हे शाह जी! यूपी-बिहार के गरीब गुरबे जाग उठे हैं, अपनी रणनीति बदलिए

अखिलेश अखिल

यूपी और बिहार के उपचुनाव परिणाम भाजपा के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं। जिस तरह से दोनों सूबे के गरीब गुरबों ने जुमले की राजनीति को ध्वस्त किया है वह बीजेपी की विस्तारवादी राजनीति के खिलाफ किसी दस्तक से कम नहीं। पिछले चार साल से जुमले की राजनीति से सबसे ज्यादा त्रस्त गरीब गुरबे ही हुए हैं। धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति अब इन गरीब गुरबों को नहीं सुहा रही। गरीब गुरबे मान रहे हैं कि यह देश धार्मिक जरूर है और राष्ट्रवादी भी लेकिन बीजेपी का राष्ट्रवाद और बीजेपी का धरम समझ से परे है।

गोरखपुर के नयन महतों अपनी नाराजगी दर्ज करते हैं। कहते हैं कि ” 2014 और 2017 में बीजेपी वाले बहुत बोलते थे। तब लगा था कि हमारे दिन फिर जाएंगे। असली समस्या रोजगार की है। लेकिन रोजगार पर यह सरकार बोलती ही नहीं। चुनाव के बाद धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति होने लगी। चुनावी वादों में इसका जिक्र नहीं था। जीत मिलती गयी और बीजेपी वाले घमंड में जीने लगे। प्रधानमन्त्री विदेशों की यात्रा कर रहे हैं। करते रहिये लेकिन हमें भी इसका लाभ तो मिले। भाषण से अब पेट नहीं भरता। इस तरह की राजनीतिक ठगी अब जनता नहीं सहन करेगी। ”

जाहिर है बीजेपी की राजनीति अब लोगों को परेशान कर रही है। इस साल कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसमें राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ प्रमुख हैं। 2019 में लोकसभा चुनाव भी होने हैं। ऐसे में मोदी-शाह की जोड़ी को अब नई रणनीति के साथ कड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है। शाह को अपनी रणनीति बदलनी होगी और जनता की उम्मीदों पर उतरनी होगी। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की तमाम रणनीति यूपी और बिहार के उपचुनाव में फेल हो गई हैं। इससे पहले राजस्थान और मध्य प्रदेश के उप चुनाव में भी भाजपा को मुंह की खानी पड़ी थी। लेकिन, यूपी और बिहार के उपचुनाव निश्चित ही भाजपा के चाणक्य अमित शाह का सिर दर्द बढ़ाने वाले होंगे। ये चुनाव गैर-भाजपा दलों के लिए भी नई दिशा देने वाले साबित हो सकते हैं।

यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की डिनर डिप्लोमेसी के बाद भाजपा की उपचुनाव में शिकस्त विपक्ष की एकजुटता को मजबूती देती नजर आ सकती है। यूपी में जिस तरह से बसपा और सपा ने गठजोड़ कर भाजपा को हराया है, अगर यही रणनीति दोनों लोकसभा चुनाव 2019 में अपनाई तो भाजपा का खेल यूपी में तमाम हो सकता है। अमित शाह के लिए चिंता की एक वजह यह भी है कि एनडीए के घटक दलों में भी केंद्र की मोदी सरकार से मोह भंग हो रहा है। इसका संकेत पहले शिवसेना ने दिया, फिर इस कड़ी को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू की टीडीपी ने आगे बढ़ाया। तेलंगाना में भी केसीआर की पार्टी मोदी सरकार से नाराज चल रही है।

भाजपा के लिए उस सूरत में मुश्किलें और भी बढ़ती नजर आ सकती है, जब गैर-भाजपा दलों का महागठबंधन मूर्त रूप ले लेता है। हालांकि इसके गठन में भी काफी दिक्कतें आने वाली हैं। अगर महागठबंधन फिर भी खड़ा हुआ तो भाजपा की चुनावी जमीन खिसकानी विपक्ष के लिए आसान हो जाएगी। पीएनबी घोटाला और राफेल डील पर मोदी सरकार पहले ही विपक्ष के निशाने पर है। वहीं, देश की अर्थव्यवस्था जमीन स्तर पर उतनी चमकदार नजर नहीं आती है, जितनी की मीडिया में दिखाई जाती है।

इसके अलावा किसान और मजदूरों में बढ़ता असंतोष भी भाजपा के लिए चिंता का सबब साबित हो सकता है। चारो तरफ बेरोजगारी का दंश दिख रहा है। दिल्ली में पिछले दो सप्ताह से परीक्षा में हो रहे घोटाले और पेपर लिक से जुड़े मसलों को लेकर धरना पर बैठे हजारों छात्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन सरकार कुछ करती नजर नहीं आ रही है। ऐसे में जब देश के गरीब गुरबे ,किसान और युवा बीजेपी सरकार के विरोध में खड़े हो जाए तो फिर किसी की राजनीति बदलते देर नहीं लगती।

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