हौसले को सलाम

8 मार्च को पूरी दुनिया में महिला दिवस की धूम मची। देश-दुनिया के हर गली-मोहल्ले में महिला दिवस मनाया गया। लेकिन क्या सिर्फ एक दिन ‘महिला दिवस’ मनाने भर से ही महिलाओं का सम्मान हो जाएगा? दरअसल, हम उस समाज में रह रहे हैं, जहां बचपन से ही घर के कामकाज लड़कियों से करवाए जाते हैं। उन्हें खेलने के लिए बंदूक या गेंद नहीं, बल्कि गुडिय़ा दी जाती है। सिर्फ इतना ही नहीं, ‘नसबंदी’ की जिम्मेदारी अथवा दबाव भी महिलाओं पर ही डाला जाता है। पूरी दुनिया में महिलाओं के योगदान और उपलब्धि को दबाने में पितृसत्तात्मक समाज कोई कसर नहीं छोड़ता। हालांकि इसके बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि महिलाओं ने एक ऐसा मुकाम हासिल किया है, जिसे मिटाया नहीं जा सकता। आज हर जगह महिलाओं की मौजूदगी इस बात को बखूबी बयां करती है। इतना ही नहीं ऐसी महिलाओं की संख्या भी कम नहीं है, जिन्होंने कैंसर और एसिड अटैक जैसी जीवन को बर्बाद कर देने वाली घटनाओं के बावजूद न सिर्फ एक मुकाम हासिल किया, बल्कि व सब कुछ हासिल किया जिसकी वह हकदार थीं

 

प्राचीन काल से वर्तमान तक स्त्री देह को सिर्फ भोग-बिलास की वस्तु माना जाता है। साथ ही महिलाओं को हास्य के केंद्र में भी रखा जाता है। स्थिति यह है कि पुरुषों के आंतरिक वस्त्रों के विज्ञापन के लिए भी महिलाओं का ही प्रयोग किया जाता है। व्यंग्य आधारित अधिकांश कार्टून भी महिलाओं पर ही केंद्रित होते हैं, जिसमें स्वर्ग और नरक के फर्क को बताते हुए यहां तक कह दिया जाता है कि ‘स्वर्ग वहीं हैं जहां महिलाएं नहीं हैं।’ देश के इतिहास में भी ‘नारी को नरक के द्वार’ के रूप में अंकित किया गया है, तो कहीं ‘नारी को ताडऩ का अधिकारी’ बताया गया है। हालांकि इतना सब कुछ होने के बावजूद महिलाएं नए आसमान को छू रही हैं। ऐसी महिलाओं की कमी नहीं है, जिन्होंने अपनी मजबूत इच्छाशक्ति की बदौलत वह मुकाम हासिल कर लिया है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन आज हम आपको कुछ ऐसी महिलाओं से रूबरू कराते हैं, जिन्होंने कैंसर जैसी गंभीर बीमारी और एसिड अटैक (तेजाब फेंकने) जैसी सामाजिक बुराई से लड़ते हुए नई इबारत लिखी।

 

सबसे पहले बात करते हैं वैष्णवी पूवेंद्रन पिल्लै की, जिन्हें उनके करीबी प्यार से नवी बुलाते हैं। इंस्टाग्राम पर भी इनका नाम नवी इंद्रन पिल्लै है। नवी का परिवार मूल रूप से तमिलनाडु से है, लेकिन वह कई पीढिय़ों से मलेशिया में रह रहे हैं। नवी भी इस वक्त मलेशिया में ही हैं। नवी कैंसर सर्वाइवर हैं और उन्होंने अपनी अब तक दो बार कैंसर को मात दी है। एक बार स्तन कैंसर और दूसरी बार लिवर-बैकबोन कैंसर को। उनके सिर के पूरे बाल जा चुके हैं। दोनों स्तन पहले ही हटाए जा चुके हैं। किसी भी महिला को पूरी तरह से टूटने के लिए इतना होना काफी है। लेकिन नवी के साथ ऐसा नहीं है। नवी ने कुछ ऐसा किया जिससे वह इंटरनेट पर तो छा ही गईं, कैंसर से जूझ रहे न जाने कितने लोगों के लिए हौसले की वजह बन गईं।

