यूपी में 54 लाख बच्चे कुपोषण के शिकार, जानिये क्या हैं कारण

दिल्ली ब्यूरो : यूपी के बच्चे बेहाल हैं। सूबे की सरकार बहुत कुछ कहती तो नजर आती है लेकिन होता बहुत कम ही दिखता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि इस तरह की राजनीति केवल योगी सरकार में ही हो रही है। पिछली तमाम सरकार भी बोलने में सबसे आगे रही है। जब सूबे के बच्चे ही स्वास्थ्य नहीं रहेंगे तो विकास की साड़ी बातें बेमानी से कम नहीं।

अभी राज्य पोषण मिशन की सर्वे रिपोर्ट जैसे ही सामने आयी सरकार की पोल सी खुल गयी। इस रिपोर्ट के मुताविक राज्य के 54 लाख बच्चे कुपोषण के शिकार पाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर जल्द ही इस पर काबू नहीं पाया गया तो यह महामारी की तरह फ़ैल सकती है। रिपोर्ट के मुताविक सर्वाधिक आजमगढ़ जिले में बच्चे कुपोषण का शिकार हुए हैं।राज्य पोषण मिशन के निदेशक अनूप कुमार की माने तो प्रदेश के छह जिलों में 50 फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।

सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, आजमगढ़ में 61 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, जबकि दूसरे नंबर पर शाहजहांपुर है, जहां 54 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। बदायूं में 53़6, कौशांबी में 52़8, जौनपुर में 52़7 और चित्रकूट में 52़5 बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। रिपोर्ट कहती है कि इसके अलावा 33 जिले ऐसे हैं, जहां लगभग 30 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। इनमें मुख्यमंत्री का गोरखपुर भी शामिल है। निदेशक ने बताया, “कुपोषण के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के अंतर्गत प्रदेश में पांच वर्ष तक की आयु के लगभग दो करोड़ बच्चों का वजन कराया गया। इनमें लगभग 40 लाख बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से कम वजन के मिले।

इन्हें कुपोषित बच्चों की सूची में एलो कैटेगरी में रखा गया है। इसके अलावा 1368734 बच्चे अति कुपोषित हैं, लिहाजा इन्हें रेड कैटेगरी में रखा गया है।” अधिकारियों की मानें तो दिसंबर 2018 तक कुपोषित बच्चों की संख्या हालांकि 28 फीसदी से घटाकर 26 फीसदी तक लाने का लक्ष्य रखा गया है।

हालांकि सरकार की तरफ से राज्य के 39 जिलों को कुपोषण से मुक्ति दिलाने के लिए शबरी संकल्प योजना संचालित कर रही है। इसके तहत जिला स्तर के अधिकारी दो दो गांवों को गोद लेकर वहां मिशन की ओर से चलाई जा रही योजनाओं की निगरानी करते हैं। इसकी रिपोर्ट वेबसाइट पर भी अपलोड की जाती है। इसके लिए काम सही दिशा में हो रहा है या नहीं, इसके लिए मिशन की तरफ से भी क्रॉस चेकिंग कराई जाती है। इसके लिए निजी एजेंसियों के माध्यम से इसकी जांच करवाई जाती है। आंकड़ों के मुताबिक, अभी तक 3000 अधिकारियों ने उप्र में 6000 गांवों को गोद लिया है।

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