हिंदी कमेंट्री के ‘जसदेव’

21वीं सदी भले ही आधुनिक तकनीक के साजो-सामान के साथ लैस होकर युवा पीढ़ी के दिलो-दिमाग में छाई हो, लेकिन रेडियो के चाहने वालों की वह पीढ़ी भी रही है, जिसे जसदेव सिंह की जादुई आवाज ने चुंबक की तरह अपनी ओर आकृषित कर रखा था। 1980 के बाद लोगों ने टीवी पर भी कई दफा अपने चेहरे के साथ किसी मैच का या फिर 15 अगस्त या 26 जनवरी की परेडों का आंखों देखा हाल विशिष्ट अंदाज में पेश करने वाले जसदेव सिंह का जलवा भी देखा है…सुना है…।

मैं जसदेव सिंह बोल रहा हूं…। इस घोषणा के साथ ही रेडियो की आवाज बढ़ा दी जाती थी। लोग रेडियो के करीब आ जाते थे। उसके बाद बस, एक आवाज गूंजती थी। जसदेव सिंह की आवाज। मलेशिया की राजधानी क्वालालंपुर में हुए 1975 के हॉकी विश्व कप को उस दौर का कोई शख्स नहीं भूल सकता। यहां तक कि फाइनल में विजयी गोल दागने वाले अशोक कुमार ने भी कुछ समय पहले कहा था कि जब हम लौटकर आए, तो वह कमेंट्री दोबारा सुनी। उस कमेंट्री को सुनने के लिए इंदिरा गांधी ने संसद की कार्यवाही तक रुकवा दी थी। हॉकी के हर ‘पास’ की रफ्तार जसदेव सिंह के मुंह से निकलते शब्द की रफ्तार से मुकाबला करते थे। ऐसा लगता था, जैसे वह एक भी लम्हा नहीं चूकना चाहते…और कमेंट्री को लेकर उनका लगाव ही था, जो वल्र्ड कप के 30 बरस बाद भी वह कमेंट्री शब्द-दर-शब्द उन्हें याद थी। माहौल बताना उनकी खासियत थी। उनकी कमेंट्री चिडिय़ों के चहचहाने, सुहानी बयार, पेड़ों के झूमने से शुरू होती थी। मजाक में यहां तक कहा जाने लगा था कि जसदेव सिंह तो इनडोर स्टेडियम में चिडिय़ों की आवाज सुना देते हैं।

दरअसल, 31 जनवरी, 1948 को मेलविल डेमिलो द्वारा की गई महात्मा गांधी के अंतिम सफर की कमेंट्री सुनने के बाद जसदेव सिंह का कमेंट्री के साथ लगाव शुरू हुआ था। इसके बाद उनके शब्दों ने 1962 के स्वतंत्रता दिवस पर जो शुरुआत की, तो फिर वह किसी भी स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस की आवाज बन गए। शायद ही कोई ऐसा बड़ा इवेंट हो, जहां जसदेव सिंह की आवाज न गूंजी हो। जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी जैसे नेताओं की अंतिम यात्रा हो या खेलों का कोई भी बड़ा इवेंट हो, हर जगह जब भी कमेंट्री की बात आती, तो जसदेव सिंह का नाम पहले आता था। उन्होंने 1968 के हेलसिंकी ओलंपिक से लेकर 2000 तक के सिडनी ओलंपिक तक (9 ओलंपिक) का हाल भारतीय लोगों तक पहुंचाया। यह भी अपने आप में एक कीर्तिमान है। इसके अलावा उन्होंने 8 हॉकी विश्व कप और 6 एशियाई खेलों की कमेंट्री में अपनी खनकती आवाज और जादुई शब्दों से समां बांधा।

सवाई माधोपुर में जन्मे और जयपुर आकाशवाणी केंद्र से 1955 में अपने कॅरियर की शुरुआत करने वाले जसदेव सिंह 1963 में दिल्ली आकाशवाणी में आ गए और दूरदर्शन से जुड़ गए। 1963 से लेकर 48 सालों तक रेडियो और उसके बाद दूरदर्शन पर उनका एकछत्र राज रहा। उन्हें स्टार स्पोट्र्स में भी शुरुआती समय में सुनील गावस्कर के साथ मौका मिला। उन्होंने 2000 के सिडनी ओलंपिक में ओपनिंग सेरेमनी की कमेंट्री की, लेकिन तब तक साफ होने लगा कि आवाज का जादू तो बरकरार है, लेकिन अब आंखों और आवाज का समन्वय गड़बड़ा रहा है। कुछ खिलाडिय़ों को पहचानने में उन्हें समस्या होने लगी थी। हालांकि इसके बाद भी कई सालों तक वह कमेंट्री करते रहे। जसदेव सिंह को खेलों को बढ़ावा देने के लिए 1988 में ‘ओलंपिक ऑर्डर’ से सम्मानित किया गया। इस तरह का सम्मान पाने वाले वह पहले भारतीय हैं। भारत सरकार ने जसदेव सिंह को 1985 में पद्मश्री और 2008 में पद्म भूषण से सम्मानित किया था।

लेकिन जैसा कहा जाता है कि समय का पहिया किसी के लिए नहीं थमता। 24 सितम्बर 2018 को 87 बरस की उम्र में जसदेव सिंह दुनिया छोड़ गए। इसी के साथ कमेंट्री का वह दौर भी खत्म हो गया है, जिसे उनकी आवाज ने पहचान दी थी। यकीनन इसमें कोई शक नहीं कि जसदेव सिंह की आवाज गूंजती थी, तो ऐसा लगता था, मानो दुनिया थम जाए। जयपुर में अमर जवान ज्योति पर हर शाम उनकी आवाज आज भी गूंजती है। वह आवाज सिर्फ अमर जवान ज्योति नहीं, हर उस दिल में हमेशा गूंजती रहेगी, जिसने उनकी कमेंट्री सुनी है।

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