 

दरअसल, नवी ने दुल्हन के लिबास में सजकर बाकायदा ब्राइडल फोटोशूट कराया। इस ब्राइडल फोटोशूट की सबसे प्यारी बात यह है कि उन्होंने किसी भी फोटो में अपने बिना बालों वाले सिर को ढंकने की जरा भी कोशिश नहीं की। तस्वीरों में या तो उनका सिर बिल्कुल खुला है या फिर उस पर एक झीनी सी ओढऩी है। हर फोटो में नवी मुस्कुराती हुई दिख रही हैं और उनके चेहरे पर गम की हल्की-सी भी लकीर नहीं दिखती। तस्वीरों में उनके चेहरे पर या तो खिलखिलाती हंसी है या भीनी सी मुस्कुराहट या फिर अपने सपनों को अंजाम देने का गर्व। उन्होंने अपनी कई तस्वीरें इंस्टाग्राम पर पोस्ट की हैं, साथ ही ऐसी बातें लिखीं हैं जो किसी को भी संघर्ष का दामन थामे रखने का हौसला देंगी। नवी ने इंस्टाग्राम पर एक प्यारी सी चिट्ठी लिखी है, जिसका एक अंश कुछ इस तरह है।

 

नवी लिखती हैं कि कैंसर का इलाज हमारी जिंदगियों में तमाम तरह की बंदिशें लगा देता है। यह हमसे हमारी खूबसूरती लूट लेता है, हमारा आत्मविश्वास छीन लेता है। जब हम सब छोटी बच्चियां होती हैं, अपने शादी वाले दिन के बारे में सोचते हैं, सोचते हैं कि हम दुल्हन बनकर कैसे लगेंगे। लेकिन कैंसर हमें अपने सपने पूरे करने से रोकने लगता है। बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं जो कैंसर की वजह से अपनी शादी या तो टाल देती हैं या कैंसल कर देती हैं। एक कैंसर सर्वाइवर के तौर पर मैंने हमेशा उस शख्स से शादी करने का सपना देखा जिससे मैं प्यार करती हूं। मैंने दुल्हन जैसी दिखने का सपना देखा, दुल्हन जैसा महसूस करने का सपना देखा। कैंसर के इलाज के दौरान (कीमोथेरेपी वगैरह) अपने बालों को खोना मेरे लिए सबसे मुश्किल चीज रही है। मुझे ऐसा लगा कि मैं इतनी खूबसूरत नहीं हूं कि कोई मुझसे प्यार करे। मुझे लगा, मैं कभी भी दुल्हन जैसी दिखने या दुल्हन जैसा महसूस करने के लायक खूबसूरती हासिल नहीं कर पाऊंगी। बालों को हम औरतों के लिए ‘ताज’ जैसा माना जाता है और इस ताज का आपसे छीना जाना आपको बर्बाद कर देता है। लेकिन मेरे पास जो कुछ था, मैंने उसे स्वीकार करने और उसकी तारीफ करने का फैसला लिया। मैंने आने वाले वक्त का स्वागत करने का फैसला किया। तो लीजिए, हाजिर है- बोल्ड इंडियन ब्राइड (बहादुर भारतीय दुल्हन)।

 

