हिन्दुत्व का झंडा अब मोदी के हाथ!

भारत सिंह


कोई माने या न माने, गजब के तीर हैं प्रधानमंत्री नरेंद्ग मोदी के तरकश में। वह उन्हें इतने करीने से चलाते हैं कि बड़े से बड़ा लक्ष्य धूल चाट जाता है और उफ तक की आवाज नहीं आती। जिसे हुचकी आती भी है, उसे खुद ही अपना गला घोंटना पड़ता है। गौर कीजिए, एक तरफ देश का बहुसंख्यक वर्ग तोगड़िया के कथित एनकाउंटर की साजिश की खबर से अचम्भित था, तो दूसरी ओर अल्पसंख्यक वर्ग हज सब्सिडी को इतिहास बना दिये जाने से मर्माहत था। इन दोनों की झटपटाहट के बीच बड़ी सफाई से प्रधानमंत्री ने हिन्दुत्व का झंडा अपने हाथ में ले लिया था, पर इस तरफ किसी का ध्यान गया ही नहीं। जर्रे-जर्रे की खबर छानने वाली मीडिया हो या फिर सत्ता पक्ष की किसी कमी को कुदाल बनाकर उसकी कब्र खोदने में लग जाने वाले विपक्षी दल, किसी के भी कान पर इस बाबत जूं रेंगी ही नहीं। इस परिप्रेक्ष्य में अखबारों के पन्ने खाली थे। चैनल्स सफाचट थे। विपक्षी खेमा गहरी नींद में था।

अपन का माथा, इस बाबत तब ठनका, जब खुद से पूछताछ करने लगा कि हिन्दुत्व के झंडा बरदार प्रवीण तोगड़िया, जो अब मानो संघ के नूर नहीं रहे, आहत होकर सरसैया जैसी स्थिति में पड़े हैं, तो ऐसे हालात में हिन्दुत्व का झंडा कौन उठायेगा? बड़ी माथा-पच्ची के बाद समझ में आया कि हिन्दुत्व के झंडे को, तो प्रधानमंत्री ने खुद ही अपने हाथों में ले लिया है। फर्क महज इतना है कि हिन्दुत्व का यह झंडा विश्व हिन्दू परिषद का नहीं, बल्कि केन्द्ग सरकार की अगुवाई कर रही भाजपा का है। हिन्दुत्व के इस झंडे को प्रधानमंत्री द्वारा उठा लिये जाने पर तालियों की गड़गड़ाहट नहीं हुई। जय श्रीराम के गगनभेदी नारे गुंजायमान नहीं हुए। भला खुशियां कैसे बरसतीं? जब किसी की समझ में ही नहीं आया कि ऐसा कुछ हुआ है। यही, तो कमाल है प्रधानमंत्री के चलाये अचूक तीर का। अल्पसंख्यक, तो समझने की हालत में ही नहीं थे। वे, तो आजादी के बाद से मिलती आ रही हज सब्सिडी के खात्मे से ऐसे मायूसी में डूबे थे जैसे एकाएक नोटबंदी के बाद अनाप-शनाप तरीके से तिजोरियां भरने वाले सहम गये थे।

जरा हिन्दुव के झंडे को उठाने के वक्त पर गौर करें। तोगड़िया प्रकरण से हिन्दुओं का एक बड़ा हिस्सा तमतमाया हुआ था। उनके गुस्से प्रधानमंत्री के पैतृक राज्य गुजरात के कई हिस्सों में तभी फूटे थे, जब तोगड़िया के रहस्यमय ढंग से लापता होने की खबर आयी थी। उसी समय, शायद यह आकलन कर लिया गया था कि अगर कुछ खास न किया गया, तो गुजरात में उठी गुस्से की आग भभक सकती है। भभक भी सकती थी, लेकिन १‚-११ घंटे बाद तोगड़िया का मिसिंग चैप्टर क्लोज हो गया था। उसकी जगह तोगड़िया के आंसुओं ने ले ली थी। आंसू देखकर कोई गुस्सा नहीं होता, बल्कि संवेदना के आगोश में चला जाता है। इसी लिए तोगड़िया द्वारा खुद के एनकाउंटर की साजिश की बात कहे जाने के बावजूद आक्रोश कहीं भी नहीं फूटा। सबके कान तोगड़िया के मुखापेक्ष हो गये थे कि वह बताएंगे कि आखिर उनकी जान कौन लेना चाहता है, लेकिन तोगड़िया पहले दिन इस सवाल को सही समय आने पर बताने की बात कह कर टाल गये थे। समर्थकों के खून में जो बची-खुची गर्मी थी, वह ठंडी पड़ गई थी।

