बैंकों का एनपीए किसानो के मुकाबले पूंजीपतियों पर 9 गुना ज्यादा 

दिल्ली ब्यूरो : बहस और विश्लेषण बाद में। पहले हकीकत से जुड़े आंकड़े पर गौर कीजिये तो  पता चलता है कि इस देश के पूंजीपतियों और उद्योगपतियों ने किस तरह से देश को लुटा है और लूट के पसे से अपनी औकात समाज में बनायी है। उधर देश का किसान अन्नदाता अपना सबकुछ दाव पर लगाकर या तो भूखों मरने को विवश है या फिर आत्महत्या करने को मजबूर। मध्य प्रदेश के नीमच निवासी और सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी हासिल की है, वह इस बात का खुलासा करती है कि किसानों और खेती से जुड़े लोगों का एनपीए कुल जमा 66,176 करोड़ है।  इसमें से सार्वजनिक बैंकों का एनपीए 59,177 करोड़ और निजी बैंकों का 6,999 करोड़ रुपये है।
किसानों और खेती के काम से जुड़े लोगों के एनपीए के मुकाबले उद्योग जगत का जीएनपीए 5,67,148 करोड़ रुपये है।  इसमें से सार्वजनिक बैंकों का 5,12,359 करोड़ और निजी बैंकों का 54,789 करोड़ रुपये है। उधर  भारतीय रिजर्व बैंक से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, सेवा क्षेत्र का एनपीए 1,00,128 करोड़ रुपये है।  इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का 83,856 और निजी बैंकों का 16,272 करोड़ रुपये है।
इन आंकड़ों को जानकार आम आदमी कर क्या सकता है ? कुछ भी तो नहीं। लेकिन एक सच यह है कि देश के किसानो के ऊपर बैंकों का ना भुगतान होने वाला लोन मात्र 66,176 करोड़ है जबकि उद्योगपतियों से जुड़े एनपीए 5 लाख सरसठ हजार एक सौर अड़तालीस करोड़ है।  एक तरफ देश का किसान कर्ज से बेहाल है, तो दूसरी ओर उद्योगपति कर्ज लेकर घी पीते भागे भागे फिर रहे हैं।  विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे उद्योगपति बैंक से हजारों करोड़ों का कर्ज लेकर फरार हो जाते हैं, वहीं छोटा कर्ज लेकर किसान आत्महत्या तक करने को मजबूर हो जाते हैं।
सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त इस जानकारी से खुलासा होता  है कि बैंकों का एनपीए किसानों के मुकाबले उद्योगपतियों पर 9 गुना ज्यादा है।
गौरतलब है कि  ‘देश के किसानों का जीएनपीए (सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां) 66,176 करोड़ है, तो उद्योगों का एनपीए 5,67,148 करोड़ है।  देश के संपूर्ण एनपीए (जीएनपीए) पर नजर दौड़ाएं, तो यह 7,76,067 करोड़ रुपये है।  इसमें से 6,89,806 करोड़ रुपये सार्वजनिक बैंकों के हैं, तो 86,281 करोड़ रुपये निजी बैंकों के हैं।  इस तरह निजी बैंकों के मुकाबले सार्वजनिक बैंकों का एनपीए आठ गुना से अधिक  है।
आपको बता दें  कि एनपीए वह राशि होती है जिसकी वसूली बैंकों के लिए आसान नहीं होती है।  एक हिसाब से यह डूबत खाते की रकम की श्रेणी में आती है।  इस राशि को बैंक राइट ऑफ घोषित करके अपनी बैलेंस शीट को साफ -सुथरा कर सकता है।  बीते पांच सालों में बैंकों ने 3,67,765 करोड़ रुपये की रकम आपसी समझौते के तहत डूबत खाते में डाली है।  बैंक के जानकार बताते हैं कि बैंकों की खस्ता हालत का एक कारण एनपीए है, तो दूसरा लंबित कर्ज है।  बैंक के द्वारा जो रकम डूबत खाते में डाली जाती है, वह आम उपभोक्ता के ही खातों से वसूली जाती है।  एनपीए सीधे तौर पर वह रकम है, जो बैंक वसूल करने में असफल नजर आता है।
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