दरअसल, नवी 28 साल की भारतीय लड़की हैं, जो अपने परिवार के साथ मलेशिया में रहती है। इंजीनियरिंग तक पढ़ी नवी के परिवार में माता-पिता और बड़ी बहन हैं। नवी को भरतनाट्यम डांस और कर्नाटक संगीत के अलावा खाना बनाने एवं घूमने-फिरने और दोस्त बनाने का शौक है। वर्ष 2013 में जब नवी को अपने स्तन कैंसर का पता चला, तो वह सदमे में आ गईं। हालांकि उनके मन में भरोसा था कि वह इससे जीत जाएंगी। और उनका भरोसा रंग भी लाया। लेकिन 2018 में उनका कैंसर फिर लौट आया। इस बार स्तन कैंसर उनकी रीढ़ की हड्डी और लिवर में फैल चुका था। इससे नवी बेहद डर गईं और उन्हें लगा कि या तो जिंदा रहने के लिए पूरी जान लगा दें या फिर मौत के सामने आत्मसमर्पण कर दें। वह डिप्रेशन की शिकार हो गईं। कैंसर और डिप्रेशन को लेकर मलेशियाई समाज में भी शॄमदगी और हिचकिचाहट का माहौल है। इसलिए माता-पिता ने नवी को किसी से अपने कैंसर और डिप्रेशन बारे में बात करने से मना कर दिया। माता-पिता को लगता था कि अगर लोगों को नवी की बीमारियों के बारे में पता चलेगा, तो वे दूर हो जाएंगे, कोई लड़का उसे डेट नहीं करेगा। नवी की शादी के लिए अच्छा रिश्ता नहीं मिलेगा। बावजूद इसके नवी ने बगावत की और इंस्टाग्राम पर अपने कैंसर के बारे में पोस्ट करने लगीं। इसके बाद लोगों से बेहद सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली और नवी का हौसला बढऩे लगा।

 

यह सब चल ही रहा था और एक दिन नवी नेटफ्लिक्स पर फिल्म देख रही थीं कि अचानक उनके मन में ख्याल आया कि क्यों न दुल्हन बनकर ब्राइडल फोटोशूट कराया जाए। वह नहीं जानती थीं कि कभी उन्हें प्यार मिलेगा या नहीं, शादी होगी या नहीं…लेकिन दुल्हन बनने के अपने सपने को नवी पूरा करना चाहती थीं। इसके तुरंत बाद नवी ने फोटोग्राफरों और मेकअप आॢटस्टों से इस बारे में बात की, जिन्हें आइडिया बहुत पसंद आया। जब नवी फोटोशूट करा रही थीं, तब उन्हें अंदाजा नहीं था कि यह इस कदर वायरल हो जाएगा। फोटोशूट इंस्टाग्राम पर आने के बाद नवी को हजारों मैसेज आए, जिनमें से बहुत से मैसेज कैंसर से जूझ रही लड़कियों के थे। यह सब नवी को बहुत खुशी देता है। अगर बात खूबसूरती की करें, तो सच्चाई यह है कि असलियत की ठोकरें लगने पर ‘खूबसूरती देखने वालों की आंखों में बसती है’ वाली कहावत कई बार किताबी और बेमानी लगती है। लेकिन यह पूरी तरह से झूठ भी नहीं है। अगर आप खूबसूरत महसूस करेंगे, तो खूबसूरत ही लगेंगे। खूबसूरती सिर्फ खुद को प्यार करने और खुद पर भरोसा करने का नाम है।

तेजाब से नहीं झुलसा हौसला : उनकी आंखों पर काला चश्मा है। एसिड अटैक के बाद उनकी आंखें खराब हो गई थीं और चार महीने पहले ही उनका ऑपरेशन हुआ है। ओडिशा के जगतसिंहपुर की रानी का असली नाम प्रमोदिनी राउल है, जिनहें घर के लोग और दोस्त प्यार से रानी कहते हैं।

 

