19 साल बाद मिला जिगर का टुकड़ा, बेटे के इंतजार में पथरा गई थीं बूढ़े मां-बाप की आंखें

लखनऊ: लॉकडाउन के कारण जश्न मनाना तो संभव नहीं लेकिन घर का माहौल किसी उत्सव से कम नहीं। ऊपर वाले ने देर से ही सही लेकिन प्रार्थना सुन ली। 19 साल की तपस्या का फल दिया, जिसकी बदौलत आज हमारा बेटा हमारे पास है। कर्नलगंज निवासी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रिटायर्ड कर्मचारी अवधेश मिश्रा की यह बातें उनकी खुशी को बयां करने के लिए काफी हैं। भगवान के साथ ही वह हर उस चीज के शुक्रगुजार हैं, जिसने उन्हें उनके जिगर के टुकड़े से मिलाने में मदद की।

चैथम लाइन स्थित राम प्रिया रोड पर रहने वाले अवधेश इलाहाबाद विश्वविद्यालय में लाइब्रेरियन के पद से रिटायर हैं। 19 साल पहले बिछुड़े बेटे के मिलने के बाद से उनकी खुशी का ठिकाना नहीं है। उन्होंने बताया, आकाश 6 साल का था, जब वह एक दिन घर से खेलने के लिए निकला और फिर उसका कुछ पता नहीं चला। रात भर खोजबीन चली लेकिन, उसकी कोई खबर नहीं मिली। अगले दिन थाने में गुमशुदगी भी दर्ज कराई पर कोई फायदा नहीं हुआ। तलाश करते करते हफ्ते, महीने और फिर साल बीत गए।

हर बीते साल के साथ बेटे की मिलने की उम्मीद भी कम होती गई। एक ऐसा वक्त आया जब इसे नियति का खेल मानकर बेटे को तलाशने की कोशिशें भी बंद कर दीं। लेकिन एक चीज, जो इन 19 सालों में कभी रुकी नहीं, वह थी ईश्वर से प्रार्थना। शायद इतने सालों की कठिन तपस्या की थी कि ऊपर वाले का भी दिल पिघल गया। और आखिरकार बेटा इतने सालों बाद हमारे पास आ गया।

अवधेश बताते हैं, उनके पड़ोस में रहने वाले विंध्यवासिनी तिवारी मंफोर्डगंज निवासी एक इंजीनियर के साथ काम करते हैं। इंजीनियर का मकान उसी जगह है, जहां उनके बेटे आकाश को अपना बेटा होने का दावा करने वाले विनोद अग्रहरि का परिवार रहता है। किस्मत का खेल देखिए, विंध्यवासिनी का वहां आते जाते बेटे आकाश से संपर्क हो गया। एक दिन डांट डपट के बाद वह दिनभर भूखा रहा। मिलने पर विंध्यवासिनी ने कारण पूछा तो उसने कहा कि असली मां-बाप होते तो शायद कभी भूखा ना रहने देते।

चर्चा आगे बढ़ी तो पता चला कि छह साल की उम्र में ही वह अपने मां-बाप से बिछड़ गया था। घर का पता तो नहीं बता पाया लेकिन जिस तरह की लोकेशन बताई, वह उनके मकान से बिल्कुल मेल खाती थी। विंध्यवासिनी के बताने पर एक दिन आकाश खुद घर पहुंच गया। जिसे देखकर एकबारगी तो उन्हं अपनी आंखों पर भी विश्वास नहीं हुआ। लेकिन फिर कपड़े, चोट के निशान और बचपन की तस्वीरें आदि दिखाने पर यकीन हो गया कि वह हमारा ही बेटा है।

एक ही इलाके में रहते हुए 19 साल तक बेटे से परिवार का ना मिल पाना भी बेहद चौंकाने वाला है। इस पर अवधेश ने बताया कि इन 19 सालों में ज्यादातर वक्त उनके बेटे को बाहर ही रखा गया। शुरुआत के कुछ सालों में उसे सुल्तानपुर भेज दिया गया था। इसके बाद शहर लाया गया लेकिन आठवीं तक पढ़ाई कराने के बाद ही उसे काम के सिलसिले में बाहर के शहरों में भेजा जाने लगा। उनका दावा है कि यह बातें खुद बेटे आकाश ने उन्हें बताई हैं। वह यह भी कहते हैं कि आकाश उनके तीन बेटों में सबसे छोटा है। दो बड़े बेटों में एक दिल्ली स्थित प्राइवेट कंपनी जबकि, दूसरा हाईकोर्ट में अधिवक्ता है। अगर आकाश उनके पास होता, तो क्या ऐसा हो सकता था कि महज आठवीं के बाद उसकी पढ़ाई बंद करा दी जाती।

परिवार को बेटे की मिलने की खुशी तो है लेकिन 19 साल तक उसके विछोह का दर्द भी है। पिता अवधेश कहते हैं, जो भी इसके लिए दोषी हो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। पुलिस इस मामले की पूरी जांच करे। 19 सालों तक उनके जिगर के टुकड़े को अपना बेटा बता कर पास रखने वालों की पूरी जांच हो। उनसे पूछा जाए कि किसी दूसरे व्यक्ति के बच्चे को उन्होंने अपने पास किसकी अनुमति से रखा और इसकी जानकारी पुलिस प्रशासन को क्यों नहीं दी।

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