स्पर्म भी देते हैं अपने प्रतियोगी को जहर, जन्म से पहले ही शुरु हो जाती है प्रतियोगिता

लंदन: किसी भी जन्म की शुरूआत ही एक भयानक प्रतियोगिता से होती है। जीव से पैदा हुए शुक्राणु अपने प्रतियोगियों को जहर देकर खत्म कर देते हैं। बर्लिन के शोधकर्ताओं ने बताया है कि जब प्रजनन प्रक्रिया के समय किसी नर से वीर्य छूटते हैं, तब लाखों की संख्या में शुक्राणु अंडा कोशिका की ओर बढ़ते हैं। सब बेहद तेजी में। सब चाहते हैं कि वो अंडा कोशिका से मिलकर एक नए जीव की उतपत्ति करें। लेकिन सफलता किसी एक को ही मिलती है।

शुक्राणुओं के अंडा कोशिका तक पहुंचने की काबिलियत उनके पास मौजूद प्रोटीन आरएसी1 की मात्रा पर निर्भर करती है। अगर आरएसी1 प्रोटीन की मात्रा उपयुक्त है तो हर एक शुक्राणु की ताकत और गति अच्छी होगी। अगर यह प्रोटीन नहीं है तो इसकी वजह से नपुंसकता पैदा होती है। जब शुक्राणु एग सेल यानी अंडा कोशिका की ओर तैरना शुरु करते हैं तो सिर्फ किस्मत ही साथ नहीं देती। उस समय हर शुक्राणु की प्रतियोगी क्षमता भी मायने रखती है। चूहों पर किए गए इस अध्ययन के मुताबिक कुछ शुक्राणु बेहद स्वार्थी या सेल्फिश होते हैं।

इसमें उनकी मदद करता है एक खास तरह का डीएनए सेगमेंट। यह सेगमेंट जेनेटिक इनहेरीटेंस यानी अनुवांशिक उत्तराधिकार के नियमों को तोड़ता है। इसी से शुक्राणुओं की सफलता का दर तय होता है। बर्लिन स्थित मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर मॉलिक्यूलर जेनेटिक्स में हुए इस अध्ययन में बताया गया है कि कैसे जेनेटिक फैक्टर जिसे ‘टी-हैप्लोटाइप’ कहते हैं वह फर्टिलाइजेशन की सफलता को तय करता है। पहली बार रिसर्चर्स ने ये बात पता कि है कि जिस स्पर्म के पास ‘टी-हैप्लोटाइप’ जेनेटिक फैक्टर होता है, वह ज्यादा ताकतवर होता है।

‘टी-हैप्लोटाइप’ जेनेटिक फैक्टर वाले शुक्राणु अपने प्रतियोगियों से ज्यादा तेज और फर्टिलाइजेशन में ज्यादा आक्रामक होते हैं। ये अपने लक्ष्य तक एकदम सीधे जाते हैं। इन्हें किसी से कोई मतलब नहीं होता। ‘टी-हैप्लोटाइप’ जेनेटिक फैक्टर और आरएसी1 प्रोटीन वाले स्पर्म के अंदर से केमिकल सिग्नल निकलते हैं जो अंडा कोशिका तक जाने का उन्हें सीधा और सुरक्षित रास्ता बताते हैं।मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर मॉलिक्यूलर जेनेटिक्स के निदेशक बर्नहार्ड हर्मेन बताते हैं कि ‘टी-हैप्लोटाइप’ जेनेटिक फैक्टर वाले शुक्राणु उन प्रतियोगियों को निष्क्रिय कर देते हैं जिनके पास ये जेनेटिक फैक्टर नहीं होता।

यानी उन्हें जहर देकर मार देते हैं। बर्नहार्ड ने बताया कि ‘टी-हैप्लोटाइप’ स्पर्म अन्य शुक्राणुओं को जहर देकर मार देते हैं। साथ ही उसी समय एक ऐसा एंटीडो़ट निकालते हैं जिससे वह खुद सुरक्षित रह सकें।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...
Loading...
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper