राजनीति का अद्भुत खेल, दिल्ली के विधायक हुए अयोग्य बाकी खेले गुलेल

अखिलेश अखिल


गजब का नाजरा है। कोई कुछ बोलता ही नहीं। संसदीय सचिव बनाये जाने पर दिल्ली के 20 विधायक कही के नहीं रहे। उनकी सदस्यता रद्द हो गई। कई जगह फ़रियाद लेकर आप वाले घूमते रहे लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। उधर लगभग 13 राज्यों में संसदीय सचिव बने विधायक बसंत पंचमी पर गुलेल खेलते नजर आये। उन पर कोई कार्रवाई नहीं। कोई डर नहीं और मलाल भी नहीं।

कौन सवाल उठाएगा। मजाल किसकी है। यही लोकतंत्र का नया नजारा। आपको बता दें कि विधायकों को ‘लाभ के पद’ संसदीय सचिव बनाने का मामला सिर्फ दिल्ली में ही नहीं बल्कि इस फेहरिस्त में देश के 13 राज्य शामिल है। पर सदस्यता सिर्फ दिल्ली के विधायकों की गई है। बाकी राज्यों में विधायक ज्यों की त्यों बने हुए हैं।

हरियाणा, तेलंगाना और पंजाब में हाई कोर्ट द्वारा विधायकों को संसदीय सचिव की नियुक्ति को अवैध ठहराए जाने के बाद भी उनकी सदस्यता नहीं गई है। हालांकि, हरियाणा की खट्टर सरकार ने 4 संसदीय सचिवों को उनके पद से हटा दिया है। पंजाब की पूर्व बादल सरकार के दौरान हाई कोर्ट ने 18 विधायकों को संसदीय सचिव बनाए जाने को असंवैधानिक ठहराया था। इसके अलावा 2016 में तेलंगाना के 6 विधायकों को संसदीय सचिव बनाए जाने को भी कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है। इसके बाद विधायकों ने संसदीय सचिव पद से इस्तीफा दे दिया, पर उनकी सदस्यता नहीं गई।

पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधायकों को संसदीय सचिव बनाने का मामला आज भी अदालत में विचाराधीन है। पश्चिम बंगाल के 24 विधायकों को हाई कोर्ट ने अयोग्य ठहराया है। अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। वहीं कर्नाटक में 11 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया गया है। इसके अलावा राजस्थान में 10 और छत्तीसगढ़ में 11 विधायकों के संसदीय सचिव बनाए जाने का मामला कोर्ट में है। लेकिन कहीं राजनितिक खेल दिखाई नहीं पड़ती। लेकिन दिल्ली में खेल जारी है।

अरुणाचल प्रदेश में 31 संसदीय सचिव नियुक्त हैं। पूर्वोत्तर के राज्य नगालैंड, मणिपुर और असम में लाभ के पद मामले को लेकर विवाद है। इतना ही नहीं मध्य प्रदेश में करीब 100 विधायकों पर लाभ के पद का आरोप लगाया गया है। आँख खोलकर देखिये तो साफ़ हो जाता है कि अधिकतर बीजेपी शाषित राज्यों में लाभ के पद वाले विधायकों की लम्बी सूचि है लेकिन वहाँ कोई राजनितिक संकट नहीं है।

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