100 साल में चले अढ़ाई कोस, जानिए महिलाओं को उनका हक न मिलने के पीछे क्या हैं कारण

मधु निगम

इस बार जब 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अपने 100वें वर्ष में प्रवेश कर गया है तो इसकी प्रासंगिकता पर विशेष तौर पर विचार करना जरूरी हो जाता है। क्या आज भी समाज में महिलाओं को वह हक मिल पाया है, जिसकी वह हकदार हैं? यह सवाल हर किसी के जेहन में उठना लाजिमी है, लेकिन जवाब देना कोई नहीं चाहता। 8 मार्च को केवल फर्ज अदायगी कर महिला दिवस मना लेना शायद यही रीति बनकर रह गई है। वरना अगर विश्व में महिलाओं की वर्तमान सामाजिक स्थिति के बारे में बात की जाए तो इससे सम्बन्धित एक रिपोर्ट कहती है कि 2017 में लैंगिक असमानता के मामले में भारत दुनिया के 144 देशों की सूची में 108वें स्थान पर है, जबकि पिछले साल यह 87वें स्थान पर था। इससे एक बात तो साफ है कि महिलाओं की स्थिति आज भी जस की तस है, खासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में।

हालांकि सिर्फ भारत में ही महिलाएं असमानता की शिकार हों ऐसा भी नहीं है। समूचे विश्व में महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन जैसे विकसित देश की कई बड़ी कंपनियों में भी महिलाओं को उसी काम के लिए पुरुषों के मुकाबले काफी कम वेतन दिया जाता है।

कोई नहीं सराहता महिलाओं का योगदान : महिलाओं को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग भी महिलाओं के उस योगदान की सराहना भूलकर भी नहीं करते जो एक महिला गृहणी, मां अथवा पत्नी के रूप निभाती है। अगर उस काम की बात की जाए जिसका कोई वेतन नहीं होता, जैसा हाल ही में अपने उत्तर से मिस वर्ल्ड का खिताब जीतने वाली भारत की मानुषी छिल्लर ने कहा था, और जिसे एक मैनेजिंग कंसल्ट कम्पनी की रिपोर्ट ने काफी हद तक सिद्ध भी किया। इसके मुताबिक, यदि भारतीय महिलाओं को उनके अनपेड वर्क (वो काम जो वो एक गृहणी, एक मां, एक पत्नी के रूप में करती हैं) के पैसे दिए जाएं तो यह 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर के बराबर होगा। इस मामले में समूचे विश्व की महिलाओं की बात की जाए तो यूनाइटेड नेशन (यूएन) की रिपोर्ट के अनुसार उन्हें 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर अर्थात पूरी दुनिया की जीडीपी का 13 फीसदी हिस्सा देना होगा।

सबला है नारी : भारत की अनेकों नारियों ने समय-समय पर यह सिद्ध किया है कि वह अबला नहीं सबला है। केवल जननी नहीं ज्वाला है। वो नाम जो कल झांसी की रानी, इंदिरा गांधी या कल्पना चावला था, वही आज देश की पहली रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, इंटर सर्विस गार्ड ऑफ ऑनर का नेतृत्व करने वाली पहली भारतीय वायुसेना की विंग कमांडर पूजा ठाकुर या फिर वायुसेना में फाइटर प्लेन मिग 21 उड़ाने वाली अवनी चतुर्वेदी का है। ऐसे में हमें अपना नजरिया बदलने की जरूरत है कि महिला अबला है और वह केवल चारदीवारी के भीतर ही रह सकती है।

पुरुषों को बदलनी होगी सोच : हर साल महिला दिवस पर महिलाओं की लैंगिक समानता, सम्मान, उनके संवैधानिक अधिकारों की बात की जाती है लेकिन 1०० सालों बाद भी धरातल पर इनका खोखलापन साफ दिखाई देता है। ऐसे में इस बात को स्वीकार करना जरूरी हो जाता है कि महिला अधिकारों की बात पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के प्रति पुरुषों की सोच में बदलाव लाए बिना संभव नहीं है। इसलिए महिला दिवस पर पुरुषों से बात हो, ताकि उनका महिलाओं के प्रति उनके नजरिए में बदलाव हो। जिस प्रकार कहा जाता है कि एक लड़की को शिक्षित करने से पूरा परिवार शिक्षित होता है, उसी प्रकार एक बालक को महिलाओं के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता की शिक्षा देने से उन पुरुषों का और उस समाज का निर्माण होगा जो स्त्री के प्रति संवेदनशील होगा। ऐसे में सिर्फ एक दिन महिला दिवस मना कर कर्तव्य की इतिश्री कर लेने से अच्छा है कि अपने घर का माहौल ही ऐसा बनाया जाए कि सभी के दिल में अपनी मां, बहन, पत्नी या बेटी के लिए सम्मान और प्यार की भावना रहे।

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