45 साल में रिकॉर्ड बेरोज़गारी की रिपोर्ट को अब सरकार ने मानी

दिल्ली ब्यूरो: आखिर सच को चुनौती कौन दे सकता है और सच को कब तक छुपाया जा सकता है। बेरोजगारी को लेकर पिछले दिनों राष्ट्रीय सांख्यकी परिषद् की रिपोर्ट को लेकर केंद्र सरकार ने बहुत सी बातें कही थी और उसकी रिपोर्ट को मानने से इंकार भी कर दिया था। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि मौजूदा समय की बेरोजगारी 45 साल की ऐतिहासिक बेरोजगारी है देश में। लेकिन सरकार को इसमें राजनीति नजर आ रही थी। मानने से इंकार कर दिया था। लेकिन अब सरकार ने माना है कि उसने राष्ट्रीय सांख्यिकी परिषद् की ओर से जारी की गई जॉब डाटा को मान लिया है।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने परिषद् की रिपोर्ट को अपूर्ण बताते हुए कहा था कि इसके डाटा का न तो सत्यापन हुआ है और न ही कैबिनेट से मंज़ूरी मिली है। विशेषज्ञों ने उनके इस बयान का खंडन करते हुए कहा था कि परिषद् से सहमति के बाद कैबिनेट से मंज़ूरी का कोई प्रावधान नहीं है। लोक सभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में श्रम और रोज़गार मंत्री संतोष गंगवार ने कहा कि एनएसएसओ ने 2017 में सावधिक श्रम बल सर्वेक्षण शुरू किया जो शहरी क्षेत्रों के लिए तिमाही अनुमानों के साथ रोजगार और बेरोज़गारी पर श्रम बल से जुड़े वार्षिक अनुमान के लिए तैयार किया गया एक नियमित सर्वेक्षण है।

वर्ष 2017-2018 (जुलाई 2017 से जून 2018) के लिए एनएसएसओ ने सर्वेक्षण पूर्ण कर लिया है। राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग को मसौदा रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है। आयोग ने इस सर्वेक्षण को सहमति भी दे दिया है। बेरोज़गारी को लेकर चौतरफा कड़ी आलोचना झेल रही सरकार ने अब तक एनएसएसओ के 2017 -18 के डाटा को जारी नहीं किया है। रिपोर्ट रोकने के विरोध में परिषद् के दो सदस्य जे वी मीनाक्षी और कार्यवाहक अध्यक्ष पी सी मोहनन ने इस्तीफ़ा दे दिया था। खबर के मुताबिक बेरोज़गारी दर 6. 1 % पहुँच गई है जो कि 45 साल में सबसे अधिक है।

इससे पहले मोदी सरकार ने लेबर ब्यूरो की ओर से किए जाने वाले सालाना सर्वे को भी बंद कर दिया था। पिछले 2 साल से इसकी कोई रिपोर्ट नहीं आई है। हाल में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इकॉनमी ने भी अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि पिछले साल एक करोड़ 10 लाख नौकरियां ख़त्म हो गई। लेकिन सरकार ने इस आंकड़े को यह कह कर खारिज कर दिया कि एक निजी संस्था के आंकड़े को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। आलोचकों को जवाब देने के लिए सरकार ईपीएफओ और आयकर विवरण दाखिल करने के आंकड़ों का सहारा ले रही है। लेकिन विशेषज्ञ इसे सही नहीं मानते। उनका कहना है कि ईपीएफओ की सदस्यों संख्या और और आयकर विवरणी को रोज़गार का भरोसेमंद पैमाना नहीं माना जा सकता।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...
Loading...
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper