हमें जीने दो

व्यथाकथा-1 : लखनऊ में रहने वाली विधवा नसीमुन को उनका बेटा मो. जुबैर बहुत ज्यादा प्रताडि़त करता था। मां से मारपीट सामान्य बात थी। परेशान नसीमुन ने कई बार पुलिस से शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं हुआ। जिलाधिकारी भी इस मामले में संवेदनहीन रहे। आखिरकार 14 मई, 2019 को नसीमुन ने कानूनन अपने बेटे को संपत्ति से बेदखल कर दिया और इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में एक याचिका दाखिल की। इस याचिका में नसीमुन ने आरोप लगाया कि उनका बेटा जुबैर मकान हड़पना चाहता है और इसीलिए जुल्म ढा रहा है। इस पर जस्टिस अजय लांबा और जस्टिस एनके जौहरी ने सख्त रुख दिखाते हुए जिलाधिकारी को सख्त कार्रवाई करके रिपोर्ट पेश करने को कहा।

व्यथाकथा-2 : निगोहां के रहने वाले रामचंद्र (72 वर्ष) ने अपने बेटे को उचित परवरिश देने की खातिर फेरी तक लगाई। लेकिन उसी बेटे और बहू ने न सिर्फ उनके साथ मारपीट की, बल्कि घर से भी निकाल दिया।

व्यथाकथा-3 : मल्हौर में रहने वाले लालमणि स्वास्थ्य विभाग में काम करते थे और फिलहाल रिटायर हो चुके हैं। अपने इकलौते बेटे की खातिर उन्होंने वह सब कुछ किया, जो एक पिता करता है। लेकिन बेटे ने संपत्ति हड़पने की खातिर सारी मर्यादाएं ताक पर रख दीं। लालमणि अब मजबूर होकर अपनी बेटी के घर में रह रहे हैं और बेटे के खिलाफ अदालत से न्याय की गुहार लगाई है।

व्यथाकथा-4 : पिछले दिनों दिल्ली से सटे गाजियाबाद जिले से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई। एक बुजुर्ग दंपति ने एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करके पुलिस से गुहार लगाई कि उन्हें उनके बेटे-बहू के टॉर्चर से बचाएं। इस दंपत्ति का नाम है इंद्रजीत ग्रोवर और पुष्पा ग्रोवर। उन्होंने आरोप लगाया कि बेटा-बहू उनके अपने ही घर से उन्हें निकलने पर मजबूर कर रहा है। दोनों बुजुर्ग दंपत्ति की उम्र करीब 68 वर्ष है। अमूमन संवेदनहीन रहने वाली पुलिस ने इस मामले के सोशल मीडिया में फैलने के बाद बेटे-बहू को घर से निकालने में तत्परता दिखाई।

‘मातृ देवो भव:, पितृ देवो भव:।’ इस पंक्ति को बोलते हुए हमारा शीष श्रद्धा से झुक जाता है और सीना गर्व से तन जाता है। यह पंक्ति सच भी है। जिस प्रकार ईश्वर अदृश्य रहकर हमारे माता-पिता की भूमिका निभाता है, उसी प्रकार माता-पिता हमारे दृश्य, साक्षात ईश्वर हैं। इसीलिए तो भगवान गणेश ने ब्रह्मांड की परिक्रमा करने की बजाय अपने माता-पिता शिव-पार्वती की परिक्रमा करके प्रथम पूज्य होने का अधिकार हासिल कर लिया था। लेकिन आज के इस भौतिकवाद (कलयुग) में बढ़ते एकल परिवार के सिद्धांत और आने वाली पीढ़ी की सोच में परिवर्तन के चलते ऐसा देखने को नहीं मिल रहा। कुछ परिवारों को छोड़ दें, तो आज अधिकांश परिवारों में बुजुर्गों को भगवान तो क्या, इंसान का दर्जा भी नहीं दिया जा रहा है।