फिलहाल, भाजपा के थिंक टैंक को अंदेशा रहा होगा कि एक बार उठा आक्रोश फिर उबल सकता है, इसीलिए उसे पूरी तरह दबा देने का निर्णय लिया गया। और उसी दिन, इसके लिये हज सब्सिडी को निशाने पर लिया गया, क्योंकि इस बाबत विरोध की गुंजाइश ही नहीं थी। गुंजाइश इसलिए नहीं थी, क्योंकि हज सब्सिडी को खत्म करने का निर्णय मोदी सरकार का नहीं है। मोदी सरकार ने, तो इस सिलसिले में देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा यूपीए सरकार के कार्यकाल में दिये गए उस आदेश का पालन किया है जिसमें कहा गया था कि २‚२‚ तक हज सब्सिडी खत्म कर दी जाए। तब उच्चतम न्यायालय ने यह भी आदेशित किया था कि हज सब्सिडी में जो पैसा दिया जाता है, उसे अल्पसंख्यकों की बेटियों की शिक्षा पर लगाया जाए। इस मसले पर कांग्रेस में जरूर थोड़ी सुगबुगाहट हुई थी, यह कहते हुए कि इसे धीरे-धीरे समाप्त करना था, लेकिन मोदी सरकार ने इसे दो साल पहले ही खत्म कर दिया।

बहरहाल, अदालत के आदेश के अनुपालन में मोदी सरकार द्वारा हज सब्सिडी खत्म करने के कदम से हिन्दुओं के उस तबके ने, तो ठंडी सांस ली होगी, जिसे लगता रहा है कि यह सरकार अल्पसंख्यकों की बेहतरी के प्रति कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी ले रही है। इस तबके को, तीन तलाक का मसला हो या फिर मदरसों को उच्च शिक्षा से लैस करने की कोशिश हो, के प्रति सरकार का दृढ़ता से उठ खड़ा होना, नहीं सुहा रहा था। इस तबके की सोच थी कि जो ऊर्जा अल्पसंख्यकों के प्रति लगाई जा रही है, सरकार को चाहिए कि वह उसे दबे-कुचले, उपेक्षित पड़े बहुसंख्यकों व खदेड़ दिये गये कश्मीरी हिन्दुओं में लगानी चाहिए। और जिनके जेहन में यह रहा होगा कि तोगड़िया प्रकरण से हिन्दुत्व की धार गोठिल होने के आसार हैं, उन्हें इस कदम से संदेश दे दिया गया कि यह सोचना उनका काम नहीं, बल्कि उनका है जो इसके जरिए सत्ता के सर्वोच्च पर विराजमान हैं। रही बात मुस्लिम वर्ग के चुप्पी की, तो पहले वह खिसियाया होगा। फिर मंथन किया होगा कि दूसरों या सरकारी पैसों की बजाय हज अपने पैसे से किया जाए, तभी उसके मायने हैं। यह भी सोचा होगा कि हज वाले सरकारी पैसे से बेटियां पढ़ लिख जाएंगी, तो पीढ़िèयों में फर्क आ जाएगा।

इन हालात में वाकई में कोई भी बिना शोरगुल किये अगर कुछ खास कर गुजरे, तो उस ओर किसी का ध्यान जाएगा ही नहीं। और यदि जाएगा भी, तो तब तक देर हो चुकी होगी। बहुत माथा-पच्ची करने पर ही उसे सच समझ में आएगा। उस स्थिति में जिसे जो भायेगा, उसे स्वीकार कर लेगा। यही इन दोनों हालातों के बीच हुआ। हिन्दुत्व की रट लगाने वाले शायद इसी लिए तोगड़िया प्रकरण पर बाहें नहीं चढ़ाये, क्योंकि उन्हें समझ में आ गया होगा कि जब प्रधानमंत्री ही हिन्दुत्व के नायक बन गये हैं, तो तकरार किस बात की। खैर, अपन को, तो यही लगा कि मोदी के तरकश से निकले इस तीर के टंकार कानों में नहीं पड़े, लेकिन जो भेदना था या भिदना चाहिए था, वह तो भिद चुका है।

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