21 को ‘वीस एक’ पढ़ाने के पीछे यह कौन सी मानसिकता है?

इसे आप भाषा का सरलीकरण कहेंगे, भाषा का अंध अंगरेजीकरण या फिर उसके शब्दों के उच्चारण को सहज गम्य बनाने के नाम पर भाषा का भ्रष्टीकरण ? ऐसा एक निहायत अजीब मूर्खतापूर्ण प्रयोग भारतीय संस्कृति की आग्रही भाजपा द्वारा शासित महाराष्ट्र राज्य में हो रहा है। वहां प्राथमिक स्तर पर बाल भारती दूसरी की किताब में इस साल ‘अभिनव प्रयोग’ के तौर पर अंकों के उच्चारण की नई पद्धति लागू की गई है। इसके मुताबिक अब 21 को बच्चे इक्कीस ( मराठी में एकवीस) के बजाए ‘वीस एक’ ( हिंदी में बीस एक ) के रूप में पढ़ेंगे। यह बदलाव भी शिक्षाविदों (?) की सिफारिश पर किया गया है।

तर्क है कि गिनती ( मराठी में ‘उजळणी’ ) के उच्चारण में कई जोड़ाक्षर आने से बच्चे उनका उच्चारण सहजता से नहीं कर पाते। राज्य विधानसभा में जब इस ‘अभूतपूर्व प्रयोग’ पर विपक्ष ने हंगामा किया तो मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने पहले तो इस बदलाव का बचाव किया, लेकिन बवाल बढ़ने पर आश्वासन दिया कि विशेषज्ञों की एक समिति इस बदलाव की समीक्षा करेगी। अंकों के मराठी उच्चारण में इस गैर जरूरी परिवर्तन की साहित्य और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी कड़ी आलोचना हो रही है। सवाल उठ रहा है कि जब ऐसी मांग किसी भी स्तर पर नहीं उठी तो फिर अंकों की मराठी ( भारतीय ) उच्चारण पद्धति को बदलने के पीछे दिमाग किसका है और ऐसा करके वो क्या संदेश देना चाहते हैं ?

पहले पूरा मामला समझ लें। मराठी (और हिंदी में भी) 1 से 100 अंकों तक की गिनती के लिए अलग-अलग शब्द हैं। अंगरेजी में यही अंक ‘नंबर’ कहलाते हैं। लेकिन वहां 1 से 20 तक अंकों के लिए तो स्वतंत्र शब्द हैं, जैसे कि 12 के लिए ट्वेल्व। लेकिन 21 से 99 तक के लिए स्वतंत्र शब्दोच्चार नहीं है। ऐसे में 21 को ट्वेंटी वन या 99 को नाइंटी नाइन बोलना पड़ता है। इसका एक अर्थ यह है कि बेहद समृद्ध भाषा होने के बाद भी अंग्रेजी में 21 से 99 तक की गिनती के लिए स्वतंत्र शब्द नहीं हैं। लेकिन कुछ लोग इसे भाषा की कमी के बजाए अंकों के उच्चारण के सरलीकरण के रूप में देखते हैं। यानी ‘अठहत्तर’ जैसा कठिन (?) शब्द याद करने के बजाए बच्चे को ‘सेवंटी एट’ बोलना ज्यादा आसान है। यानी यहां शब्द समृद्धि के बजाए उच्चारण की सुविधा पर ज्यादा जोर है।

एक तर्क और भी है कि मराठी ( हिंदी में भी) अंकों के उच्चारण में कई जोड़ाक्षर हैं। जैसे ‘अठ्ठावीस’ ( हिंदी में अट्ठाइस) इसमें ‘ट’ और ‘ठ’ का जोड़ है। इसका बच्चों के लिए उच्चारण कठिन है, इसलिए उसे 28 को ‘बीस आठ’ बोलना चाहिए। बदलाव के पीछे एक और अजीब दलील है कि अंकों के जोड़ाक्षरयुक्त उच्चारण के कारण बच्चों में गणित पढ़ने के प्रति अरू‍चि बढ़ती जा रही है। इसी दलील का विस्तार यह है कि इस साल महाराष्ट्र में ग्यारहवी का रिजल्ट अपेक्षानुरूप नहीं रहा है, इसलिए कहा जा रहा है कि बच्चों को अंक उच्चारण की ऐसी नई पद्धति सिखाई जाए, जो अंगरेजी से प्रेरित हो। अब इन्हें कौन समझाए कि एस. रामानुजम, आर्यभट्ट, वशिष्ठ नारायण सिंह और शकुंतला देवी जैसे प्रख्यात गणितज्ञ अंकों की भारतीय उच्चारण शैली में पढ़कर ही महान हुए।

