बीजेपी सेंसर बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट का हथौड़ा

दिनेश दीनू


आखिर सुप्रीम कोर्ट ने पद्मावत फिल्म पर बीजेपी शासित राज्यों, जिन्होंने फिल्म के प्रदर्शनपर बैन लगाया था, को फटकार लगाते हुए स्पष्ट कर दिया कि अभिव्यक्ति की आजादी को राज्य सरकारें बैन नहीं कर सकतीं। 25 जनवरी को फिल्म के प्रदर्शन पर सरकारों की जिम्मेदारी है कि कानून-व्यवस्था का पालन करें। लोगों को सुरक्षा प्रदान करना सरकारों की जिम्मेदारी है।

बीजेपी शासित पांच राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र की सरकारों ने फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी थी। ये सरकारें फिल्म सेंसर बोर्ड से ऊपर हो गयीं। सेंसर बोर्ड ने फिल्म प्रदर्शित करने की अनुमति दी, लेकिन बीजेपी शासित इन पांच राज्यों ने अपना सेंसर बोर्ड बनाकर फिल्म के प्रदर्शन को बैन कर दिया।

8 जनवरी को राजस्थान सरकार ने फिल्म पर रोक लगाई तो 12 जनवरी को मध्य प्रदेश सरकार ने। 14 जनवरी को गुजरात में रोक का ऐलान हुआ तो 15 जनवरी को हरियाणा में। इस संवैधानिक खोट में महाराष्ट्र भी शामिल हो गया।

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दरअसल गुजरात विधानसभा के समय ‘पद्मावती’ फिल्म के विरोध को हवा दी गयी। राजपूतों के आन-बान-शान के नाम पर कई राजपूत संगठन की अपनी सेनाएं विरोध के मैदान में उतर गयीं। इनके विरोध को दबाने के लिए इन राज्यों की सरकारों ने कुछ नहीं किया। बल्कि वोट की राजनीति में विरोध को हवा तक देती रहीं। नतीजा रहा कि वोट बैंक की सियासत की हांडी में पद्मावती फिल्म चढ़ गयी।

भारतीय फिल्म सेंसर बोर्ड ने भी गुजरात विधानसभा चुनाव के समय इस फिल्म को देखने की जहमत नहीं की। चुनाव परिणाम आने के बाद सेंसर बोर्ड ने पद्मावती को पद्मावत नाम से प्रदर्शित करने की अनुमति दी तो बीजेपी सरकारें खुद ही सेंसर बोर्ड बन गयीं और 25 जनवरी को प्रदर्शित होने वाली फिल्म पर रोक लगा दी।

पांच बीजेपी सरकारें ही नहीं राजपूतों का ध्वज उठाए करणी सेना ने भी सेंसर बोर्ड की अनुमति को मानने से इनकार कर दिया। यहां तक कह दिया कि पद्मावती को जो समर्थन करेगा, उसे वोट नहीं। देखा जाए तो 2०18 में राजस्थान, मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसीलिए बीजेपी राजपूतों का एकमुश्त वोट पाने के लिए विरोध को हवा दे रही है। इस हवा के चलते और पद्मावत के विरोध में दिखते वोट बैंक के चलते ही बीजेपी शासित राज्यों में, जो राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा से लगे हैं, वहां फिल्म पर बैन लगाया गया।

अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर राज्य सरकारें क्या करेंगी, यह प्रश्न ऊपर है, क्योंकि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के आए कई निर्णयों को राज्य सरकारों ने ठेंगा दिखाया है।

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