कोरोना के नए प्रोटोकॉल में सूंघने, स्वाद लेने में कमी और मांसपेशियों में दर्द भी इसके लक्षण

नई दिल्ली: तीसरे वर्जन के रूप में प्रस्तुत 19 पेज के नए प्रोटोकॉल में बताया गया है कि भारत में भी कोरोना के ऐसे रोगी मिल रहे हैं, जो गंधहीन और स्वादहीन होने जैसी शिकायत कर रहे हैं। इससे पहली ऐसी बातें अमेरिका व अन्य देशों में सामने आई थीं और वि स्वास्थ्य संगठन ने अपनी गाइडलाइंस में इसे शामिल किया था।

भारत में एक बात यह भी सामने आई है कि बड़ों की तुलना में कोरोना से पीड़ित बच्चों में बुखार और कफ भी देखने को नहीं मिल रहा है। इससे समझा जा सकता है कि कोरोना का वायरस कई रूप में मौजूद है। प्रोटोकॉल में बताया गया है कि 27% रोगियों में बुखार, 21% में कफ,10% के गले में खराश, 8% को सांस लेने में तकलीफ और 7% को शरीर में कमजोरी देखी गई। 24% में अन्य कारण देखे गए। अन्य के रूप में 24% का आंकड़ा काफी बड़ा है। यह बात 11 जून तक के आंकड़ों के आधार पर कही गई है। जहां तक कोरोना में जोखिम की बात है इस पर कोई परिवर्तन नहीं आया है। अभी भी 60 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्तियों के लिए कहा गया है कि उनको रिस्क ज्यादा है।

इसी प्रोटोकॉल के जरिए डॉक्टरों को अब अमेरिकी दवा रेमडेसिवर के इस्तेमाल की अनुमति दे दी गई है। कहा गया है कि यह एंटीवायरल दवा ऑक्सीजन पर चल रहे रोगियों को दी जा सकती है। इस दवा के बारे में अमेरिका ने दावा किया था कि इसके इस्तेमाल से कोरोना के रोगियों को निरंतर ऑक्सीजन की कम जरूरत पड़ती है। देश में इस दवा की उपलब्धता नहीं होने और इस पर अधिक स्टडी नहीं होने की वजह से भारत अब तक इस पर खुलकर राय नहीं दे रहा था। भारत अपने यहां उपलब्ध हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन को आजमा रहा था।

नए प्रोटोकॉल में भी उसने इसका समर्थन किया है। पिछले दिनों प्लाज्मा थेरेपी से कोरोना के इलाज की बड़ी चर्चा थी। स्वास्थ्य मंत्रालय और आईसीएमआर ने समझाया था कि यह कहने में जितना आसान है, वैसी स्टडी सामने नहीं है। प्रोटोकॉल में स्पष्ट किया गया है कि प्लाज्मा थेरेपी का उपयोग वेंटिलेटर वाले ऐसे रोगियों पर किया जाएगा, जिन पर स्टेरॉइड काम नहीं कर रहा हो।

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