2047 के लिए आज जनादेश

उमेश त्रिवेदी

भारतीय जनता पार्टी के ताजा संकल्प-पत्र में यह जानने के लिए गहरी डुबकी लगाने की जरूरत नहीं है कि 2014 के भाजपाई घोषणा पत्र में ‘सबका साथ, सबका विकास’ अथवा ‘अच्छे दिन आएंगे’ जैसे रंग-बिरंगे लुभावने सपने भाजपा की राजनीतिक जरूरत का हिस्सा नहीं रहे हैं। ‘सबका साथ, सबका विकास’ की परिकल्पना को भाजपा ने उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के वक्त ही तिलांजलि दे दी थी और ‘अच्छे दिनों’ की बातें नोटबंदी और जीएसटी की चीत्कारों में गुम हो चुकी हैं। संकल्प-पत्र से जाहिर हो रहा है कि लोकसभा-2019 के चुनाव में भाजपा की रथ-यात्रा कट्टरता के काले कोलतार से निॢमत सांप्रदायिकता और संकीर्णता की काली सड़कों से गुजरने वाली है। भाजपा के सारे संकल्प राष्ट्रवाद की अमूर्त और अदृश्य अवधारणाओं पर सवार होकर आतंकवाद और उग्रवाद की पगडंडियों से गुजरते महसूस होते हैं।

8 अप्रैल को जारी भाजपा के संकल्प-पत्र के एक सप्ताह पहले कांग्रेस अपना घोषणा-पत्र जारी कर चुकी है। पर्यवेक्षक दोनों घोषणा-पत्रों के मुद्दों को तौल रहे हैं। भाजपा का संकल्प-पत्र जारी होने के बाद कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों ने मोदी-सरकार की उपलब्धियों को कठघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति से साफ-साफ उजागर है कि भाजपा ऐसे हर मुद्दे को अनदेखा और अनसुना करेगी, जो विकास के नाम पर मोदी-सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करते हैं। संकल्प-पत्र के मुख-पत्र पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बड़ा सा चित्र कह रहा है कि वह लोकसभा चुनाव का केंद्र-बिंदु हैं, लेकिन उनके रिपोर्ट-कार्ड के बारे में भाजपा किसी भी सवाल का जवाब देने को तैयार नहीं है। कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में जीएसटी और नोटबंदी जैसे मुद्दों पर भाजपा को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि वह जीएसटी में बदलाव करेगी और नोटबंदी की हकीकत को सामने लाएगी। इसके विपरीत भाजपा ने अपने संकल्प-पत्र में मोदी-सरकार के इन विवादास्पद फैसलों को दरगुजर कर दिया है।

भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में विकास के नाम पर राष्ट्रपति के अभिभाषण को आंकड़ों का नया जामा पहनाकर लोगों को सामने खड़ा कर दिया है। इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास और मानवीय समस्याओं का निदान के संबंध में आंकड़ों के जरिए सनसनी पैदा करने के राजनीतिक-उपक्रम नए नहीं हैं। लेकिन रोजगार के नाम पर युवाओं की उम्मीदों पर कुठाराघात राजनीतिक मुद्दा बनता है, जिसका जवाब मोदी-सरकार को देना होगा। आतंकवाद और उग्रवाद के मुद्दों पर राजनीति करना भाजपा का प्रिय शगल रहा है। लोकसभा-2019 के लिए जारी घोषणा-पत्र में भी भाजपा की सारी रणनीति आतंकवाद के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है। संकल्प-पत्र में किसानों, युवाओं, बुजुर्गों, महिलाओं, व्यापारियों और कर्मचारियों के लिए कल्याणकारी योजनाओं का जोर-शोर से उल्लेख है, अरबों-खरबों रुपए की नगाड़ेबाजी है, लेकिन संकल्पों की भाव-भूमि राजनीति के उन ज्वलनशील मुद्दों को ज्यादा एड्रेस करती है, जो बरसों से उसके कंधों पर सवार हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भले ही कहें कि संकल्प-पत्र की भाव-भूमि का त्रिकोण राष्ट्रवाद, अंत्योदय और सुशासन के तीन बिंदुओं पर टिका है। लेकिन उनकी राजनीति के मूल में कट्टर राष्ट्रवाद हावी है, जो राजनीतिक-ध्रुवीकरण की राहों को आसान करता है। भाजपा के संकल्प-पत्र में हर घोषणा-पत्र की तरह तीस साल पुराना राम-मंदिर भी है, जिसके सहारे वह हिंदुत्व में उन्माद और उत्तेजना को घोलती रही है। उसके साथ ही कश्मीर में धारा 370 और 35(ए) को समाप्त करने का वह आह्वान है, जो सांप्रदायिकता को उत्प्रेरित करता है। कॉमन सिविल कोड की स्थापना वर्षों से भाजपा के घोषणा-पत्रों और राजनीति का हिस्सा रहे हैं, जिसकी चिंगारियों से वह हिन्दू-मुस्लिमों के सेंटीमेंट्स को सुलगाने का काम करते रहे हैं। कश्मीरी पंडितों की वापसी का तड़का लगाकर भाजपा ने हिंदू-कार्ड खेलने का उपक्रम किया है। सबरीमाला के मुद्दे को आमजनों की आस्था और विश्वास से जोड़ कर केरल में जमीन तलाशने की जुगत भी संकल्प-पत्र में परिलक्षित हो रही है।

मोदी ने आम-जनों की बुनियादी समस्याओं के कर्कश और कठोर यथार्थ को डायल्यूट करने के लिए राष्ट्रवाद के प्रवाह का इस्तेमाल करने की कोशिश संकल्प-पत्र में की है। पिछले वादों के बारे में गफलत पैदा करके वो पांच साल, दस साल और पच्चीस साल बाद एक अनदेखे भारत में विकास का मायावी संसार रचना चाहते हैं। मोदी 2019 के मौजूदा भारत के दर्द को समेटने के बजाय 2047 में स्वतंत्रता की सौंवी वर्षगांठ पर भारत को महाशक्ति बनाने के लिए आज जनादेश मांग रहे हैं।

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