हॉस्टल के छात्रों में यह कैसा जातीय विभाजन

– अजय बोकिल

लखनऊ के बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के सिद्धार्थ हॉस्टल में रहने वाले सवर्ण छात्रों ने आरोप लगाया कि उसी हॉस्टल के दलित छात्र उन्हें कमरे में पूजा-पाठ नहीं करने देते। उधर दलित छात्रों ने विवि प्रशासन को चिट्टी लिखी कि सिद्धार्थ हॉस्टल में केवल दलित छात्रों को ही कमरे अलॉट किए जाएं। यह दिमाग को झकझोरने और भविष्य में देश और समाज की तस्वीर की डरावनी झलक दिखाने वाली घटना है।

अपने समुदायों और समाजों के क्षुद्र स्वार्थों में उलझे, हर समस्या का समाधान राजनीति में खोजने और मंदिर-मस्जिद में मगन लोगों को इस बात का अंदाजा ही नहीं है कि हिंदू समाज आज कितने गहरे तक विभाजित हो चुका है, हो रहा है। ताजा घटना उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के सिद्धार्थ हॉस्टल की है। यहां रहने वाले सवर्ण छात्रों ने आरोप लगाया कि उसी हॉस्टल के दलित छात्र उन्हें कमरे में पूजा-पाठ नहीं करने देते।

उधर दलित छात्रों ने विवि प्रशासन को चिट्टी लिखी कि सिद्धार्थ हॉस्टल में केवल दलित छात्रों को ही कमरे अलॉट किए जाएं। इस विवाद का प्रशासन ने तोड़ यह निकाला कि सवर्ण छात्रों को एक अन्य कनिष्क हॉस्टल में शिफ्ट कर दिया। इस बारे में विवि का कहना था कि हम क्या करें। रोज-रोज के झगड़ों से तो अच्छा है कि सवर्ण दलित छात्र अलग-अलग ही रहें। यानी छात्रों में सीधे-सीधे जाति के आधार पर विभाजन कर दिया गया।

यह दिमाग को झकझोरने और भविष्य में देश और समाज की तस्वीर की डरावनी झलक दिखाने वाली घटना है। सवर्ण छात्रों ने अगस्त में विवि प्रशासन को लिखित शिकायत की थी कि वे अपने कमरों में सुबह पूजा-पाठ करते थे, जिस पर हॉस्टल में रहने वाले दलित छात्रों को आपत्ति थी। उनका कहना था कि यहां कमरे में कोई पूजा-पाठ या भगवान की मृत या फोटो नहीं लगा सकते। सवर्ण छात्रों के मुताबिक, जब ज्यादा प्रताडि़त किया गया तो उन्होंने विवि प्रशासन से कार्रवाई की मांग की। प्रशासन ने सवर्ण छात्रों का हॉस्टल ही बदल दिया। बताया गया कि विश्वकर्मा पूजा के दिन भी कुछ छात्रों ने हॉस्टल परिसर में विवि प्रशासन को पूजा के आयोजन से रोका था। उधर एससी-एसटी वर्ग के छात्रों ने 31 अगस्त को डीन स्टूडेंट वेलफेयर मेंस और विमेन (डीएसडब्ल्यू) को पत्र लिखकर मांग की कि सिद्धार्थ ब्वॉयज हॉस्टल के साथ ही चित्रलेखा गल्र्स हॉस्टल को भी एससी-एसटी कैटेगरी का घोषित कर दिया जाए, ताकि सवर्ण छात्राओं को वहां प्रवेश से रोका जा सके।

लेकिन तत्कालीन डीएसडब्ल्यू विमेन प्रो. सुदर्शन वर्मा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था। इस बारे में विवि के डीएसडब्ल्यू (मेंस) प्रो. बीएस भदौरिया का कहना है कि यह बात सही है कि हॉस्टल को इस तरह नहीं बांटा जा सकता। लेकिन हमारे पास और कोई चारा नहीं था। सवर्ण छात्रों की ओर से सुरक्षा मांगी गई थी। उनके अभिभावकों ने भी बच्चों को सुरक्षा देने की बात कही थी। अब 24 घंटे मॉनिटरिंग कैसे होगी। उन्हें परेशान किया जा रहा था, इसलिए हमने मीटिंग कर उनके हित के लिए हॉस्टल बदलने का निर्णय लिया। विवि के वीसी एनएम वर्मा का तर्क था कि विवि प्रशासन रोज लड़ाई नहीं लड़ सकता है।

