74 की उम्र में दिल मचला, हुई घर वापसी

भोपाल: बालेंदु शुक्ल एक वक्त ग्वालियर चम्बल में वह नाम थे जिनकी इजाज़त के बिना ना तो सियासी पत्ता हिलता था ना ही सरकारी मशीनरी का कोई पुर्ज़ा यहां से वहां होता था। बालेंदु मतलब ग्वालियर। ग्वालियर मतलब बालेंदु। यह तब का दौर था जब माधव राव सिंधिया का दिल्ली की सत्ता में डंका बजता था। 1980 में माधवराव ही बैंक की नौकरी छुड़वाकर बालेंदु को राजनीति में लाए और गिर्द से टिकट भी दिलवाया। फिर इन्होंने पलटकर नहीं देखा। सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते ही गए।

सिंधिया केंद्र में तो बालेंदु प्रदेश की सत्ता में अपनी जड़ें मजबूत करते जा रहे थे। सिंधिया के महल में कौन कांग्रेसी कदम रखेगा यह भी बालेंदु ही तय करते थे पर समीकरण तब बिगड़े जब 2001 में माधवराव का असमय निधन हुआ और छोटे सिंधिया यानी ज्योतिरादित्य राजनीति में आए। बालेंदु ने ही इन्हें राजनीति का ककहरा पढ़ाया था पर सबसे पहले इन्होंने बालेंदु को ही महल से बाहर किया। असर यह हुआ कि बालेंदु का जब साल 2008 में टिकट कटा तो यह BSP के टिकट पर चुनाव लड़े और हार कर घर बैठने के बजाय BJP के सदस्य बन गए।

तब से लेकर आज सुबह तक BJP में रहे। BJP से अचानक मोह भंग भी यूं ही नहीं हुआ। सब कुछ चकाचक चल रहा था। कम्पर्ट जोन में भी थे पर दिक्कत यह थी कि जिन सिंधिया की वजह से कांग्रेस छोड़ी वे BJP में आ चुके हैं। ऐसे में बात कैसे बनती। नज़रें कैसे मिलतीं तो 1946 में जन्मे बालेंदु ने 74 बरस की उम्र में फिर आगे बढ़ने के लिए हाथ पकड़ लिया।

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