हे प्रधान सेवक ! नेता और अधिकारी के बच्चे आपके सरकारी स्कूल में कब पढ़ेंगे ?

अखिलेश अखिल
केंद्र से राज्य फिर जिला उसके बाद प्रखंड और अंत में पंचायत। भारतीय राज व्यवस्था का यही चक्र है। किसी भी सरकारी योजना को अंतिम पायदान पर खड़े लोगों तक पहुंचाने की हमारे देश में ऐसा ही कुछ व्यवस्था बनी हुयी है। देश की तमाम योजनाएं इसी माध्यम से आम लोगों तक पहुँचती है और अंत में एक माध्यम उसकी मॉनिटरिंग की होती है जो यह पता करती है कि सरकारी धन ,योजना का लाभ लोगों को मिल रहा है की नहीं। मंत्री से लेकर संत्री तक योजना को संचालित करने और सफल करने वाले किरदार होते हैं।
अब बात मुद्दे की। इधर पिछले तीन साल से केंद्र सरकार बड़े पैमाने पर शिक्षा व्यवस्था में बदलाव को लेकर काम करती आ रही है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री जिन्हें मानव संसाधन विकास मंत्री के नाम से जाना जाता है के पद पर अभी प्रकाश जावड़ेकर बैठे हुए हैं। शिक्ष को लेकर प्रायः हर दिन उनके बड़े बड़े बयान आते हैं। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा तक बदलाव लाने की बात हम हर रोज सुनते आ रहे हैं। हम यह भी मान लेते हैं कि नेता कोई भगवान् नहीं होता और यह भी मानते हैं कि देश का प्रायः हर नेता गाँव को जरूर जानता है। भले ही वह गांव में पाला नहीं हो लेकिन राजनीति की वजह से ही गाँव को जरूर समझने लगा है।
हम सब यह भी जानते हैं कि देश की बड़ी आबादी आज भी गाँव में ही रहती है और यह भी पता है कि 70 साल की आजादी के बाद भी गाँव की हालत नहीं सुधरी है। सबसे बुरा हाल शिक्षा और स्वास्थ्य का है गाँव में। इधर 70 साल की आजादी में गाँव की जो तस्वीर बदली है उसमे मुख्य रूप से विजली और सड़क को लेकर है। कह सकते हैं कि देश के अधिकतर गाँव विजली और सड़क से जुड़ गए हैं या फिर जुड़ने के कगार पर हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि गाँव में जो स्कूल चल रहे हैं या फिर देश में जो सरकारी स्कूल बनते दिख रहे हैं उसमे पढ़ने वाले बच्चे के बारे में कोई सोचता भी नहीं। इन स्कूलों में गरीब और गरीब माध्यम वर्ग के बच्चे टूटी फूटी पढ़ाई करते हैं और वहाँ से निकल कर मजूरी में लग जाते हैं। बहुत कम बच्चे ही ऐसे होते हैं जो आगे बढ़ पाते हैं और इन स्कूलों की पढ़ाई की वजह से वे कोई काबिल आदमी बन पाते हैं। यह कोई बड़ी बात नहीं है जो कोई नेता और अधिकारी नहीं जाने।
अब असली बात। केंद्र या राज्य सरकार जब कोई योजना शुरू करती है तो प्रचारित किया जाता है कि इस योजना से देश बदल जाएगा और पढ़ाई की गुणवत्ता बढ़ जायेगी। गाँव -शहर के स्कूलों में कोई अंतर नहीं रह जाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि उन सरकारी स्कूलों में सरकारी स्टाफ के बच्चे क्यों नहीं पढ़ते। जब कोई सरकार प्रचारित करके सरकारी स्कूल बनाती है और उस स्कूल को बनाने में मंत्री से लेकर नौकरशाह ,अधिकारी  दिन रात लगे रहते हैं तो फिर अपने बच्चो को वहाँ पढ़ाते क्यों नहीं ?इसका जबाब आज तक किसी को नहीं मिला। क्या प्रधान मंत्री ,मंत्री ,मुख्य सचिव ,सचिव ,कलेक्टर ,बीडीओ आदि अधिकारी अपने बनाये गए आदर्श स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाते हैं ? जबाब नहीं है। आखिर क्यों ?
देखने में तो यही लगता है कि हमारी सरकार देश में विषमता को मिटाने की बात करते फिरते हैं। लेकिन असलियत यही है कि ये नेता और अधिकारी विषमता का बीज समाज में बोते हैं। सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के लिए केंद्रीय विद्यालय खोले गए हैं। हालांकि यह भी सरकारी स्कूल है लेकिन आम सरकारी स्कूल से बेहतर। जहां आम लोगों के बच्चे नहीं पढ़ते। यह सबसे बड़ी विषमता है। यह भी एक जातीय विषमता ही है। आम लोगों और सरकारी कर्मचारियों के बीच की विषमता। जरुरी तो इस बात की है कि देश के हर नागरिक के लिए एक ही तरह के स्कूल हों जहां गरीब से लेकर अमीर ,नेता ,अधिकारी के बच्चे एक साथ पढ़ सके। प्रधान सेवक जी को इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है। जब तक सरकारी स्कूलों में सरकार के अमले बे बच्चे नहीं पढ़ेंगे तब तक देश की शिक्षा व्यवस्था ठीक नहीं हो सकती। जब सरकारी कर्मचारी के बच्चे वहाँ पढ़ेंगे ,कम से कम अपने बच्चो के भविस्य के लिए ही सही उस स्कूल की व्यस्था वे ठीक रखेंगे।
नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
Loading...
E-Paper