इस घटनाक्रम में कई कोण हैं। पहली बात तो यह कि हॉस्टल के कमरों में इतना पूजा-पाठ करने या करते दिखने के क्या मायने हैं? क्या सवर्ण छात्र अपनी धार्मिक आस्थाओं का जानबूझ कर सार्वजनिक प्रदर्शन कर दलितों को चिढ़ाना चाहते थे? या वे इतने ज्यादा सदाचारी हैं कि पूजा-पाठ के बगैर उनका पत्ता नहीं हिलता? हॉस्टल में रहने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण उनके लिए अपने धार्मिक कर्मकांड हैं? उधर दलित छात्रों का यह कहना कि यह दलित छात्रों का हॉस्टल है, यहां कोई भी हिंदू कर्मकांड नहीं हो सकता, वास्तव में प्रतिशोध और नफरत का नतीजा है। यदि कुछ छात्र अपने कमरों में कुछ देवी-देवताओं की तस्वीर लगाकर पूजा-पाठ करते भी होंगे, तो इससे बाकी छात्रों को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? हरेक को अपने धर्म, पंथ और उसकी परंपराओं का पालन करने का हक है। और फिर जो वर्ग हर स्तर पर समानता की लड़ाई लड़ रहा है, वह धाॢमक आधार पर छात्रों के बीच विभाजन रेखा क्यों देखना चाहता है? क्या यह स्वयं को अ-हिंदू बताने की कोशिश है अथवा यह रेखांकित करने की चाल है कि जब आप हमें हिंदू ही नहीं मानते, तो हमारे इलाके में हिंदू कर्मकांड भी क्यों होने दें?

विडंबना यह है कि अब शिक्षण संस्थानों में छात्रों की समस्याओं और बेहतर शिक्षण सुविधाओं को लेकर आंदोलन और लड़ाइयां कम होती हैं। जो हो रहा है, वह जातीय अस्मिता के प्रदर्शन अथवा उसके दमन के रूप में हो रहा है। पिछले साल इलाहाबाद विवि के छात्रों ने इस बात के विरोध में आंदोलन किया था कि विवि प्रशासन छात्रों को सवर्ण, पिछड़ा और दलितों के खांचे में बांटना चाहता है। इसी आधार पर उन्हें रूम अलॉट किए जा रहे हैं। जबकि हॉस्टल की बुनियादी समस्याओं को हल करने में किसी की रुचि नहीं है।

सवाल कई हैं। मसलन छात्र हॉस्टलों में पढऩे के लिए जा रहे हैं या फिर मंदिरों की तरह पूजा-पाठ के कर्मकांड को पूरा करने के लिए जा रहे हैं? जहां अध्ययन चिंतन-मनन ही प्राथमिकता होनी चाहिए, वहां धाॢमक कर्मकांडों के प्रदर्शन के दुराग्रह के पीछे असली मानसिकता क्या है? उधर जो लोग इसे रोक रहे हैं या खारिज कर रहे हैं, उनका उद्देश्य केवल अंधा सवर्ण विरोध और ‘हिंदू’ की परिभाषा के तहत आने वाले हर कार्य व्यापार को खारिज करना है या फिर वे शिक्षित होकर समाज के उस वर्ग की बराबरी करना चाहते हैं, जिन्हें अगड़ा कहा जाता है। जो टकराव लखनऊ विवि के हॉस्टल में शुरू हुआ, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हिंदू समाज गैर दलित और दलित में दो फांक हो चुका है। दोनों के बीच समरसता अथवा समन्वय के धागे भी तार-तार होते जा रहे हैं, जिन्हें केवल चंद नेताओं की जय-जयकार और सतही दलित प्रेम के पैबंदों से ढंकने की कोशिश की जा रही है।

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