आखिर बच्चे क्यों हो रहे हैं हिंसक, जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ

आलोक कुमार 

राजधानी लखनऊ के ब्राइटलैंड स्कूल में जिस तरह से एक सातवीं कक्षा की छात्रा ने कक्षा एक के मासूम छात्र पर चाकू से जानलेवा हमला किया, उससे एक बार फिर से गुरुग्राम (गुड़गांव) के प्रद्युम्न मामले की याद ताजा हो गई। इन दोनों मामलों से एक बात तो साफ है कि प्रतियोगिता के बढ़ते इस दौर में दूसरों से आगे निकलने और पढ़ाई का जबरदस्त बोझ बच्चों की मानसिकता को तेजी से बदल रहा है।

दोनों ही मामलों में आरोपी छात्रों की वहशी दरिंदगी के लिए स्कूल तो दोषी है ही, माता-पिता भी कम कुसूरवार नहीं हैं। इसी तरह की एक अन्य घटना रांची की है, जिसमें 7वीं कक्षा के छात्र ने अपने स्कूल की टाई से फांसी लगा ली, क्योंकि गर्मी की छुट्टियों के बाद उसका स्कूल खुलने वाला था और प्रोजेक्ट पूरा नहीं होने के कारण वह मानसिक दबाव में था। इसी तरह धनबाद में चौथी क्लास के छात्र ने पढ़ाई के दबाव में आत्महत्या कर ली।

रांची में हॉस्टल में रहने वाली छात्रा ने पढ़ाई का दबाव नहीं झेल पाने के कारण आत्महत्या कर ली। अभी कुछ माह पहले ही दिल्ली में एक बच्चा मोबाइल पर गेम खेलने में इतना मशगूल हो गया था कि 24 घंटे कैसे गुजर गए, उसे पता ही नहीं चला। यहां तक कि गेम खेलते-खेलते उसने बिस्तर पर ही शौच कर दिया। इस तरह की कई घटनाएं हमारे बीच हो रही हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या कोई बच्चा या किशोर तात्कालिक गुस्से या अवसाद में आत्महत्या या हिंसा जैसा आत्मघाती कदम उठा सकता है या फिर यह महीनों-वर्षों की कुंठा थी, जो आत्महत्या या हिंसा के रूप में सामने आई। द लखनऊ ट्रिब्यून ने इन्हीं सुलगते सवालों पर बात की राजधानी के कुछ नामचीन विशेषज्ञों से।

– केजीएमयू के मानसिक रोगों के प्रोफेसर डॉ. विवेक अग्रवाल का कहना है कि बच्चों में जो गुस्सा दिखाई दे रहा है, वह कहीं न कहीं बच्चे अपने परिवार में देखते हैं। आज बच्चा अलग-थलग पड़ गया है। माता-पिता के पास अपने बच्चों के लिए समय नहीं है। बच्चों की सहनशीलता लगातार खत्म हो रही है। इससे बचने के लिए हम अपने बच्चों से बात करें और उन्हें पर्याप्त समय दें।

– नेशनल डिग्री कॉलेज के मनोविज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. पीके खत्री का का कहना है कि प्राय: यह देखा गया है कि बच्चों में सहनशीलता कम होती जा रही है। इसकी वजह से वे हर काम के लिए शॉर्टकट ढूंढने लगते हैं। यही वजह है कि सही निर्णय करने की क्षमता खत्म होती जा रही है।

– लखनऊ विश्वविद्यालय की मनोविज्ञान की प्रमुख प्रोफेसर पल्लवी भटनागर कहती हैं कि बदलते परिवेश में बच्चा खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है। इसी वजह से बच्चों में तनाव महामारी का रूप लेता जा रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि बढ़ते दौर में माता-पिता के पास अपने बच्चों के लिए समय नहीं है और बच्चा खुद को अकेला महसूस कर रहा है। इसके लिए हमें इस गैप को दूर करना होगा। क्योंकि, जिस उम्र के बच्चे इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं, वह ‘तूफानी उमर’ है। टेक सेवी बच्चे गेम और अन्य तरह की सोशल साइटों से जुड़े हैं। सारी सुविधाएं होने के बाद भी वह खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं।

सरकार को इसके लिए विशेषज्ञों की एक टीम बनाकर इस मसले पर काम करना होगा। साथ ही माता-पिता को भी एक बार फिर से सोचना होगा। जो स्थिति पहले बड़े लोगों में होती थी, वह आज बच्चों में हो रही है। उनका कहना है कि निर्भया और प्रद्युम्न जैसे केसों को जिस तरह से मीडिया ने हाइप दी वह भी कहीं न कहीं बच्चे की मानसिकता पर गहरा असर डाल रही है। बच्चे खुद को लाइमलाइट में लाने के लिए भी ऐसी चीजों की ओर मुड़ते हैं। इसीलिए यह सिंगल एपिसोड़ नहीं है, अगर इसपर गौर नहीं किया गया तो फिर ऐसी और भी घटनाएं सामने आती रहेंगी।

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