डांस करना रानी का शौक था और जुनून भी। 14-15 साल की रानी किसी आम किशोरी की तरह अपने सपनों की दुनिया में जी रही थी कि एक दिन अचानक सबकुछ बदल गया। एक अनचाहे शख्स से शादी से इनकार करने पर उसने उत्पीडऩ शुरू कर दिया। एक दिन रानी अपने चचेरे भाई के साथ साइकिल से स्कूल से लौट रही थीं। तभी उस लड़के ने पीछे से आकर उन पर तेजाब फेंक दिया। गांव के लोग रानी को हॉस्पिटल ले गए, जहां वह नौ महीने तक आईसीयू में रहीं। इस दौरान रानी जिस तकलीफ से होकर गुजरीं, उसे याद करके वह आज भी सिहर उठती हैं। उपचार के दौरान रानी को एक बड़े से बाथटब में बैठाया जाता था, जो डेटॉल जैसी तीखी महक वाली तरल दवाइयों से भरा होता था। उसमें ड्रेसिंग होती थी, यानी रानी की स्किन उधेड़ी जाती थी। इस दौरान वह  दर्द से बदहवास सी हो जाती थीं। उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी और वह चल भी नहीं पा रही थीं। उनका चेहरा और एक हाथ पूरी तरह जल गया था। बाल उड़ गए थे और पूरी पीठ भी जल गई थी। रानी का वजन 60 से घटकर 28 किलो हो गया था, क्योंकि शरीर में सिर्फ हड्डियां बची थीं। चार-पांच नर्सें रानी को पकड़कर रखती थीं और डॉक्टर उनसे माफी मांगते हुए ड्रेसिंग करते थे। नौ महीने के बाद पैसों और कुछ दूसरी परेशानियों की वजह से रानी घर वापस आ गईं। इसके बाद वह चार साल तक बिस्तर पर पड़ी रहीं। उनके घाव सड़ गए थे, उनसे पस आने लगा था। इस मुश्किल घड़ी में रानी की मां हमेशा उनके साथ रहकर उनकी देखभाल करती रहीं। जब घर में रहना मुश्किल हो गया, तो उन्हें फिर अस्पताल ले जाया गया, जहां कुछ नर्सों से उनकी दोस्ती हो गई। एक दिन हॉस्पिटल की नर्स किसी को रानी से मिलवाने के लिए लेकर आई। वह शख्स थे सरोज साहू। सरोज को रानी से कुछ ऐसी हमदर्दी हुई कि उन्होंने दो महीने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी और रात-दिन उनकी देखभाल करने लगे। सरोज की मेहनत रंग लाई। आखिर चार महीने के भीतर रानी बिना किसी सहारे के खड़ी हुईं और फिर धीरे-धीरे चलना भी शुरू किया। जुलाई 2017 में रानी ने आंखों का ऑपरेशन चेन्नई के एक अस्पताल से कराया। ऑपरेशन सफल रहा और रानी को कुछ धुंधली आकृतियां दिखाई देने लगी थीं। इससे पहले उन्हें बिल्कुल नहीं दिखाई देता था। ऑपरेशन के बाद आगरा जाने के लिए रानी सरोज के साथ प्लेन में बैठीं। फ्लाइट के टेकऑफ करने से पहले ही रानी को अचानक उन्हें रंग दिखाई देने लगे और नजर भी धीरे-धीरे साफ होने लगी। इस पर रानी खुशी से चिल्लाईं और सरोज के गले लग गईं। पूरा माहौल एकदम फिल्मी सीन जैसा था। फ्लाइट के अन्य यात्री रानी से गले मिले और बधाई दी। फिलहाल रानी नोएडा में शीरोज के पुनर्वास केंद्र का काम संभाल रही हैं और सरोज ओडिशा में काम रहे हैं। दोनों जल्द ही शादी के बंधन में बंधने वाले हैं।

 

मिला सपनों का राजकुमार : यह कहानी है तेजाब पीडि़त एक युवती की। 2012 में एक सनकी की हरकत ने उसकी जिंदगी की गाड़ी को पटरी से उतार दिया, लेकिन एक ‘रॉन्ग नंबर’ ने उसको न सिर्फ सपनों के राजकुमार से मिला दिया, बल्कि उससे शादी के बंधन में भी बांध दिया। ललिता बंसी को 2012 में तेजाब के हमले का निशाना बनने के बाद 17 ऑपरेशन कराने पड़े। जिंदगी बेरंग लगने लगी थी, तभी गलती से एक दिन उससे 27 साल के राहुल कुमार उर्फ रवि का नंबर लग गया और उसे उससे प्यार हो गया। इसके बाद दोनों ने शादी कर ली। ललिता जहां ठाणे के कलवा इलाके की रहने वाली हैं, वहीं रवि मुंबई के उपनगरीय मलाड में रहते हैं। 2012 में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में ललिता के चाचा के गांव में उनके एक रिश्तेदार ने किसी बात पर झगड़ा होने के बाद उस पर तेजाब डाल दिया था। ललिता के इलाज का खर्च बॉलीवुड अभिनेता विवेक ओबरॉय ने भी उठाया है।

