर स्पष्ट नजरिया साफ़ हो जाएगा।

उधर एक अन्य घटनाक्रम में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान ने भी सभी दलित सांसदों की बैठक बुलाई है। यह बैठक पासवान के घर पर गुरुवार को हुई। बता दें कि पासवान ने इससे पहले 2015 में भी ऐसी ही बैठक बुलाई थी। तब भाजपा को बिहार के विधानसभा चुनाव में हार मिली थी। इसके मद्देनज़र पासवान के घर हुई बैठक को भी भाजपा के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा है। हालांकि पासवान के यहां हुयी बैठक को भी राजनीतिक नजरिए से देखने की जरूरत है लेकिन अभी तक पासवान से विपक्षी दलों के किसी नेताओं की कोई चर्चा नहीं हुयी है।

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