63 की उम्र में हर रोज 250 गरीबों को भोजन कराते हैं बालाचंद्रा, आज बन चुके हैं मिसाल

बेशक किसी भी इंसान को जिंदा रहने के लिए दो वक्त की रोटी चाहिए होती है जिसके लिए वो सुबह से लेकर शाम तक काम करता है। फिर चाहे वो कोई मामूली सा इंसान हो या फिर बड़ा व्यक्ति, जीविका चलाने के लिए उसे भोजन का प्रबंध करना ही पड़ता है। मगर यह जरूरी नही है कि हर किसी को उसके अनुसार काम मिले और शाम होते होते उसे भोजन नसीब हो ही जाए। इस संसार में बहुत से ऐसे लोग है जिनके पास किसी भी चीज की कोई कमी नही है और वैसे भी हैं जिन्हें कितने कितने दिनों तक भूखे पेट ही सोना पड़ता है। यकीनन गरीबी का जीवन बिताने वाले कि जिंदगी काफी ज्यादा दुखदायी होती है। मगर इस संसार में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो बिना किसी फायदे और मतलब के गरीबों की मदद करते है और कोशिश करते है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों का पेट भर सकें ताकि कोई भी गरीब भूखा पेट ना सोये।

ऐसे ही एक महान व्यक्ति हैं जो खुद के बारे में उतना नही सोचते होंगे जितना कि दूसरों के दुख सुख के बारे में सोचते हैं। उनकी सबसे खास बात ये है वो ना सिर्फ दूसरों के दुख के भागीदार बनते हैं बल्कि अपनी तरफ से हर संभव प्रयास करते हैं कि किस तरह से सामने वाले के दर्द को बांट लें। यह भी एक विडंबना ही है कि इस दुनिया मे कितनी ज्यादा मात्रा में अक्सर ही अनाज बर्बाद हो जाय करता है और तो और लोग खाने के बाद जूठन छोड़ कर भी काफी मात्रा में भोजन बर्बाद कर दिया करते है। ऐसी स्थिति में अगर कोई व्यक्ति भूखे लोगों का पेट भरने का प्रयास करता है तो यकीनन उससे महान और शायद ही कोई होगा।

वैसे तो इस दुनिया में महान काम करने वालों की कमी नही है मगर आज हम आपको एक ऐसे ही व्यक्ति से मिलवाने जा रहे है जो 63 वर्ष की उम्र में भी गरीब लोगों का पेट भरने जैसा पुण्य काम कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं तमिलनाडु के बालाचंद्रा की जिन्होंने गरीब लोगों को भोजन कराने की जिम्मेदारी उठा रखी है।

बताते चलें कि तमिलनाडु के तूतूकुडी जिले में आदिवासियों जनसंख्या काफी ज्यादा है और वहां पर काफी मात्रा में पिछड़े वर्ग के लोग हैं जो बेहद ही ज्यादा गरीबी में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। यह बालाचंद्रा का साहस है या फिर उनका दृढ़ प्रतिज्ञा जिसके चलते वो रोजाना यहां पर आ कर 250 आदिवासियों को भोजन कराते हैं।

आपको यह सुनकर काफी आश्चर्य होगा कि बालाचंद्रा यहां के पहाड़ी बस्तीयों तथा आसपास के इलाके में नियम से सुबह के 11 बजे से दोपहर 12 बजे तक भोजन के ढेर सारे पैकेट ले कर पहुंच जाते हैं। सबसे खास बात तो ये है कि उनके खाने में कई तरह के स्वादिष्ट भोजन मौजूद रहता है जो कि पोषक तत्वों से भरपूर होता है।

लोग इनके भोजन को कहा कर बोर ना हो जाएं बालाचंद्रा इसका भी पूरा ख्याल रखते है और हर दिन अपना मेनू बदलते रहते है। खाना खिलाने तक तो ठीक है मगर इसके साथ ही साथ महीने के तीसरे रविवार को अपनी तरफ से प्रत्येक परिवार में 5 किलो चावल तथा 1 किलो दाल बंटाते हैं।

जब बालाचंद्रा से ऐसा काम करने की वजह पूछी गई तो उन्होंने बताया कि 14वीं शताब्दी में जो कावेरीपत्तनम के संत पत्तीनाथर हुए थे उनसे ही उन्हें प्रेरणा मिली है ये महान काम करने की। वो बताते हैं कि उन्होन ये काम करने की उस वक़्त ही मन में ठान ली थी जब वो अपने कारोबार की शुरुवात कर रहे थे।

बालाचंद्रा बताते हैं कि आने जीवन के 60 वर्ष तो उन्होंने परिवार को दे दिया है अब बाकी की जिंदगी वो जरूरतमंदो को देना चाहते हैं। फिलहाल अब वो अपने कारोबार से भी मुक्त हो चुके है और परिवार की जिनमेदारी से भी। बताता दे कि बालाचंद्रा का परिवार भी अच्छी तरह से सेटल है। निश्चित रूप से बालाचंद्रा जो कार्य कर रहे वो सभी के लिए बेहद ही सराहनीय और प्रेरणा लेने योग्य है।

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