किसी जमाने में जिनकी आज्ञा के बिना घर का कोई कार्य और निर्णय नहीं होता था, जो परिवार में सर्वोपरि थे, आज उपेक्षित, बेसहारा और दयनीय जीवन जीने को मजबूर हैं। तथाकथित पढ़े-लिखे लोग, जो खुद को आधुनिक मानते हैं, पशुवत व्यवहार करना सीख गए हैं। ऐसे लोग अपने माता-पिता एवं अन्य बुजुर्गों को ‘रूढि़वादी’, ‘सनके हुए’ और ‘पागल हो गए ये तो’ तक का संबोधन देने लगे हैं। यही वजह है कि अब घर की चारदीवारी के अंदर की कलह बाहर निकलने लगी है। पुलिस से लेकर अदालतों तक मामले पहुंच रहे हैं। अदालतों में पहुंच रहे विवादों में ज्यादातर यही देखा जा रहा है कि संतानों ने माता-पिता की संपत्ति पर कब्जा करने के बाद उन्हें दर-बदर की ठोकर खाने या फिर असहाय होकर परिस्थितियों से समझौता करके खुद को भाग्य के सहारे छोड़ देने के लिए मजबूर कर दिया है।

यही वजह है कि संप्रग सरकार ने 2007 में ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण व कल्याण कानून’ बनाया। दिसम्बर, 2007 से यह कानून लागू भी हो गया, लेकिन दुर्भाग्य से इस कानून के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है और यह सिर्फ कानून की किताबों या संतानों से सताए जाने के कारण वकीलों की शरण लेने वाले वृद्धजनों तक ही सीमित रह गया है। अपने ही देश, समाज और घर-परिवार में बेगाने होते जा रहे बुजुर्गों की स्थिति से उच्चतम न्यायालय भी चिंतत है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मदन लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने 13 दिसम्बर, 2018 को कांग्रेस नेता डॉ. अश्विनी कुमार के इस विषय पर एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को विस्तृत निर्देश भी दिए थे, लेकिन यह मामला इसके बाद से अगली कार्यवाही के लिए आज तक सूचीबद्ध नहीं हुआ।

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में कुल आबादी में बुजुर्गों यानी 60 साल से ज्यादा उम्र वाले लोगों की तादाद लगभग आठ फीसदी थी। इसके 2026 में 12.5 फीसदी और 2050 तक 20 फीसदी पहुंच जाने का अनुमान है। इस समय देश में वरिष्ठ नागरिकों की जनसंख्या 12 करोड़ से अधिक है। एक सर्वे में कहा गया है कि बुजुर्गों की 52.4 फीसदी आबादी किसी न किसी तरह दुव्र्यवहार की शिकार है। कुछ बुजुर्गों को हमेशा अपमान का शिकार होना पड़ता है, तो कई के पास खाना-कपड़ा जैसी मौलिक सुविधाएं भी नहीं हैं। बुजुर्गों की खराब होती स्थिति के चलते ही सुप्रीम कोर्ट भी चाहता है कि देश के प्रत्येक जिले में वृद्धाश्रमों का निर्माण हो।

लेकिन एक बात समझ से परे है कि क्या अपने बुजुर्गों के प्रति परिवारों की कोई जिम्मेदारी नहीं है। हम इतने स्वार्थी और खुदगर्ज कैसे हो सकते हैं कि कहीं संपति हथियाने की खातिर, तो कहीं दूसरे कारणों से परिवार के इन बुजुर्गों की देखभाल करने की जिम्मेदारी से मुंह मोडऩे लगे। परिवार के बुजुर्गों को प्यार और सम्मान देने की बजाय उनका तिरस्कार करने और उनसे पीछा छुड़ाने का प्रयास करने वाली संतानों को यह नहीं भूलना चाहिए कि भविष्य में वे भी इस अवस्था में पहुंचेंगे और यदि उनके बच्चों ने उनके साथ ऐसा व्यवहार किया, तो फिर क्या होगा?

आलोक निगम की कलम से

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...
Loading...
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper