हे करणी वीर ! पद्मावत पर तुम्हारी हुंकार दागदार हो गयी

अखिलेश अखिल

लखनऊ ट्रिब्यून दिल्ली ब्यूरो: क्षत्रियों की निजी सेना के रूप में देश में अवतरित करणी सेना अब दागदार प्रतीत हो रही है। जिस तरीके से पद्मावत का उसने विरोध कर देश को खलबला दिया था और जिस अंदाज में अब पद्मावत के सपोर्ट में खड़ी दिख रही है उससे वीरों की यह सेना दागदार हो गयी है। कई सवाल खड़े हो रहे हैं और हर सवाल से प्रति सवाल निकल रहे हैं। शुक्रवार को करणी सेना ने घोषणा की है कि फिल्म में राजपूतों की वीरता को दर्शाया गया है इसलिए अब उन्होंने फिल्म का विरोध नहीं करने का फैसला लिया है। फिर पहले इसका विरोध क्यों किया ? किसके इशारे पर किया ? इस बवाल के पीछे की राजनीति क्या थी ? जब आज पता चल रहा है कि पद्मावत में वीर क्षत्रियों के आन ,बान और शान में कोई कटौती नहीं की गयी है तो पहले इसे देखने की जहमत क्यों नहीं उठाई गयी। भंसाली बार पद्मावत को देखने की मिन्नते करते रहें लेकिन करणी सेना फिल्म देखने की बजाय देश को आग में झोकते रही। यह तो किसी राष्ट्री कलंक से कम नहीं। उचित तो यही होता कि करणी सेना को राष्ट्र से माफ़ी मांगनी चाहिए।

भारत के इतिहास में क्षत्रिय राजाओं ,संस्कारों ,वीरों और वीरांगनाओं की कहानियां भरी पड़ी है। राष्ट्र निर्माण में उसके योगदान को कौन नहीं जानता। सदा से ही देश की रक्षा करने की जिम्मेदारी क्षत्रिय ही निभाते रहे हैं। इस समाज के शुर वीरों ने हमेशा ही देश एकता और अखंडता के लिए जान की बाजी भी लगाई। आजाद भारत में भी क्षत्रिय समाज के समाज सुधारकों और नेताओं ने अहम् भूमिका देश निर्माण में निभाई है। भला कौन भुला सकता इसे। लेकिन मात्रा एक फिल्म को लेकर एक जातीय सेना सत्ता -सरकार और राजनीति को प्रभावित करते दिखी, कभी ऐसा देखा नहीं गया।

यह बात और है कि जातीय सेना इस देश में बहुत पहले से बनते रहे हैं। लेकिन उस सेना के अधिकतर क्रियाकलाप रंजिश से भरे थे। खून करने और बदला लेने तक सिमित था। बिहार में कई सेनाएं कालांतर में इसी क्रियाकलाप से लैश रहे हैं। आज सारी सेनाये रसातल में चली गयी है। इसलिए करणी सेना द्वारा अपनी अस्मिता की लड़ाई की बात तो ठीक थी लेकिन बिना देखे सुने जिस तरह से यह सेना देश को तमाशा में तब्दील करती रही उसे भला कौन स्वीकार कर सकता है। अब तो चलन हो सकता है कि किसी भी जाति के लोग किसी बात पर एक होकर लोकतंत्र को बाधित करना शुरू कर दे। कौन रोकेगा उसे ? यह एक गंभीर सवाल है।

श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के नेता योगेंद्र सिंह कटार ने कहा- सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखदेव सिंह जी के निर्देशों के बाद पद्मावत का विरोध नहीं करने का निर्णय लिया गया है। सेना के कुछ सदस्यों ने मुंबई में शुक्रवार को फिल्म देखी और पाया कि फिल्म में राजपूतों के बलिदानों और उनकी वीरता का वर्णन किया गया है। हर राजपूत को इस फिल्म को देखने के बाद गर्व महसूस होगा। अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की बात रखते हुए योगेंद्र सिंह ने बताया- फिल्म में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मावती के बीच ऐसा कोई आपत्तिजनक सीन नहीं है जो राजपूतों की भावनाओं को आहत करता हो। इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए करणी सेना ने अपना विरोध वापस ले लिया है। इतना ही नहीं अब करणी सेना फिल्म को राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के सिनेमाघरों में फिल्म को रिलीज कराने का भी प्रयास करेगी।

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