आदित्यनाथ सरकार घिरी पेंशन पर

भारत सिंह
लाखों राज्यकर्मियों ने महा-प्रदर्शन कर एक स्वर में दो टूक ऐलान कर दिया है कि वे अप-डाउन होने वाले शेयर मार्केट की बुनियाद पर खड़ी नई पेंशन पॉलिसी की बजाय आखिरी सांस तक निश्चित और पुख्ता आर्थिक सुरक्षा देने वाली पुरानी पेंशन पॉलिसी ही चाहते हैं। उन्होंने योगी आदित्यनाथ सरकार को अल्टीमेटम भी दिया है कि उनकी मांग नहीं मानी गई, तो वे 26 से 28 अक्टूबर तक राज्यव्यापी हड़ताल करेंगे। यहां भी बात नहीं बनी, तो वे आगे भी आंदोलन करने के लिए विवश हो होंगे।
प्रदेश सरकार राज्यकर्मियों की मांग के प्रति कितनी तत्परता दिखाती है, यह तो अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में कुछ हद तक साफ हो जाएगा, लेकिन 8 अक्टूबर को जब लाखों की संख्या में राज्यकर्मी गीतापल्ली स्थित ईको गार्डेन में अपनी मांग को लेकर एकजुट हुए थे, तो योगी सरकार कर्मचारियों की ताकत से हिले बिना नहीं रही। ऐसा यूं, क्योंकि उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा को वार्ता के लिए कर्मचारी नेताओं को बुलाना पड़ा। सचिवालय के वित्त विभाग के सभागार में दोपहर 1.45 बजे से 4० मिनट तक चली वार्ता में उप मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव डॉ. अनूप चंद्ग पाण्डेय, अपर मुख्य सचिव नियुक्ति मुकुल सिंघल, डीएम कौशल राज, पुरानी पेंशन बहाली मंच के संयोजक हरि किशोर तिवारी, कर्मचारी अधिकारी महापरिषद के पूर्व अध्यक्ष बाबा हरदेव सिंह, उप्र सचिवालय संघ के अध्यक्ष यादवेंद्ग मिश्र, रामराज दूबे, हरनाम सिंह आदि शामिल थे।
वार्ता के दौरान कर्मचारी नेताओं ने पुरानी पेंशन के मुद्दे पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, गृह मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा पूर्व में दिये गये समर्थन का हवाला दिया। साथ ही सीएजी रिपोर्ट के हवाले से कहा कि नई पेंशन नीति के तहत कर्मचारी पेंशन का 584 करोड़ रुपये सरकार ने जमा ही नहीं किया। इस पर विशेष सचिव वित्त नीलरतन कुमार ने सीएजी की रिपोर्ट को त्रुटिपूर्ण करार देते हुए कहा कि पेंशन के पैसे जमा हैं, लेकिन शेष 2०० करोड़ रुपये से कुछ अधिक धनराशि, जो जमा की जानी है, उस पर जीपीएफ की दर से ब्याज दिया जाएगा। कर्मचारी नेता संतुष्ट नहीं हुए और पुरानी पेंशन बहाली की मांग पर अड़े गये। वार्ता बेशक नाकाम हो गई, लेकिन डॉ. शर्मा ने नेताओं को आश्वास्त किया कि वह 1० दिन के भीतर उनकी वार्ता मुख्यमंत्री के साथ कराएंगे और यह मसला प्रधानमंत्री नरेन्द्ग मोदी के समक्ष भी उठाएंगे।
वार्ता नाकाम हो जाने के बाद ही कर्मचारी नेताओं ने तीन दिवसीय राज्यब्यापी हड़ताल का ऐलान किया। कामरेड शिवगोपाल, कर्मचारी अधिकारी महापरिषद के पूर्व अध्यक्ष बाबा हरदेव सिंह, मंच के अध्यक्ष डॉ. दिनेश चंद्ग शर्मा, राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के अध्यक्ष अमरनाथ यादव ने कहा कि देश के लगभग 2.5० करोड़ राज्य कर्मचारी और 32 लाख केन्द्गीय कर्मचारियों से नई पेंशन योजना के नाम पर अब तक लगभग 1० हजार करोड़ रुपये लिये गये, लेकिन इस धनराशि का लेखा-जोखा सरकारों के पास नहीं है। पुरानी पेंशन बहाली के लिए हम मोर्चा खोल चुके हैं। यह तब तक चलता रहेगा जब तक उनकी मांग पूरी नहीं हो जाती।
राज्यकर्मियों के महा-प्रदर्शन के दौरान तब अकस्मात मोड़ आया जब उप मुख्यमंत्री के साथ वार्ता के लिए कर्मचारी नेताओं के जाते ही आंदोलनकारी कर्मचारियों ने विधानसभा को घेर लिया। हालांकि यह घेराव आधे घंटे तक ही चला, लेकिन इस दौरान सचिवालय और विधानसभा के बाहर पुरानी पेंशन बहाली के नारे खूबे गूंजे। प्रदर्शन में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ समेत विभिन्न राज्यों के कर्मचारी नेता भी शामिल हुए। 1 अप्रैल, 2००5 और उसके बाद से तैनात करीब 12 लाख कर्मचारी नई पेंशन व्यवस्था से आच्छादित हैं।
नई पेंशन व्यवस्था: पूरे सेवाकाल में शेयर के रूप में बढ़कर जो धनराशि बनेगी उसका 6० फीसदी सेवानिवृत्ति के समय नगद भुगतान कर्मचारी को किया जाएगा। शेष 4० फीसदी धनराशि फिर से शेयर में लगेगी और उसके लाभ से ही पेंशन दी जाएगी। नई योजना में ग्रेच्युटी, राशिकरण और भविष्यनिधि खत्म कर दी गई है। कर्मचारी नेताओं का कहना है कि यदि शेयर मार्केट को बड़ा झटका लगने पर सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होगी। कंपनियों के दिवालिया होने पर धन डूब जाएगा।
पुरानी पेंशन व्यवस्था: इस व्यवस्था में कर्मचारी को अपने वेतन से कुछ भी नहीं कटवाना पड़ता। कर्मचारी इस व्यवस्था को सौ फीसदी सुरक्षित मानते हैं। उनके पैसों के डूब जाने का कोई खतरा नहीं होता। सबसे बड़ी बात यह कि इसके बूते ही बुजुर्ग अवस्था में वह अपने बच्चों से यह कहने की स्थिति में होते हैं कि वे किसी के मोहताज नहीं। उसके पास जीवन पर्यंत पेंशन है।
चार राज्यों में पुरानी व्यवस्था : केरल, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और जम्मू कश्मीर में अभी भी राज्यकर्मचारी पुरानी पेंशन व्यवस्था से ही लाभान्वित हैं।

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