 

दर्दनाक कहानी : वह 15 साल की थी और बड़ी होकर एक कामयाब सिंगर बनना चाहती थी। मगर सिर्फ एक ‘ना’ ने उसके सारे सपनों को जला कर रख दिया। उसके ऊपर ऐसा हमला हुआ, जो जिस्म के साथ-साथ आत्मा भी जला देता है। इस हमले के जख्म से रिसने वाले मवाद तो एक समय के बाद बंद हो जाते हैं, लेकिन इसका दर्द पूरी जिंदगी रिसता रहता है। एसिड अटैक पीडि़ता लक्ष्मी की भी यही कहानी है। लक्ष्मी का चेहरा दरिंदों ने तेजाब से बिगाड़ तो दिया, लेकिन उसके हौसलों का बाल तक बांका नहीं कर सके। आज लक्ष्मी देश में एसिड अटैक की शिकार लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं। उस दर्दनाक सुबह की भयावह कहानी बताते हुए लक्ष्मी कहती हैं कि बात 2005 की है, जब उसकी उम्र 15 साल थी और वह 7वीं कक्षा में पढ़ती थी। उस समय 32 वर्ष के एक व्यक्ति ने उसे शादी के लिए प्रपोज किया। लक्ष्मी ने इनकार कर दिया। जिसका परिणाम यह रहा कि 22 अप्रैल 2005 की सुबह करीब 11 बजे दिल्ली की खान मार्केट में उस शख्स ने लक्ष्मी पर तेजाब डाल दिया। लक्ष्मी 2 महीने से ज्यादा समय तक राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती रहीं। इसके बाद वह लंबे समय तक पुरुषों से नफरत करती रही। इसी बीच लक्ष्मी के जीवन में कानपुर के रहने वाले आलोक दीक्षित का प्रवेश हुआ और फिर उन्हें एक-दूसरे से प्यार हो गया। अब दोनों दिल्ली के पास एक इलाके में रहते हैं और अपने छोटे से दफ्तर से मिल कर तेजाब हमलों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं।

 

तेजाब के जख्मों पर प्यार का मरहम : अप्रैल 2003 में एसिड अटैक से सोनाली का चेहरा बुरी तरह झुलस गया था। आंखों की रोशनी चली गई थी। सोनाली की उम्र तब सिर्फ 17 साल की थी। यूं तो कई प्रेम कहानियां देखी, सुनी जाती हैं, लेकिन सोनाली की प्रेम कहानी कुछ अलग सी है। ओडिशा में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की नौकरी करने वाले चितरंजन तिवारी और सोनाली ने कुछ समय पहले ही कोर्ट में शादी की है। एक क्राइम टीवी शो में चितरंजन को सोनाली पर हुए एसिड अटैक के बारे में पता चला और उन्होंने सोनाली से संपर्क किया। दोनों की सोशल मीडिया के जरिए जान-पहचान हुई। एक दिन चितरंजन ने सोनाली को फोन किया और बातचीत शुरू हुई। फिर वह अपनी तनख्वाह से सोनाली का इलाज कराने लगे। एक दिन चितरंजन ने सोनाली को दिल की बात बताई कि वह उनसे शादी करना चाहते हैं। काफी सोच-विचार करने के बाद सोनाली ने हां कर दी। सोनाली को लंबे संघर्ष के बाद बोकारो में सरकारी महकमे में क्लर्क की नौकरी मिल गई है। अब तक सोनाली मुखर्जी की 34 सर्जरी हो चुकी है। अभी भी नौ सर्जरी होनी बाकी हैं।

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