कांग्रेस ने ही शुरू की थी संसदीय सचिव की राजनीति

अखिलेश अखिल


कौन सा दाव कब किस पर भारी पड़ जाए, कौन जाने ! जिस तरह से हत्या और आतंक का खेल शुरू करने वाला बाद में उसी खेल से रक्तरंजित हो जाता है ठीक उसी तरह अपने लाभ के लिए शुरू हुयी राजनीति कभी कभी उसी को जमींदोज कर देती है। दुनिया का इतिहास गवाह है कि पूरी दुनिया में आतंकवाद को बढ़ाने में जिस देश ने आतंकियों को संबल प्रदान किया ,बाद में वही आतंकी उसी देश के लिए भष्मासुर साबित हुआ। राजनीति में भी ऐसा ही सब चलता है।

आज जिस संसदीय सचिव की अवधारणा को लेकर राजनितिक बवाल देश भर में खड़ा है ,उसकी परिपाटी कांग्रेस ने ही शुरू की थी। हरियाणा और छत्तीसगढ़ भी इस मसले पर असमंजस में है लेकिन इतिहास यही बताता है कि इसकी शुरुआत कांग्रेस ने ही सबसे पहले की थी। आप जैसी पहली कोई पार्टी नहीं है जो संसदीय सचिव बनाकर इतिहास रचा हो। कांग्रेस ने अविभाजित मध्य प्रदेश में इसकी शुरुआत करने के साथ ही दिल्ली में भी इसकी शुरुआत की थी। लेकिन इसकी अवधारणा सबसे पहले मध्य प्रदेश में 1960 के दशक में पेश की गई थी।

अविभाजित मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने 1967 में पहला संसदीय सचिव नियुक्त किया था। 1977 में जनता पार्टी की सरकार के दौरान संसदीय सचिव बनाये गए। तब राज्य में डीपी मिश्रा मुख्यमंत्री थे। उस दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक राजेंद्र प्रसाद शुक्ला को पहली बार संसदीय सचिव नियुक्त किया गया था।आप को बता दें कि शुरुआत में संसदीय सचिव की नियुक्ति मुख्यमंत्री या वरिष्ठ मंत्रियों के काम में मदद के लिए किया जाता था। लेकिन अब संसदीय सचिव की नियुक्ति संविधान के 91वें संशोधन में केंद्र और राज्यों के मंत्रिमंडल की संख्या तय कर देने के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए की जाती है। यह एक राजनितिक खेल है।

नेताओं को खपाने के लिए और कुछ कमाने के लिए। संविधान संशोधन के द्वारा लोक सभा या राज्य विधानसभा के कुल सदस्यों के 15 फीसदी से ज्यादा सदस्य मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं हो सकते। इसके बाद यह खेल और शुरू हो गया। तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार ने इसके लिए औपचारिक तौर पर एक कानून बनाकर सरकार को संसदीय सचिवों को नियुक्त करने और उस पद को गैर-लाभ का पद घोषित करने का अधिकार दिया। यही कानून छत्तीसगढ़ सरकार के 11 संसदीय सचिवों के लिए राहत लेकर आया है।

इसी क़ानून की आर में छत्तीसगढ़ के बीजेपी नेता कहते फिर रहे हैं कि यहां संसदीय सचिव की नियुक्ति जायज है और वैध भी। अब कांग्रेस वहाँ चुनौती दे रही है। मामला रायपुर कोर्ट में लंबित है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि तब हालात कुछ अलग थे लेकिन अब नहीं। कुछ इसी तरह के मामले अन्य राज्यों के साथ भी हैं। अब देखने की बात है कि ऐसे मामले में राज्यों के कानून के अनुसार फैसले होते हैं या कोई केन्द्रिय कानून के मुताविक।

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