अंकों की नई उच्चारण पद्धति को लेकर और भी कई जटिलताएं पैदा होंगी। मसलन अगर 29 को मराठी में –‘वीस नऊ‘ पढ़ा जाएगा तो 293 को मराठी में किस तरह से पढ़ेंगे? और तो और मोबाइल के नंबर नई प्रणाली में मराठी में कैसे उच्चारित किए जाएंगे, इस बारे में शायद ही किसी ने गंभीरता से विचार किया गया है।

सवाल यह भी पूछा जा रहा है कि बाल भारती ने नई अंकोच्चार पद्धति लागू करते समय किसी से समझदार से पूछा या सलाह ली थी या नहीं? इसके पीछे कोई गहरा मंथन और अध्ययन है या नहीं अथवा यह केवल ‘मेरी मरजी’ वाला मामला है? और ऐसा करने से भारतीय संस्कृति किस तरह संरक्षित होगी ? माना कि हिंदी की तरह मराठी में जोड़ाक्षरों का उच्चारण बच्चों के लिए थोड़ा कठिन हो सकता है, लेकिन इस समस्या यह इलाज कतई नहीं है, जो बाल भारती दूसरी की किताब में दिया गया है। और न ही यह जोड़ाक्षर को तोड़ाक्षर में तब्दील करने का सही उपाय है।

हैरानी की बात है कि महाराष्ट्र में बाल भारती की दूसरी कक्षा की ‍किताब में बदलाव किए लागू करते समय मराठी भाषा की विशिष्टता और शब्द संपदा को दरकिनार कर दिया गया। यह सही है कि मराठी भाषा के लेखन और उच्चारण में एकरूपता को लेकर ( हिंदी की ही तरह) कुछ दिक्कतें हैं। इनमें एकरूपता लाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 2009 में बाकायदा पत्रक जारी किया था, जिनमें अंकों का सही मराठी उच्चारण भी शामिल था। लेकिन नई अंकोच्चार पद्धति में उसे भी ताक पर रख दिया गया।

हालांकि मराठी भाषा के लेखन और उच्चारण में जो वास्तविक दिक्कतें हैं, उनका कोई ठोस समाधान अभी तक नहीं हुआ है। उदाहरण के लिए मराठी में अनुस्वार (ं) का इस्तेमाल ‘अं’ की मात्रा के लिए भी होता है और अक्षर के अकारांत उच्चारण के लिए भी होता है। इससे गैरमराठी भाषी के लिए यह समझना कठिन हो जाता है कि शब्द को सही ढंग से कैसे पढ़ें? व्यावहारिक रूप से यह भेद केवल भाषा को सुनकर ही समझा जा सकता है। बावजूद इसके अंकों के उच्चारण को लेकर तो मराठी में कोई असमंजस या विवाद नहीं है। फिर भी इसे बदलने के पीछे सोच केवल मराठी जैसी भारतीय भाषा के पिछले दरवाजे से अंगरेजीकरण की ज्यादा लगती है।

अंगरेजी का सहारा वहां लिया जाए, जहां हमारी भाषाओं के पास शब्दों का अभाव हो, समझ आता है। लेकिन जहां पहले से ही शब्द संपदा मौजूद हो, वहां सरलीकरण के नाम पर इक्कीस को ‘वीस एक’ करने के पीछे क्या तुक है? या फिर यह मराठी सहित तमाम भारतीय भाषाओं को सोचे समझे तरीके से दरिद्र और कुपोषित बनाने का गहरा षड्यंत्र है, यह समझना होगा। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आज यह मराठी में हो रहा है, कल को हिंदीके साथ भी सरलीकरण के नाम पर ऐसा मूर्खतापूर्ण खिलवाड़ हो सकता है, क्या हमे इसे स्वीकारना चाहिए?

सुबह सबेरे से साभार

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